chevron_left शान्ति पर्व अध्याय ३४०
युधिष्ठिर उवाच:
धर्माः पितामहेनोक्ता मोक्षधर्माश्रिताः शुभाः |
१ क
युधिष्ठिर उवाच:
धर्ममाश्रमिणां श्रेष्ठं वक्तुमर्हति मे भवान् ||
१ ख
भीष्म उवाच:
सर्वत्र विहितो धर्मः स्वर्ग्यः सत्यफलोदय़ः |
२ क
भीष्म उवाच:
वहुद्वारस्य धर्मस्य नेहास्ति विफला क्रिय़ा ||
२ ख
भीष्म उवाच:
यस्मिन्यस्मिंस्तु विषय़े यो यो याति विनिश्चय़म् |
३ क
भीष्म उवाच:
स तमेवाभिजानाति नान्यं भरतसत्तम ||
३ ख
भीष्म उवाच:
अपि च त्वं नरव्याघ्र श्रोतुमर्हसि मे कथाम् |
४ क
भीष्म उवाच:
पुरा शक्रस्य कथितां नारदेन सुरर्षिणा ||
४ ख
भीष्म उवाच:
सुरर्षिर्नारदो राजन्सिद्धस्त्रैलोक्यसंमतः |
५ क
भीष्म उवाच:
पर्येति क्रमशो लोकान्वाय़ुरव्याहतो यथा ||
५ ख
भीष्म उवाच:
स कदाचिन्महेष्वास देवराजालय़ं गतः |
६ क
भीष्म उवाच:
सत्कृतश्च महेन्द्रेण प्रत्यासन्नगतोऽभवत् ||
६ ख
भीष्म उवाच:
तं कृतक्षणमासीनं पर्यपृच्छच्छचीपतिः |
७ क
भीष्म उवाच:
व्रह्मर्षे किञ्चिदाश्चर्यमस्ति दृष्टं त्वय़ानघ ||
७ ख
भीष्म उवाच:
यथा त्वमपि विप्रर्षे त्रैलोक्यं सचराचरम् |
८ क
भीष्म उवाच:
जातकौतूहलो नित्यं सिद्धश्चरसि साक्षिवत् ||
८ ख
भीष्म उवाच:
न ह्यस्त्यविदितं लोके देवर्षे तव किञ्चन |
९ क
भीष्म उवाच:
श्रुतं वाप्यनुभूतं वा दृष्टं वा कथय़स्व मे ||
९ ख
भीष्म उवाच:
तस्मै राजन्सुरेन्द्राय़ नारदो वदतां वरः |
१० क
भीष्म उवाच:
आसीनाय़ोपपन्नाय़ प्रोक्तवान्विपुलां कथाम् ||
१० ख
भीष्म उवाच:
यथा येन च कल्पेन स तस्मै द्विजसत्तमः |
११ क
भीष्म उवाच:
कथां कथितवान्पृष्टस्तथा त्वमपि मे शृणु ||
११ ख