chevron_left उद्योग पर्व अध्याय ३४
विदुर उवाच:
ऐश्वर्यमदपापिष्ठा मदाः पानमदादय़ः |
५१ क
विदुर उवाच:
ऐश्वर्यमदमत्तो हि नापतित्वा विवुध्यते ||
५१ ख
विदुर उवाच:
इन्द्रिय़ैरिन्द्रिय़ार्थेषु वर्तमानैरनिग्रहैः |
५२ क
विदुर उवाच:
तैरय़ं ताप्यते लोको नक्षत्राणि ग्रहैरिव ||
५२ ख
विदुर उवाच:
यो जितः पञ्चवर्गेण सहजेनात्मकर्शिना |
५३ क
विदुर उवाच:
आपदस्तस्य वर्धन्ते शुक्लपक्ष इवोडुराट् ||
५३ ख
विदुर उवाच:
अविजित्य य आत्मानममात्यान्विजिगीषते |
५४ क
विदुर उवाच:
अमित्रान्वाजितामात्यः सोऽवशः परिहीय़ते ||
५४ ख
विदुर उवाच:
आत्मानमेव प्रथमं देशरूपेण यो जय़ेत् |
५५ क
विदुर उवाच:
ततोऽमात्यानमित्रांश्च न मोघं विजिगीषते ||
५५ ख
विदुर उवाच:
वश्येन्द्रिय़ं जितामात्यं धृतदण्डं विकारिषु |
५६ क
विदुर उवाच:
परीक्ष्यकारिणं धीरमत्यन्तं श्रीर्निषेवते ||
५६ ख
विदुर उवाच:
रथः शरीरं पुरुषस्य राज; न्नात्मा निय़न्तेन्द्रिय़ाण्यस्य चाश्वाः |
५७ क
विदुर उवाच:
तैरप्रमत्तः कुशलः सदश्वै; र्दान्तैः सुखं याति रथीव धीरः ||
५७ ख
विदुर उवाच:
एतान्यनिगृहीतानि व्यापादय़ितुमप्यलम् |
५८ क
विदुर उवाच:
अविधेय़ा इवादान्ता हय़ाः पथि कुसारथिम् ||
५८ ख
विदुर उवाच:
अनर्थमर्थतः पश्यन्नर्थं चैवाप्यनर्थतः |
५९ क
विदुर उवाच:
इन्द्रिय़ैः प्रसृतो वालः सुदुःखं मन्यते सुखम् ||
५९ ख
विदुर उवाच:
धर्मार्थौ यः परित्यज्य स्यादिन्द्रिय़वशानुगः |
६० क
विदुर उवाच:
श्रीप्राणधनदारेभ्य क्षिप्रं स परिहीय़ते ||
६० ख
विदुर उवाच:
अर्थानामीश्वरो यः स्यादिन्द्रिय़ाणामनीश्वरः |
६१ क
विदुर उवाच:
इन्द्रिय़ाणामनैश्वर्यादैश्वर्याद्भ्रश्यते हि सः ||
६१ ख
विदुर उवाच:
आत्मनात्मानमन्विच्छेन्मनोवुद्धीन्द्रिय़ैर्यतैः |
६२ क
विदुर उवाच:
आत्मैव ह्यात्मनो वन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः ||
६२ ख
विदुर उवाच:
क्षुद्राक्षेणेव जालेन झषावपिहितावुभौ |
६३ क
विदुर उवाच:
कामश्च राजन्क्रोधश्च तौ प्रज्ञानं विलुम्पतः ||
६३ ख
विदुर उवाच:
समवेक्ष्येह धर्मार्थौ सम्भारान्योऽधिगच्छति |
६४ क
विदुर उवाच:
स वै सम्भृतसम्भारः सततं सुखमेधते ||
६४ ख
विदुर उवाच:
यः पञ्चाभ्यन्तराञ्शत्रूनविजित्य मतिक्षय़ान् |
६५ क
विदुर उवाच:
जिगीषति रिपूनन्यान्रिपवोऽभिभवन्ति तम् ||
६५ ख
विदुर उवाच:
दृश्यन्ते हि दुरात्मानो वध्यमानाः स्वकर्मभिः |
६६ क
विदुर उवाच:
इन्द्रिय़ाणामनीशत्वाद्राजानो राज्यविभ्रमैः ||
६६ ख
विदुर उवाच:
असन्त्यागात्पापकृतामपापां; स्तुल्यो दण्डः स्पृशते मिश्रभावात् |
६७ क
विदुर उवाच:
शुष्केणार्द्रं दह्यते मिश्रभावा; त्तस्मात्पापैः सह सन्धिं न कुर्यात् ||
६७ ख
विदुर उवाच:
निजानुत्पततः शत्रून्पञ्च पञ्चप्रय़ोजनान् |
६८ क
विदुर उवाच:
यो मोहान्न निगृह्णाति तमापद्ग्रसते नरम् ||
६८ ख
विदुर उवाच:
अनसूय़ार्जवं शौचं सन्तोषः प्रिय़वादिता |
६९ क
विदुर उवाच:
दमः सत्यमनाय़ासो न भवन्ति दुरात्मनाम् ||
६९ ख
विदुर उवाच:
आत्मज्ञानमनाय़ासस्तितिक्षा धर्मनित्यता |
७० क
विदुर उवाच:
वाक्चैव गुप्ता दानं च नैतान्यन्त्येषु भारत ||
७० ख
विदुर उवाच:
आक्रोशपरिवादाभ्यां विहिंसन्त्यवुधा वुधान् |
७१ क
विदुर उवाच:
वक्ता पापमुपादत्ते क्षममाणो विमुच्यते ||
७१ ख
विदुर उवाच:
हिंसा वलमसाधूनां राज्ञां दण्डविधिर्वलम् |
७२ क
विदुर उवाच:
शुश्रूषा तु वलं स्त्रीणां क्षमा गुणवतां वलम् ||
७२ ख
विदुर उवाच:
वाक्संय़मो हि नृपते सुदुष्करतमो मतः |
७३ क
विदुर उवाच:
अर्थवच्च विचित्रं च न शक्यं वहु भाषितुम् ||
७३ ख
विदुर उवाच:
अभ्यावहति कल्याणं विविधा वाक्सुभाषिता |
७४ क
विदुर उवाच:
सैव दुर्भाषिता राजन्ननर्थाय़ोपपद्यते ||
७४ ख
विदुर उवाच:
संरोहति शरैर्विद्धं वनं परशुना हतम् |
७५ क
विदुर उवाच:
वाचा दुरुक्तं वीभत्सं न संरोहति वाक्क्षतम् ||
७५ ख
विदुर उवाच:
कर्णिनालीकनाराचा निर्हरन्ति शरीरतः |
७६ क
विदुर उवाच:
वाक्षल्यस्तु न निर्हर्तुं शक्यो हृदिशय़ो हि सः ||
७६ ख
विदुर उवाच:
वाक्साय़का वदनान्निष्पतन्ति; यैराहतः शोचति रात्र्यहानि |
७७ क
विदुर उवाच:
परस्य नामर्मसु ते पतन्ति; तान्पण्डितो नावसृजेत्परेषु ||
७७ ख
विदुर उवाच:
यस्मै देवाः प्रय़च्छन्ति पुरुषाय़ पराभवम् |
७८ क
विदुर उवाच:
वुद्धिं तस्यापकर्षन्ति सोऽपाचीनानि पश्यति ||
७८ ख
विदुर उवाच:
वुद्धौ कलुषभूताय़ां विनाशे प्रत्युपस्थिते |
७९ क
विदुर उवाच:
अनय़ो नय़सङ्काशो हृदय़ान्नापसर्पति ||
७९ ख
विदुर उवाच:
सेय़ं वुद्धिः परीता ते पुत्राणां तव भारत |
८० क
विदुर उवाच:
पाण्डवानां विरोधेन न चैनामववुध्यसे ||
८० ख
विदुर उवाच:
राजा लक्षणसम्पन्नस्त्रैलोक्यस्यापि यो भवेत् |
८१ क
विदुर उवाच:
शिष्यस्ते शासिता सोऽस्तु धृतराष्ट्र युधिष्ठिरः ||
८१ ख
विदुर उवाच:
अतीव सर्वान्पुत्रांस्ते भागधेय़पुरस्कृतः |
८२ क
विदुर उवाच:
तेजसा प्रज्ञय़ा चैव युक्तो धर्मार्थतत्त्ववित् ||
८२ ख
विदुर उवाच:
आनृशंस्यादनुक्रोशाद्योऽसौ धर्मभृतां वरः |
८३ क
विदुर उवाच:
गौरवात्तव राजेन्द्र वहून्क्लेशांस्तितिक्षति ||
८३ ख