chevron_left शान्ति पर्व अध्याय ३२६
भीष्म उवाच:
व्रह्मा सनातनो देवो मम वह्वर्थचिन्तकः ||
४७ ख
भीष्म उवाच:
पश्यैकादश मे रुद्रान्दक्षिणं पार्श्वमास्थितान् |
४८ क
भीष्म उवाच:
द्वादशैव तथादित्यान्वामं पार्श्वं समास्थितान् ||
४८ ख
भीष्म उवाच:
अग्रतश्चैव मे पश्य वसूनष्टौ सुरोत्तमान् |
४९ क
भीष्म उवाच:
नासत्यं चैव दस्रं च भिषजौ पश्य पृष्ठतः ||
४९ ख
भीष्म उवाच:
सर्वान्प्रजापतीन्पश्य पश्य सप्त ऋषीनपि |
५० क
भीष्म उवाच:
वेदान्यज्ञांश्च शतशः पश्यामृतमथौषधीः ||
५० ख
भीष्म उवाच:
तपांसि निय़मांश्चैव यमानपि पृथग्विधान् |
५१ क
भीष्म उवाच:
तथाष्टगुणमैश्वर्यमेकस्थं पश्य मूर्तिमत् ||
५१ ख
भीष्म उवाच:
श्रिय़ं लक्ष्मीं च कीर्तिं च पृथिवीं च ककुद्मिनीम् |
५२ क
भीष्म उवाच:
वेदानां मातरं पश्य मत्स्थां देवीं सरस्वतीम् ||
५२ ख
भीष्म उवाच:
ध्रुवं च ज्योतिषां श्रेष्ठं पश्य नारद खेचरम् |
५३ क
भीष्म उवाच:
अम्भोधरान्समुद्रांश्च सरांसि सरितस्तथा ||
५३ ख
भीष्म उवाच:
मूर्तिमन्तः पितृगणांश्चतुरः पश्य सत्तम |
५४ क
भीष्म उवाच:
त्रींश्चैवेमान्गुणान्पश्य मत्स्थान्मूर्तिविवर्जितान् ||
५४ ख
भीष्म उवाच:
देवकार्यादपि मुने पितृकार्यं विशिष्यते |
५५ क
भीष्म उवाच:
देवानां च पितॄणां च पिता ह्येकोऽहमादितः ||
५५ ख
भीष्म उवाच:
अहं हय़शिरो भूत्वा समुद्रे पश्चिमोत्तरे |
५६ क
भीष्म उवाच:
पिवामि सुहुतं हव्यं कव्यं च श्रद्धय़ान्वितम् ||
५६ ख
भीष्म उवाच:
मय़ा सृष्टः पुरा व्रह्मा मद्यज्ञमय़जत्स्वय़म् |
५७ क
भीष्म उवाच:
ततस्तस्मै वरान्प्रीतो ददावहमनुत्तमान् ||
५७ ख
भीष्म उवाच:
मत्पुत्रत्वं च कल्पादौ लोकाध्यक्षत्वमेव च |
५८ क
भीष्म उवाच:
अहङ्कारकृतं चैव नाम पर्याय़वाचकम् ||
५८ ख
भीष्म उवाच:
त्वय़ा कृतां च मर्यादां नातिक्राम्यति कश्चन |
५९ क
भीष्म उवाच:
त्वं चैव वरदो व्रह्मन्वरेप्सूनां भविष्यसि ||
५९ ख
भीष्म उवाच:
सुरासुरगणानां च ऋषीणां च तपोधन |
६० क
भीष्म उवाच:
पितॄणां च महाभाग सततं संशितव्रत |
६० ख
भीष्म उवाच:
विविधानां च भूतानां त्वमुपास्यो भविष्यसि ||
६० ग
भीष्म उवाच:
प्रादुर्भावगतश्चाहं सुरकार्येषु नित्यदा |
६१ क
भीष्म उवाच:
अनुशास्यस्त्वय़ा व्रह्मन्निय़ोज्यश्च सुतो यथा ||
६१ ख
भीष्म उवाच:
एतांश्चान्यांश्च रुचिरान्व्रह्मणेऽमिततेजसे |
६२ क
भीष्म उवाच:
अहं दत्त्वा वरान्प्रीतो निवृत्तिपरमोऽभवम् ||
६२ ख
भीष्म उवाच:
