chevron_left वन पर्व अध्याय ३३
द्रौपद्यु उवाच:
अनारम्भे तु न फलं न गुणो दृश्यतेऽच्युत ||
४८ ग
द्रौपद्यु उवाच:
देशकालावुपाय़ांश्च मङ्गलं स्वस्ति वृद्धय़े |
४९ क
द्रौपद्यु उवाच:
युनक्ति मेधय़ा धीरो यथाशक्ति यथावलम् ||
४९ ख
द्रौपद्यु उवाच:
अप्रमत्तेन तत्कार्यमुपदेष्टा पराक्रमः |
५० क
द्रौपद्यु उवाच:
भूय़िष्ठं कर्मय़ोगेषु सर्व एव पराक्रमः ||
५० ख
द्रौपद्यु उवाच:
यं तु धीरोऽन्ववेक्षेत श्रेय़ांसं वहुभिर्गुणैः |
५१ क
द्रौपद्यु उवाच:
साम्नैवार्थं ततो लिप्सेत्कर्म चास्मै प्रय़ोजय़ेत् ||
५१ ख
द्रौपद्यु उवाच:
व्यसनं वास्य काङ्क्षेत विनाशं वा युधिष्ठिर |
५२ क
द्रौपद्यु उवाच:
अपि सिन्धोर्गिरेर्वापि किं पुनर्मर्त्यधर्मिणः ||
५२ ख
द्रौपद्यु उवाच:
उत्थानय़ुक्तः सततं परेषामन्तरैषणे |
५३ क
द्रौपद्यु उवाच:
आनृण्यमाप्नोति नरः परस्यात्मन एव च ||
५३ ख
द्रौपद्यु उवाच:
न चैवात्मावमन्तव्यः पुरुषेण कदाचन |
५४ क
द्रौपद्यु उवाच:
न ह्यात्मपरिभूतस्य भूतिर्भवति भारत ||
५४ ख
द्रौपद्यु उवाच:
एवं संस्थितिका सिद्धिरिय़ं लोकस्य भारत |
५५ क
द्रौपद्यु उवाच:
चित्रा सिद्धिगतिः प्रोक्ता कालावस्थाविभागतः ||
५५ ख
द्रौपद्यु उवाच:
व्राह्मणं मे पिता पूर्वं वासय़ामास पण्डितम् |
५६ क
द्रौपद्यु उवाच:
सोऽस्मा अर्थमिमं प्राह पित्रे मे भरतर्षभ ||
५६ ख
द्रौपद्यु उवाच:
नीतिं वृहस्पतिप्रोक्तां भ्रातॄन्मेऽग्राहय़त्पुरा |
५७ क
द्रौपद्यु उवाच:
तेषां साङ्कथ्यमश्रौषमहमेतत्तदा गृहे ||
५७ ख
द्रौपद्यु उवाच:
स मां राजन्कर्मवतीमागतामाह सान्त्वय़न् |
५८ क
द्रौपद्यु उवाच:
शुश्रूषमाणामासीनां पितुरङ्के युधिष्ठिर ||
५८ ख