chevron_left वन पर्व अध्याय ३३
द्रौपद्यु उवाच:
नावमन्ये न गर्हे च धर्मं पार्थ कथञ्चन |
१ क
द्रौपद्यु उवाच:
ईश्वरं कुत एवाहमवमंस्ये प्रजापतिम् ||
१ ख
द्रौपद्यु उवाच:
आर्ताहं प्रलपामीदमिति मां विद्धि भारत |
२ क
द्रौपद्यु उवाच:
भूय़श्च विलपिष्यामि सुमनास्तन्निवोध मे ||
२ ख
द्रौपद्यु उवाच:
कर्म खल्विह कर्तव्यं जातेनामित्रकर्शन |
३ क
द्रौपद्यु उवाच:
अकर्माणो हि जीवन्ति स्थावरा नेतरे जनाः ||
३ ख
द्रौपद्यु उवाच:
आ मातृस्तनपानाच्च यावच्छय़्योपसर्पणम् |
४ क
द्रौपद्यु उवाच:
जङ्गमाः कर्मणा वृत्तिमाप्नुवन्ति युधिष्ठिर ||
४ ख
द्रौपद्यु उवाच:
जङ्गमेषु विशेषेण मनुष्या भरतर्षभ |
५ क
द्रौपद्यु उवाच:
इच्छन्ति कर्मणा वृत्तिमवाप्तुं प्रेत्य चेह च ||
५ ख
द्रौपद्यु उवाच:
उत्थानमभिजानन्ति सर्वभूतानि भारत |
६ क
द्रौपद्यु उवाच:
प्रत्यक्षं फलमश्नन्ति कर्मणां लोकसाक्षिकम् ||
६ ख
द्रौपद्यु उवाच:
पश्यामि स्वं समुत्थानमुपजीवन्ति जन्तवः |
७ क
द्रौपद्यु उवाच:
अपि धाता विधाता च यथाय़मुदके वकः ||
७ ख
द्रौपद्यु उवाच:
स्वकर्म कुरु मा ग्लासीः कर्मणा भव दंशितः |
८ क
द्रौपद्यु उवाच:
कृत्यं हि योऽभिजानाति सहस्रे नास्ति सोऽस्ति वा ||
८ ख
द्रौपद्यु उवाच:
तस्य चापि भवेत्कार्यं विवृद्धौ रक्षणे तथा |
९ क
द्रौपद्यु उवाच:
भक्ष्यमाणो ह्यनावापः क्षीय़ते हिमवानपि ||
९ ख
द्रौपद्यु उवाच:
उत्सीदेरन्प्रजाः सर्वा न कुर्युः कर्म चेद्यदि |
१० क
द्रौपद्यु उवाच:
अपि चाप्यफलं कर्म पश्यामः कुर्वतो जनान् |
१० ख
द्रौपद्यु उवाच:
नान्यथा ह्यभिजानन्ति वृत्तिं लोके कथञ्चन ||
१० ग
द्रौपद्यु उवाच:
यश्च दिष्टपरो लोके यश्चाय़ं हठवादकः |
११ क
द्रौपद्यु उवाच:
उभावपसदावेतौ कर्मवुद्धिः प्रशस्यते ||
११ ख
द्रौपद्यु उवाच:
यो हि दिष्टमुपासीनो निर्विचेष्टः सुखं स्वपेत् |
१२ क
द्रौपद्यु उवाच:
अवसीदेत्सुदुर्वुद्धिरामो घट इवाम्भसि ||
१२ ख
द्रौपद्यु उवाच:
तथैव हठवुद्धिर्यः शक्तः कर्मण्यकर्मकृत् |
१३ क
द्रौपद्यु उवाच:
आसीत न चिरं जीवेदनाथ इव दुर्वलः ||
१३ ख
द्रौपद्यु उवाच:
अकस्मादपि यः कश्चिदर्थं प्राप्नोति पूरुषः |
१४ क
द्रौपद्यु उवाच:
तं हठेनेति मन्यन्ते स हि यत्नो न कस्यचित् ||
१४ ख
द्रौपद्यु उवाच:
यच्चापि किञ्चित्पुरुषो दिष्टं नाम लभत्युत |
१५ क
द्रौपद्यु उवाच:
दैवेन विधिना पार्थ तद्दैवमिति निश्चितम् ||
१५ ख
द्रौपद्यु उवाच:
यत्स्वय़ं कर्मणा किञ्चित्फलमाप्नोति पूरुषः |
१६ क
द्रौपद्यु उवाच:
प्रत्यक्षं चक्षुषा दृष्टं तत्पौरुषमिति स्मृतम् ||
१६ ख
द्रौपद्यु उवाच:
स्वभावतः प्रवृत्तोऽन्यः प्राप्नोत्यर्थानकारणात् |
१७ क
द्रौपद्यु उवाच:
तत्स्वभावात्मकं विद्धि फलं पुरुषसत्तम ||
१७ ख
द्रौपद्यु उवाच:
एवं हठाच्च दैवाच्च स्वभावात्कर्मणस्तथा |
१८ क
द्रौपद्यु उवाच:
यानि प्राप्नोति पुरुषस्तत्फलं पूर्वकर्मणः ||
१८ ख
द्रौपद्यु उवाच:
धातापि हि स्वकर्मैव तैस्तैर्हेतुभिरीश्वरः |
१९ क
द्रौपद्यु उवाच:
विदधाति विभज्येह फलं पूर्वकृतं नृणाम् ||
१९ ख
द्रौपद्यु उवाच:
यद्ध्ययं पुरुषः किञ्चित्कुरुते वै शुभाशुभम् |
२० क
द्रौपद्यु उवाच:
तद्धातृविहितं विद्धि पूर्वकर्मफलोदय़म् ||
२० ख
द्रौपद्यु उवाच:
कारणं तस्य देहोऽय़ं धातुः कर्मणि कर्मणि |
२१ क
द्रौपद्यु उवाच:
स यथा प्रेरय़त्येनं तथाय़ं कुरुतेऽवशः ||
२१ ख
द्रौपद्यु उवाच:
तेषु तेषु हि कृत्येषु विनिय़ोक्ता महेश्वरः |
२२ क
द्रौपद्यु उवाच:
सर्वभूतानि कौन्तेय़ कारय़त्यवशान्यपि ||
२२ ख
द्रौपद्यु उवाच:
मनसार्थान्विनिश्चित्य पश्चात्प्राप्नोति कर्मणा |
२३ क
द्रौपद्यु उवाच:
वुद्धिपूर्वं स्वय़ं धीरः पुरुषस्तत्र कारणम् ||
२३ ख
द्रौपद्यु उवाच:
सङ्ख्यातुं नैव शक्यानि कर्माणि पुरुषर्षभ |
२४ क
द्रौपद्यु उवाच:
अगारनगराणां हि सिद्धिः पुरुषहैतुकी ||
२४ ख
द्रौपद्यु उवाच:
तिले तैलं गवि क्षीरं काष्ठे पावकमन्ततः |
२५ क
द्रौपद्यु उवाच:
धिय़ा धीरो विजानीय़ादुपाय़ं चास्य सिद्धय़े ||
२५ ख
द्रौपद्यु उवाच:
ततः प्रवर्तते पश्चात्करणेष्वस्य सिद्धय़े |
२६ क
द्रौपद्यु उवाच:
तां सिद्धिमुपजीवन्ति कर्मणामिह जन्तवः ||
२६ ख
द्रौपद्यु उवाच:
कुशलेन कृतं कर्म कर्त्रा साधु विनिश्चितम् |
२७ क
द्रौपद्यु उवाच:
इदं त्वकुशलेनेति विशेषादुपलभ्यते ||
२७ ख
द्रौपद्यु उवाच:
इष्टापूर्तफलं न स्यान्न शिष्यो न गुरुर्भवेत् |
२८ क
द्रौपद्यु उवाच:
पुरुषः कर्मसाध्येषु स्याच्चेदय़मकारणम् ||
२८ ख
द्रौपद्यु उवाच:
कर्तृत्वादेव पुरुषः कर्मसिद्धौ प्रशस्यते |
२९ क
द्रौपद्यु उवाच:
असिद्धौ निन्द्यते चापि कर्मनाशः कथं त्विह ||
२९ ख
द्रौपद्यु उवाच:
सर्वमेव हठेनैके दिष्टेनैके वदन्त्युत |
३० क
द्रौपद्यु उवाच:
पुरुषप्रय़त्नजं केचित्त्रैधमेतन्निरुच्यते ||
३० ख
द्रौपद्यु उवाच:
न चैवैतावता कार्यं मन्यन्त इति चापरे |
३१ क
द्रौपद्यु उवाच:
अस्ति सर्वमदृश्यं तु दिष्टं चैव तथा हठः |
३१ ख
द्रौपद्यु उवाच:
दृश्यते हि हठाच्चैव दिष्टाच्चार्थस्य सन्ततिः ||
३१ ग
द्रौपद्यु उवाच:
किञ्चिद्दैवाद्धठात्किञ्चित्किञ्चिदेव स्वकर्मतः |
३२ क
द्रौपद्यु उवाच:
पुरुषः फलमाप्नोति चतुर्थं नात्र कारणम् |
३२ ख
द्रौपद्यु उवाच:
कुशलाः प्रतिजानन्ति ये तत्त्वविदुषो जनाः ||