निर्वाणं सर्वधर्माणां निवृत्तिः परमा स्मृता |
६३ क
भीष्म उवाच:
तस्मान्निवृत्तिमापन्नश्चरेत्सर्वाङ्गनिर्वृतः ||
६३ ख
भीष्म उवाच:
विद्यासहाय़वन्तं मामादित्यस्थं सनातनम् |
६४ क
भीष्म उवाच:
कपिलं प्राहुराचार्याः साङ्ख्यनिश्चितनिश्चय़ाः ||
६४ ख
भीष्म उवाच:
हिरण्यगर्भो भगवानेष छन्दसि सुष्टुतः |
६५ क
भीष्म उवाच:
सोऽहं योगगतिर्व्रह्मन्योगशास्त्रेषु शव्दितः ||
६५ ख
भीष्म उवाच:
एषोऽहं व्यक्तिमागम्य तिष्ठामि दिवि शाश्वतः |
६६ क
भीष्म उवाच:
ततो युगसहस्रान्ते संहरिष्ये जगत्पुनः |
६६ ख
भीष्म उवाच:
कृत्वात्मस्थानि भूतानि स्थावराणि चराणि च ||
६६ ग
भीष्म उवाच:
एकाकी विद्यया सार्धं विहरिष्ये द्विजोत्तम |
६७ क
भीष्म उवाच:
ततो भूय़ो जगत्सर्वं करिष्यामीह विद्यया ||
६७ ख
भीष्म उवाच:
अस्मन्मूर्तिश्चतुर्थी या सासृजच्छेषमव्ययम् |
६८ क
भीष्म उवाच:
स हि सङ्कर्षणः प्रोक्तः प्रद्युम्नं सोऽप्यजीजनत् ||
६८ ख
भीष्म उवाच:
प्रद्युम्नादनिरुद्धोऽहं सर्गो मम पुनः पुनः |
६९ क
भीष्म उवाच:
अनिरुद्धात्तथा व्रह्मा तत्रादिकमलोद्भवः ||
६९ ख
भीष्म उवाच:
व्रह्मणः सर्वभूतानि चराणि स्थावराणि च |
७० क
भीष्म उवाच:
एतां सृष्टिं विजानीहि कल्पादिषु पुनः पुनः ||
७० ख
भीष्म उवाच:
यथा सूर्यस्य गगनादुदय़ास्तमय़ाविह |
७१ क
भीष्म उवाच:
नष्टौ पुनर्वलात्काल आनय़त्यमितद्युतिः |
७१ ख
भीष्म उवाच:
तथा वलादहं पृथ्वीं सर्वभूतहिताय़ वै ||
७१ ग
भीष्म उवाच:
सत्त्वैराक्रान्तसर्वाङ्गां नष्टां सागरमेखलाम् |
७२ क
भीष्म उवाच:
आनय़िष्यामि स्वं स्थानं वाराहं रूपमास्थितः ||
७२ ख
भीष्म उवाच:
हिरण्याक्षं हनिष्यामि दैतेय़ं वलगर्वितम् |
७३ क
भीष्म उवाच:
नारसिंहं वपुः कृत्वा हिरण्यकशिपुं पुनः |
७३ ख
भीष्म उवाच:
सुरकार्ये हनिष्यामि यज्ञघ्नं दितिनन्दनम् ||
७३ ग
भीष्म उवाच:
विरोचनस्य वलवान्वलिः पुत्रो महासुरः |
७४ क
भीष्म उवाच:
भविष्यति स शक्रं च स्वराज्याच्च्यावय़िष्यति ||
७४ ख
भीष्म उवाच:
त्रैलोक्येऽपहृते तेन विमुखे च शचीपतौ |
७५ क
भीष्म उवाच:
अदित्यां द्वादशः पुत्रः सम्भविष्यामि कश्यपात् ||
७५ ख
भीष्म उवाच:
ततो राज्यं प्रदास्यामि शक्राय़ामिततेजसे |
७६ क
भीष्म उवाच:
देवताः स्थापय़िष्यामि स्वेषु स्थानेषु नारद |
७६ ख
भीष्म उवाच:
वलिं चैव करिष्यामि पातालतलवासिनम् ||
७६ ग
भीष्म उवाच:
त्रेताय़ुगे भविष्यामि रामो भृगुकुलोद्वहः |
७७ क
भीष्म उवाच:
क्षत्रं चोत्सादय़िष्यामि समृद्धवलवाहनम् ||
