शौनक उवाच:
जरत्कारुरिति प्रोक्तं यत्त्वय़ा सूतनन्दन |
१ क
शौनक उवाच:
इच्छाम्येतदहं तस्य ऋषेः श्रोतुं महात्मनः ||
१ ख
शौनक उवाच:
किं कारणं जरत्कारोर्नामैतत्प्रथितं भुवि |
२ क
शौनक उवाच:
जरत्कारुनिरुक्तं त्वं यथावद्वक्तुमर्हसि ||
२ ख
सूत उवाच:
जरेति क्षय़माहुर्वै दारुणं कारुसञ्ज्ञितम् |
३ क
सूत उवाच:
शरीरं कारु तस्यासीत्तत्स धीमाञ्शनैः शनैः ||
३ ख
सूत उवाच:
क्षपय़ामास तीव्रेण तपसेत्यत उच्यते |
४ क
सूत उवाच:
जरत्कारुरिति व्रह्मन्वासुकेर्भगिनी तथा ||
४ ख
सूत उवाच:
एवमुक्तस्तु धर्मात्मा शौनकः प्राहसत्तदा |
५ क
सूत उवाच:
उग्रश्रवसमामन्त्र्य उपपन्नमिति व्रुवन् ||
५ ख
सूत उवाच:
अथ कालस्य महतः स मुनिः संशितव्रतः |
६ क
सूत उवाच:
तपस्यभिरतो धीमान्न दारानभ्यकाङ्क्षत ||
६ ख
सूत उवाच:
स ऊर्ध्वरेतास्तपसि प्रसक्तः; स्वाध्याय़वान्वीतभय़क्लमः सन् |
७ क
सूत उवाच:
चचार सर्वां पृथिवीं महात्मा; न चापि दारान्मनसाप्यकाङ्क्षत् ||
७ ख
सूत उवाच:
ततोऽपरस्मिन्सम्प्राप्ते काले कस्मिंश्चिदेव तु |
८ क
सूत उवाच:
परिक्षिदिति विख्यातो राजा कौरववंशभृत् ||
८ ख
सूत उवाच:
यथा पाण्डुर्महावाहुर्धनुर्धरवरो भुवि |
९ क
सूत उवाच:
वभूव मृगय़ाशीलः पुरास्य प्रपितामहः ||
९ ख
सूत उवाच:
मृगान्विध्यन्वराहांश्च तरक्षून्महिषांस्तथा |
१० क
सूत उवाच:
अन्यांश्च विविधान्वन्यांश्चचार पृथिवीपतिः ||
१० ख
सूत उवाच:
स कदाचिन्मृगं विद्ध्वा वाणेन नतपर्वणा |
११ क
सूत उवाच:
पृष्ठतो धनुरादाय़ ससार गहने वने ||
११ ख
सूत उवाच:
यथा हि भगवान्रुद्रो विद्ध्वा यज्ञमृगं दिवि |
१२ क
सूत उवाच:
अन्वगच्छद्धनुष्पाणिः पर्यन्वेषंस्ततस्ततः ||
१२ ख
सूत उवाच:
न हि तेन मृगो विद्धो जीवन्गच्छति वै वनम् |
१३ क
सूत उवाच:
पूर्वरूपं तु तन्नूनमासीत्स्वर्गगतिं प्रति |
१३ ख
सूत उवाच:
परिक्षितस्तस्य राज्ञो विद्धो यन्नष्टवान्मृगः ||
१३ ग
सूत उवाच:
दूरं चापहृतस्तेन मृगेण स महीपतिः |
१४ क
सूत उवाच:
परिश्रान्तः पिपासार्त आससाद मुनिं वने ||
१४ ख
सूत उवाच:
गवां प्रचारेष्वासीनं वत्सानां मुखनिःसृतम् |
१५ क
सूत उवाच:
भूय़िष्ठमुपय़ुञ्जानं फेनमापिवतां पय़ः ||
१५ ख
सूत उवाच:
तमभिद्रुत्य वेगेन स राजा संशितव्रतम् |
१६ क
सूत उवाच:
अपृच्छद्धनुरुद्यम्य तं मुनिं क्षुच्छ्रमान्वितः ||
१६ ख
सूत उवाच:
भो भो व्रह्मन्नहं राजा परिक्षिदभिमन्युजः |
१७ क
सूत उवाच:
मय़ा विद्धो मृगो नष्टः कच्चित्त्वं दृष्टवानसि ||
१७ ख
सूत उवाच:
स मुनिस्तस्य नोवाच किञ्चिन्मौनव्रते स्थितः |
१८ क
सूत उवाच:
तस्य स्कन्धे मृतं सर्पं क्रुद्धो राजा समासजत् ||
१८ ख
सूत उवाच:
धनुष्कोट्या समुत्क्षिप्य स चैनं समुदैक्षत |
१९ क
सूत उवाच:
न च किञ्चिदुवाचैनं शुभं वा यदि वाशुभम् ||
१९ ख
सूत उवाच:
स राजा क्रोधमुत्सृज्य व्यथितस्तं तथागतम् |
२० क
सूत उवाच:
दृष्ट्वा जगाम नगरमृषिस्त्वास्ते तथैव सः ||
२० ख
सूत उवाच:
तरुणस्तस्य पुत्रोऽभूत्तिग्मतेजा महातपाः |
२१ क
सूत उवाच:
शृङ्गी नाम महाक्रोधो दुष्प्रसादो महाव्रतः ||
२१ ख
सूत उवाच:
स देवं परमीशानं सर्वभूतहिते रतम् |
२२ क
सूत उवाच:
व्रह्माणमुपतस्थे वै काले काले सुसंय़तः |
२२ ख
सूत उवाच:
स तेन समनुज्ञातो व्रह्मणा गृहमेय़िवान् ||
२२ ग
सूत उवाच:
सख्योक्तः क्रीडमानेन स तत्र हसता किल |
२३ क
सूत उवाच:
संरम्भी कोपनोऽतीव विषकल्प ऋषेः सुतः |
२३ ख
सूत उवाच:
ऋषिपुत्रेण नर्मार्थं कृशेन द्विजसत्तम ||
२३ ग
सूत उवाच:
तेजस्विनस्तव पिता तथैव च तपस्विनः |
२४ क
सूत उवाच:
शवं स्कन्धेन वहति मा शृङ्गिन्गर्वितो भव ||
२४ ख
सूत उवाच:
व्याहरत्स्वृषिपुत्रेषु मा स्म किञ्चिद्वचो वदीः |
२५ क
सूत उवाच:
अस्मद्विधेषु सिद्धेषु व्रह्मवित्सु तपस्विषु ||
२५ ख
सूत उवाच:
क्व ते पुरुषमानित्वं क्व ते वाचस्तथाविधाः |
२६ क
सूत उवाच:
दर्पजाः पितरं यस्त्वं द्रष्टा शवधरं तथा ||
२६ ख