३२ ग
द्रौपद्यु उवाच:
तथैव धाता भूतानामिष्टानिष्टफलप्रदः |
३३ क
द्रौपद्यु उवाच:
यदि न स्यान्न भूतानां कृपणो नाम कश्चन ||
३३ ख
द्रौपद्यु उवाच:
यं यमर्थमभिप्रेप्सुः कुरुते कर्म पूरुषः |
३४ क
द्रौपद्यु उवाच:
तत्तत्सफलमेव स्याद्यदि न स्यात्पुराकृतम् ||
३४ ख
द्रौपद्यु उवाच:
त्रिद्वारामर्थसिद्धिं तु नानुपश्यन्ति ये नराः |
३५ क
द्रौपद्यु उवाच:
तथैवानर्थसिद्धिं च यथा लोकास्तथैव ते ||
३५ ख
द्रौपद्यु उवाच:
कर्तव्यं त्वेव कर्मेति मनोरेष विनिश्चय़ः |
३६ क
द्रौपद्यु उवाच:
एकान्तेन ह्यनीहोऽय़ं पराभवति पूरुषः ||
३६ ख
द्रौपद्यु उवाच:
कुर्वतो हि भवत्येव प्राय़ेणेह युधिष्ठिर |
३७ क
द्रौपद्यु उवाच:
एकान्तफलसिद्धिं तु न विन्दत्यलसः क्वचित् ||
३७ ख
द्रौपद्यु उवाच:
असम्भवे त्वस्य हेतुः प्राय़श्चित्तं तु लक्ष्यते |
३८ क
द्रौपद्यु उवाच:
कृते कर्मणि राजेन्द्र तथानृण्यमवाप्यते ||
३८ ख
द्रौपद्यु उवाच:
अलक्ष्मीराविशत्येनं शय़ानमलसं नरम् |
३९ क
द्रौपद्यु उवाच:
निःसंशय़ं फलं लव्ध्वा दक्षो भूतिमुपाश्नुते ||
३९ ख
द्रौपद्यु उवाच:
अनर्थं संशय़ावस्थं वृण्वते मुक्तसंशय़ाः |
४० क
द्रौपद्यु उवाच:
धीरा नराः कर्मरता न तु निःसंशय़ं क्वचित् ||
४० ख
द्रौपद्यु उवाच:
एकान्तेन ह्यनर्थोऽय़ं वर्ततेऽस्मासु साम्प्रतम् |
४१ क
द्रौपद्यु उवाच:
न तु निःसंशय़ं न स्यात्त्वय़ि कर्मण्यवस्थिते ||
४१ ख
द्रौपद्यु उवाच:
अथ वा सिद्धिरेव स्यान्महिमा तु तथैव ते |
४२ क
द्रौपद्यु उवाच:
वृकोदरस्य वीभत्सोर्भ्रात्रोश्च यमय़ोरपि ||
४२ ख
द्रौपद्यु उवाच:
अन्येषां कर्म सफलमस्माकमपि वा पुनः |
४३ क
द्रौपद्यु उवाच:
विप्रकर्षेण वुध्येत कृतकर्मा यथा फलम् ||
४३ ख
द्रौपद्यु उवाच:
पृथिवीं लाङ्गलेनैव भित्त्वा वीजं वपत्युत |
४४ क
द्रौपद्यु उवाच:
आस्तेऽथ कर्षकस्तूष्णीं पर्जन्यस्तत्र कारणम् ||
४४ ख
द्रौपद्यु उवाच:
वृष्टिश्चेन्नानुगृह्णीय़ादनेनास्तत्र कर्षकः |
४५ क
द्रौपद्यु उवाच:
यदन्यः पुरुषः कुर्यात्कृतं तत्सकलं मय़ा ||
४५ ख
द्रौपद्यु उवाच:
तच्चेदफलमस्माकं नापराधोऽस्ति नः क्वचित् |
४६ क
द्रौपद्यु उवाच:
इति धीरोऽन्ववेक्ष्यैव नात्मानं तत्र गर्हय़ेत् ||
४६ ख
द्रौपद्यु उवाच:
कुर्वतो नार्थसिद्धिर्मे भवतीति ह भारत |
४७ क
द्रौपद्यु उवाच:
निर्वेदो नात्र गन्तव्यो द्वावेतौ ह्यस्य कर्मणः |
४७ ख
द्रौपद्यु उवाच:
सिद्धिर्वाप्यथ वासिद्धिरप्रवृत्तिरतोऽन्यथा ||
४७ ग
द्रौपद्यु उवाच:
वहूनां समवाय़े हि भावानां कर्म सिध्यति |
४८ क
द्रौपद्यु उवाच:
गुणाभावे फलं न्यूनं भवत्यफलमेव वा |
४८ ख