७७ ख
भीष्म उवाच:
सन्धौ तु समनुप्राप्ते त्रेताय़ां द्वापरस्य च |
७८ क
भीष्म उवाच:
रामो दाशरथिर्भूत्वा भविष्यामि जगत्पतिः ||
७८ ख
भीष्म उवाच:
त्रितोपघाताद्वैरूप्यमेकतोऽथ द्वितस्तथा |
७९ क
भीष्म उवाच:
प्राप्स्यतो वानरत्वं हि प्रजापतिसुतावृषी ||
७९ ख
भीष्म उवाच:
तय़ोर्ये त्वन्वय़े जाता भविष्यन्ति वनौकसः |
८० क
भीष्म उवाच:
ते सहाय़ा भविष्यन्ति सुरकार्ये मम द्विज ||
८० ख
भीष्म उवाच:
ततो रक्षःपतिं घोरं पुलस्त्यकुलपांसनम् |
८१ क
भीष्म उवाच:
हनिष्ये रावणं सङ्ख्ये सगणं लोककण्टकम् ||
८१ ख
भीष्म उवाच:
द्वापरस्य कलेश्चैव सन्धौ पर्यवसानिके |
८२ क
भीष्म उवाच:
प्रादुर्भावः कंसहेतोर्मथुराय़ां भविष्यति ||
८२ ख
भीष्म उवाच:
तत्राहं दानवान्हत्वा सुवहून्देवकण्टकान् |
८३ क
भीष्म उवाच:
कुशस्थलीं करिष्यामि निवासं द्वारकां पुरीम् ||
८३ ख
भीष्म उवाच:
वसानस्तत्र वै पुर्यामदितेर्विप्रिय़ङ्करम् |
८४ क
भीष्म उवाच:
हनिष्ये नरकं भौमं मुरं पीठं च दानवम् ||
८४ ख
भीष्म उवाच:
प्राग्ज्योतिषपुरं रम्यं नानाधनसमन्वितम् |
८५ क
भीष्म उवाच:
कुशस्थलीं नय़िष्यामि हत्वा वै दानवोत्तमान् ||
८५ ख
भीष्म उवाच:
शङ्करं च महासेनं वाणप्रिय़हितैषिणम् |
८६ क
भीष्म उवाच:
पराजेष्याम्यथोद्युक्तौ देवलोकनमस्कृतौ ||
८६ ख
भीष्म उवाच:
ततः सुतं वलेर्जित्वा वाणं वाहुसहस्रिणम् |
८७ क
भीष्म उवाच:
विनाशय़िष्यामि ततः सर्वान्सौभनिवासिनः ||
८७ ख
भीष्म उवाच:
यः कालय़वनः ख्यातो गर्गतेजोभिसंवृतः |
८८ क
भीष्म उवाच:
भविष्यति वधस्तस्य मत्त एव द्विजोत्तम ||
८८ ख
भीष्म उवाच:
जरासन्धश्च वलवान्सर्वराजविरोधकः |
८९ क
भीष्म उवाच:
भविष्यत्यसुरः स्फीतो भूमिपालो गिरिव्रजे |
८९ ख
भीष्म उवाच:
मम वुद्धिपरिस्पन्दाद्वधस्तस्य भविष्यति ||
८९ ग
भीष्म उवाच:
समागतेषु वलिषु पृथिव्यां सर्वराजसु |
९० क
भीष्म उवाच:
वासविः सुसहाय़ो वै मम ह्येको भविष्यति ||
९० ख
भीष्म उवाच:
एवं लोका वदिष्यन्ति नरनाराय़णावृषी |
९१ क
भीष्म उवाच:
उद्युक्तौ दहतः क्षत्रं लोककार्यार्थमीश्वरौ ||
९१ ख
भीष्म उवाच:
कृत्वा भारावतरणं वसुधाय़ा यथेप्सितम् |
९२ क
भीष्म उवाच:
सर्वसात्वतमुख्यानां द्वारकाय़ाश्च सत्तम |
९२ ख
भीष्म उवाच:
करिष्ये प्रलय़ं घोरमात्मज्ञातिविनाशनम् ||
९२ ग
भीष्म उवाच:
कर्माण्यपरिमेय़ानि चतुर्मूर्तिधरो ह्यहम् |
९३ क
भीष्म उवाच:
कृत्वा लोकान्गमिष्यामि स्वानहं व्रह्मसत्कृतान् ||
९३ ख