सूत उवाच:
अन्येषामपि वृत्त्युपरोधं करोष्येवं वर्तमानः |
४१ ग
सूत उवाच:
लुव्धोऽसीति ||
४१ घ
सूत उवाच:
स तथेत्युक्त्वा गा अरक्षत् |
४२ क
सूत उवाच:
रक्षित्वा च पुनरुपाध्याय़गृहमागम्योपाध्याय़स्याग्रतः स्थित्वा नमश्चक्रे ||
४२ ख
सूत उवाच:
तमुपाध्याय़स्तथापि पीवानमेव दृष्ट्वा पुनरुवाच |
४३ क
सूत उवाच:
अहं ते सर्वं भैक्षं गृह्णामि न चान्यच्चरसि |
४३ ख
सूत उवाच:
केन वृत्तिं कल्पय़सीति ||
४३ घ
सूत उवाच:
स उपाध्याय़ं प्रत्युवाच |
४४ क
सूत उवाच:
भो एतासां गवां पय़सा वृत्तिं कल्पय़ामीति ||
४४ ख
सूत उवाच:
तमुपाध्याय़ः प्रत्युवाच |
४५ क
सूत उवाच:
नैतन्न्याय़्यं पय़ उपय़ोक्तुं भवतो मय़ाननुज्ञातमिति ||
४५ ख
सूत उवाच:
स तथेति प्रतिज्ञाय़ गा रक्षित्वा पुनरुपाध्याय़गृहानेत्य गुरोरग्रतः स्थित्वा नमश्चक्रे ||
४६ क
सूत उवाच:
तमुपाध्याय़ः पीवानमेवापश्यत् |
४७ क
सूत उवाच:
उवाच चैनम् |
४७ ख
सूत उवाच:
भैक्षं नाश्नासि न चान्यच्चरसि |
४७ ग
सूत उवाच:
पय़ो न पिवसि |
४७ घ
सूत उवाच:
केन वृत्तिं कल्पय़सीति ||
४७ 6
सूत उवाच:
स एवमुक्त उपाध्याय़ं प्रत्युवाच |
४८ क
सूत उवाच:
भोः फेनं पिवामि यमिमे वत्सा मातृणां स्तनं पिवन्त उद्गिरन्तीति ||
४८ ख
सूत उवाच:
तमुपाध्याय़ः प्रत्युवाच |
४९ क
सूत उवाच:
एते त्वदनुकम्पय़ा गुणवन्तो वत्साः प्रभूततरं फेनमुद्गिरन्ति |
४९ ख
सूत उवाच:
तदेवमपि वत्सानां वृत्त्युपरोधं करोष्येवं वर्तमानः |
४९ ग
सूत उवाच:
फेनमपि भवान्न पातुमर्हतीति ||
४९ घ
सूत उवाच:
स तथेति प्रतिज्ञाय़ निराहारस्ता गा अरक्षत् |
५० क
सूत उवाच:
तथा प्रतिषिद्धो भैक्षं नाश्नाति न चान्यच्चरति |
५० ख
सूत उवाच:
पय़ो न पिवति |
५० ग
सूत उवाच:
फेनं नोपय़ुङ्क्ते ||
५० घ
सूत उवाच:
स कदाचिदरण्ये क्षुधार्तोऽर्कपत्राण्यभक्षय़त् ||
५१ क
सूत उवाच:
स तैरर्कपत्रैर्भक्षितैः क्षारकटूष्णविपाकिभिश्चक्षुष्युपहतोऽन्धोऽभवत् |
५२ क
सूत उवाच:
सोऽन्धोऽपि चङ्क्रम्यमाणः कूपेऽपतत् ||
५२ ख
सूत उवाच:
अथ तस्मिन्ननागच्छत्युपाध्याय़ः शिष्यानवोचत् |
५३ क
सूत उवाच:
मय़ोपमन्युः सर्वतः प्रतिषिद्धः |
५३ ख
सूत उवाच:
स निय़तं कुपितः |
५३ ग
सूत उवाच:
ततो नागच्छति चिरगतश्चेति ||
५३ घ
