chevron_left शान्ति पर्व अध्याय ३५३
भीष्म उवाच:
स चामन्त्र्योरगश्रेष्ठं व्राह्मणः कृतनिश्चय़ः |
१ क
भीष्म उवाच:
दीक्षाकाङ्क्षी तदा राजंश्च्यवनं भार्गवं श्रितः ||
१ ख
भीष्म उवाच:
स तेन कृतसंस्कारो धर्ममेवोपतस्थिवान् |
२ क
भीष्म उवाच:
तथैव च कथामेतां राजन्कथितवांस्तदा ||
२ ख
भीष्म उवाच:
भार्गवेणापि राजेन्द्र जनकस्य निवेशने |
३ क
भीष्म उवाच:
कथैषा कथिता पुण्या नारदाय़ महात्मने ||
३ ख
भीष्म उवाच:
नारदेनापि राजेन्द्र देवेन्द्रस्य निवेशने |
४ क
भीष्म उवाच:
कथिता भरतश्रेष्ठ पृष्टेनाक्लिष्टकर्मणा ||
४ ख
भीष्म उवाच:
देवराजेन च पुरा कथैषा कथिता शुभा |
५ क
भीष्म उवाच:
समस्तेभ्यः प्रशस्तेभ्यो वसुभ्यो वसुधाधिप ||
५ ख
भीष्म उवाच:
यदा च मम रामेण युद्धमासीत्सुदारुणम् |
६ क
भीष्म उवाच:
वसुभिश्च तदा राजन्कथेय़ं कथिता मम ||
६ ख
भीष्म उवाच:
पृच्छमानाय़ तत्त्वेन मय़ा तुभ्यं विशां पते |
७ क
भीष्म उवाच:
कथेय़ं कथिता पुण्या धर्म्या धर्मभृतां वर ||
७ ख
भीष्म उवाच:
तदेष परमो धर्मो यन्मां पृच्छसि भारत |
८ क
भीष्म उवाच:
असन्नधीरनाकाङ्क्षी धर्मार्थकरणे नृप ||
८ ख
भीष्म उवाच:
स च किल कृतनिश्चय़ो द्विजाग्र्यो; भुजगपतिप्रतिदेशितार्थकृत्यः |
९ क
भीष्म उवाच:
यमनिय़मसमाहितो वनान्तं; परिगणितोञ्छशिलाशनः प्रविष्टः ||
९ ख