कुन्त्यु उवाच:
भगवञ्श्वशुरो मेऽसि दैवतस्यापि दैवतम् |
१ क
कुन्त्यु उवाच:
स मे देवातिदेवस्त्वं शृणु सत्यां गिरं मम ||
१ ख
कुन्त्यु उवाच:
तपस्वी कोपनो विप्रो दुर्वासा नाम मे पितुः |
२ क
कुन्त्यु उवाच:
भिक्षामुपागतो भोक्तुं तमहं पर्यतोषय़म् ||
२ ख
कुन्त्यु उवाच:
शौचेन त्वागसस्त्यागैः शुद्धेन मनसा तथा |
३ क
कुन्त्यु उवाच:
कोपस्थानेष्वपि महत्स्वकुप्यं न कदाचन ||
३ ख
कुन्त्यु उवाच:
स मे वरमदात्प्रीतः कृतमित्यहमव्रुवम् |
४ क
कुन्त्यु उवाच:
अवश्यं ते ग्रहीतव्यमिति मां सोऽव्रवीद्वचः ||
४ ख
कुन्त्यु उवाच:
ततः शापभय़ाद्विप्रमवोचं पुनरेव तम् |
५ क
कुन्त्यु उवाच:
एवमस्त्विति च प्राह पुनरेव स मां द्विजः ||
५ ख
कुन्त्यु उवाच:
धर्मस्य जननी भद्रे भवित्री त्वं वरानने |
६ क
कुन्त्यु उवाच:
वशे स्थास्यन्ति ते देवा यांस्त्वमावाहय़िष्यसि ||
६ ख
कुन्त्यु उवाच:
इत्युक्त्वान्तर्हितो विप्रस्ततोऽहं विस्मिताभवम् |
७ क
कुन्त्यु उवाच:
न च सर्वास्ववस्थासु स्मृतिर्मे विप्रणश्यति ||
७ ख
कुन्त्यु उवाच:
अथ हर्म्यतलस्थाहं रविमुद्यन्तमीक्षती |
८ क
कुन्त्यु उवाच:
संस्मृत्य तदृषेर्वाक्यं स्पृहय़न्ती दिवाकरम् |
८ ख
कुन्त्यु उवाच:
स्थिताहं वालभावेन तत्र दोषमवुध्यती ||
८ ग
कुन्त्यु उवाच:
अथ देवः सहस्रांशुर्मत्समीपगतोऽभवत् |
९ क
कुन्त्यु उवाच:
द्विधा कृत्वात्मनो देहं भूमौ च गगनेऽपि च |
९ ख
कुन्त्यु उवाच:
तताप लोकानेकेन द्वितीय़ेनागमच्च माम् ||
९ ग
कुन्त्यु उवाच:
स मामुवाच वेपन्तीं वरं मत्तो वृणीष्व ह |
१० क
कुन्त्यु उवाच:
गम्यतामिति तं चाहं प्रणम्य शिरसावदम् ||
१० ख
कुन्त्यु उवाच:
स मामुवाच तिग्मांशुर्वृथाह्वानं न ते क्षमम् |
११ क
कुन्त्यु उवाच:
धक्ष्यामि त्वां च विप्रं च येन दत्तो वरस्तव ||
११ ख
कुन्त्यु उवाच:
तमहं रक्षती विप्रं शापादनपराधिनम् |
१२ क
कुन्त्यु उवाच:
पुत्रो मे त्वत्समो देव भवेदिति ततोऽव्रुवम् ||
१२ ख
कुन्त्यु उवाच:
ततो मां तेजसाविश्य मोहय़ित्वा च भानुमान् |
१३ क
कुन्त्यु उवाच:
उवाच भविता पुत्रस्तवेत्यभ्यगमद्दिवम् ||
१३ ख
कुन्त्यु उवाच:
ततोऽहमन्तर्भवने पितुर्वृत्तान्तरक्षिणी |
१४ क
कुन्त्यु उवाच:
गूढोत्पन्नं सुतं वालं जले कर्णमवासृजम् ||
१४ ख
कुन्त्यु उवाच:
नूनं तस्यैव देवस्य प्रसादात्पुनरेव तु |
१५ क
कुन्त्यु उवाच:
कन्याहमभवं विप्र यथा प्राह स मामृषिः ||
१५ ख
कुन्त्यु उवाच:
स मय़ा मूढय़ा पुत्रो ज्ञाय़मानोऽप्युपेक्षितः |
१६ क
कुन्त्यु उवाच:
तन्मां दहति विप्रर्षे यथा सुविदितं तव ||
१६ ख
कुन्त्यु उवाच:
यदि पापमपापं वा तदेतद्विवृतं मय़ा |
१७ क
कुन्त्यु उवाच:
तन्मे भय़ं त्वं भगवन्व्यपनेतुमिहार्हसि ||
१७ ख
कुन्त्यु उवाच:
यच्चास्य राज्ञो विदितं हृदिस्थं भवतोऽनघ |
१८ क
कुन्त्यु उवाच:
तं चाय़ं लभतां काममद्यैव मुनिसत्तम ||
१८ ख
कुन्त्यु उवाच:
इत्युक्तः प्रत्युवाचेदं व्यासो वेदविदां वरः |
१९ क
कुन्त्यु उवाच:
साधु सर्वमिदं तथ्यमेवमेव यथात्थ माम् ||
१९ ख
कुन्त्यु उवाच:
अपराधश्च ते नास्ति कन्याभावं गता ह्यसि |
२० क
कुन्त्यु उवाच:
देवाश्चैश्वर्यवन्तो वै शरीराण्याविशन्ति वै ||
२० ख
कुन्त्यु उवाच:
सन्ति देवनिकाय़ाश्च सङ्कल्पाज्जनय़न्ति ये |
२१ क
कुन्त्यु उवाच:
वाचा दृष्ट्या तथा स्पर्शात्सङ्घर्षेणेति पञ्चधा ||
२१ ख
कुन्त्यु उवाच:
मनुष्यधर्मो दैवेन धर्मेण न हि युज्यते |
२२ क
कुन्त्यु उवाच:
इति कुन्ति व्यजानीहि व्येतु ते मानसो ज्वरः ||
२२ ख
कुन्त्यु उवाच:
सर्वं वलवतां पथ्यं सर्वं वलवतां शुचि |
२३ क
कुन्त्यु उवाच:
सर्वं वलवतां धर्मः सर्वं वलवतां स्वकम् ||
२३ ख