सूत उवाच:
स एवमुक्त्वा गत्वारण्यमुपमन्योराह्वानं चक्रे |
५४ क
सूत उवाच:
भो उपमन्यो क्वासि |
५४ ख
सूत उवाच:
वत्सैहीति ||
५४ ग
सूत उवाच:
स तदाह्वानमुपाध्याय़ाच्छ्रुत्वा प्रत्युवाचोच्चैः |
५५ क
सूत उवाच:
अय़मस्मि भो उपाध्याय़ कूपे पतित इति ||
५५ ख
सूत उवाच:
तमुपाध्याय़ः प्रत्युवाच |
५६ क
सूत उवाच:
कथमसि कूपे पतित इति ||
५६ ख
सूत उवाच:
स तं प्रत्युवाच |
५७ क
सूत उवाच:
अर्कपत्राणि भक्षय़ित्वान्धीभूतोऽस्मि |
५७ ख
सूत उवाच:
अतः कूपे पतित इति ||
५७ ग
सूत उवाच:
तमुपाध्याय़ः प्रत्युवाच |
५८ क
सूत उवाच:
अश्विनौ स्तुहि |
५८ ख
सूत उवाच:
तौ त्वां चक्षुष्मन्तं करिष्यतो देवभिषजाविति ||
५८ ग
सूत उवाच:
स एवमुक्त उपाध्याय़ेन स्तोतुं प्रचक्रमे देवावश्विनौ वाग्भिरृग्भिः ||
५९ क
सूत उवाच:
प्र पूर्वगौ पूर्वजौ चित्रभानू; गिरा वा शंसामि तपनावनन्तौ |
६० क
सूत उवाच:
दिव्यौ सुपर्णौ विरजौ विमाना; वधिक्षिय़न्तौ भुवनानि विश्वा ||
६० ख
सूत उवाच:
हिरण्मय़ौ शकुनी साम्पराय़ौ; नासत्यदस्रौ सुनसौ वैजय़न्तौ |
६१ क
सूत उवाच:
शुक्रं वय़न्तौ तरसा सुवेमा; वभि व्ययन्तावसितं विवस्वत् ||
६१ ख
सूत उवाच:
ग्रस्तां सुपर्णस्य वलेन वर्तिका; ममुञ्चतामश्विनौ सौभगाय़ |
६२ क
सूत उवाच:
तावत्सुवृत्तावनमन्त माय़या; सत्तमा गा अरुणा उदावहन् ||
६२ ख
सूत उवाच:
षष्टिश्च गावस्त्रिशताश्च धेनव; एकं वत्सं सुवते तं दुहन्ति |
६३ क
सूत उवाच:
नानागोष्ठा विहिता एकदोहना; स्तावश्विनौ दुहतो घर्ममुक्थ्यम् ||
६३ ख
सूत उवाच:
एकां नाभिं सप्तशता अराः श्रिताः; प्रधिष्वन्या विंशतिरर्पिता अराः |
६४ क
सूत उवाच:
अनेमि चक्रं परिवर्ततेऽजरं; माय़ाश्विनौ समनक्ति चर्षणी ||
६४ ख
सूत उवाच:
एकं चक्रं वर्तते द्वादशारं प्रधि; षण्णाभिमेकाक्षममृतस्य धारणम् |
६५ क
सूत उवाच:
यस्मिन्देवा अधि विश्वे विषक्ता; स्तावश्विनौ मुञ्चतो मा विषीदतम् ||
६५ ख
सूत उवाच:
अश्विनाविन्द्रममृतं वृत्तभूय़ौ; तिरोधत्तामश्विनौ दासपत्नी |
६६ क
सूत उवाच:
भित्त्वा गिरिमश्विनौ गामुदाचरन्तौ; तद्वृष्टमह्ना प्रथिता वलस्य ||
६६ ख
सूत उवाच:
युवां दिशो जनय़थो दशाग्रे; समानं मूर्ध्नि रथय़ा विय़न्ति |
६७ क
सूत उवाच:
तासां यातमृषय़ोऽनुप्रय़ान्ति; देवा मनुष्याः क्षितिमाचरन्ति ||
६७ ख
सूत उवाच:
युवां वर्णान्विकुरुथो विश्वरूपां; स्तेऽधिक्षिय़न्ति भुवनानि विश्वा |
६८ क
सूत उवाच:
ते भानवोऽप्यनुसृताश्चरन्ति; देवा मनुष्याः क्षितिमाचरन्ति ||
६८ ख
सूत उवाच:
तौ नासत्यावश्विनावामहे वां; स्रजं च यां विभृथः पुष्करस्य |
६९ क
सूत उवाच:
तौ नासत्यावमृतावृतावृधा; वृते देवास्तत्प्रपदेन सूते ||
६९ ख
सूत उवाच:
मुखेन गर्भं लभतां युवानौ; गतासुरेतत्प्रपदेन सूते |
७० क
सूत उवाच:
सद्यो जातो मातरमत्ति गर्भ; स्तावश्विनौ मुञ्चथो जीवसे गाः ||
७० ख
सूत उवाच:
एवं तेनाभिष्टुतावश्विनावाजग्मतुः |
७१ क
सूत उवाच:
आहतुश्चैनम् |
७१ ख
सूत उवाच:
प्रीतौ स्वः |
७१ ग
सूत उवाच:
एष तेऽपूपः |
७१ घ
सूत उवाच:
अशानैनमिति ||
७१ 5
सूत उवाच:
स एवमुक्तः प्रत्युवाच |
७२ क
सूत उवाच:
नानृतमूचतुर्भवन्तौ |
७२ ख
सूत उवाच:
न त्वहमेतमपूपमुपय़ोक्तुमुत्सहे अनिवेद्य गुरव इति ||
७२ ग
सूत उवाच:
ततस्तमश्विनावूचतुः |
७३ क
सूत उवाच:
आवाभ्यां पुरस्ताद्भवत उपाध्याय़ेनैवमेवाभिष्टुताभ्यामपूपः प्रीताभ्यां दत्तः |
७३ ख
सूत उवाच:
उपय़ुक्तश्च स तेनानिवेद्य गुरवे |
७३ ग
सूत उवाच:
त्वमपि तथैव कुरुष्व यथा कृतमुपाध्याय़ेनेति ||
७३ घ
सूत उवाच:
स एवमुक्तः पुनरेव प्रत्युवाचैतौ |
७४ क
सूत उवाच:
प्रत्यनुनय़े भवन्तावश्विनौ |
७४ ख
सूत उवाच:
नोत्सहेऽहमनिवेद्योपाध्याय़ाय़ोपय़ोक्तुमिति ||
७४ ग
सूत उवाच:
तमश्विनावाहतुः |
७५ क
सूत उवाच:
प्रीतौ स्वस्तवानय़ा गुरुवृत्त्या |
७५ ख
सूत उवाच:
उपाध्याय़स्य ते कार्ष्णाय़सा दन्ताः |
७५ ग
सूत उवाच:
भवतो हिरण्मय़ा भविष्यन्ति |
७५ घ
सूत उवाच:
चक्षुष्मांश्च भविष्यसि |
७५ 5
सूत उवाच:
श्रेय़श्चावाप्स्यसीति ||
७५ 6
सूत उवाच:
स एवमुक्तोऽश्विभ्यां लव्धचक्षुरुपाध्याय़सकाशमागम्योपाध्याय़मभिवाद्याचचक्षे |
७६ क
सूत उवाच:
स चास्य प्रीतिमानभूत् ||
७६ ख
सूत उवाच:
आह चैनम् |
७७ क
सूत उवाच:
यथाश्विनावाहतुस्तथा त्वं श्रेय़ोऽवाप्स्यसीति |
७७ ख
सूत उवाच:
सर्वे च ते वेदाः प्रतिभास्यन्तीति ||
७७ ग
सूत उवाच:
एषा तस्यापि परीक्षोपमन्योः ||
७८ क
सूत उवाच:
अथापरः शिष्यस्तस्यैवाय़ोदस्य धौम्यस्य वेदो नाम ||
७९ क