chevron_left आदि पर्व अध्याय ३९
तक्षक उवाच:
दष्टं यदि मय़ेह त्वं शक्तः किञ्चिच्चिकित्सितुम् |
१ क
तक्षक उवाच:
ततो वृक्षं मय़ा दष्टमिमं जीवय़ काश्यप ||
१ ख
तक्षक उवाच:
परं मन्त्रवलं यत्ते तद्दर्शय़ यतस्व च |
२ क
तक्षक उवाच:
न्यग्रोधमेनं धक्ष्यामि पश्यतस्ते द्विजोत्तम ||
२ ख
काश्यप उवाच:
दश नागेन्द्र वृक्षं त्वं यमेनमभिमन्यसे |
३ क
काश्यप उवाच:
अहमेनं त्वय़ा दष्टं जीवय़िष्ये भुजङ्गम ||
३ ख
सूत उवाच:
एवमुक्तः स नागेन्द्रः काश्यपेन महात्मना |
४ क
सूत उवाच:
अदशद्वृक्षमभ्येत्य न्यग्रोधं पन्नगोत्तमः ||
४ ख
सूत उवाच:
स वृक्षस्तेन दष्टः सन्सद्य एव महाद्युते |
५ क
सूत उवाच:
आशीविषविषोपेतः प्रजज्वाल समन्ततः ||
५ ख
सूत उवाच:
तं दग्ध्वा स नगं नागः काश्यपं पुनरव्रवीत् |
६ क
सूत उवाच:
कुरु यत्नं द्विजश्रेष्ठ जीवय़ैनं वनस्पतिम् ||
६ ख
सूत उवाच:
भस्मीभूतं ततो वृक्षं पन्नगेन्द्रस्य तेजसा |
७ क
सूत उवाच:
भस्म सर्वं समाहृत्य काश्यपो वाक्यमव्रवीत् ||
७ ख
सूत उवाच:
विद्यावलं पन्नगेन्द्र पश्य मेऽस्मिन्वनस्पतौ |
८ क
सूत उवाच:
अहं सञ्जीवय़ाम्येनं पश्यतस्ते भुजङ्गम ||
८ ख
सूत उवाच:
ततः स भगवान्विद्वान्काश्यपो द्विजसत्तमः |
९ क
सूत उवाच:
भस्मराशीकृतं वृक्षं विद्यया समजीवय़त् ||
९ ख
सूत उवाच:
अङ्कुरं तं स कृतवांस्ततः पर्णद्वय़ान्वितम् |
१० क
सूत उवाच:
पलाशिनं शाखिनं च तथा विटपिनं पुनः ||
१० ख
सूत उवाच:
तं दृष्ट्वा जीवितं वृक्षं काश्यपेन महात्मना |
११ क
सूत उवाच:
उवाच तक्षको व्रह्मन्नेतदत्यद्भुतं त्वय़ि ||
११ ख
सूत उवाच:
विप्रेन्द्र यद्विषं हन्या मम वा मद्विधस्य वा |
१२ क
सूत उवाच:
कं त्वमर्थमभिप्रेप्सुर्यासि तत्र तपोधन ||
१२ ख
सूत उवाच:
यत्तेऽभिलषितं प्राप्तुं फलं तस्मान्नृपोत्तमात् |
१३ क
सूत उवाच:
अहमेव प्रदास्यामि तत्ते यद्यपि दुर्लभम् ||
१३ ख
सूत उवाच:
विप्रशापाभिभूते च क्षीणाय़ुषि नराधिपे |
१४ क
सूत उवाच:
घटमानस्य ते विप्र सिद्धिः संशय़िता भवेत् ||
१४ ख
सूत उवाच:
ततो यशः प्रदीप्तं ते त्रिषु लोकेषु विश्रुतम् |
१५ क
सूत उवाच:
विरश्मिरिव घर्मांशुरन्तर्धानमितो व्रजेत् ||
१५ ख
काश्यप उवाच:
धनार्थी याम्यहं तत्र तन्मे दित्स भुजङ्गम |
१६ क
काश्यप उवाच:
ततोऽहं विनिवर्तिष्ये गृहाय़ोरगसत्तम ||
१६ ख
तक्षक उवाच:
यावद्धनं प्रार्थय़से तस्माद्राज्ञस्ततोऽधिकम् |
१७ क
तक्षक उवाच:
अहं तेऽद्य प्रदास्यामि निवर्तस्व द्विजोत्तम ||
१७ ख
सूत उवाच:
तक्षकस्य वचः श्रुत्वा काश्यपो द्विजसत्तमः |
१८ क
सूत उवाच:
प्रदध्यौ सुमहातेजा राजानं प्रति वुद्धिमान् ||
१८ ख
सूत उवाच:
दिव्यज्ञानः स तेजस्वी ज्ञात्वा तं नृपतिं तदा |
१९ क
सूत उवाच:
क्षीणाय़ुषं पाण्डवेय़मपावर्तत काश्यपः |
१९ ख
सूत उवाच:
लव्ध्वा वित्तं मुनिवरस्तक्षकाद्यावदीप्सितम् ||
१९ ग
सूत उवाच:
निवृत्ते काश्यपे तस्मिन्समय़ेन महात्मनि |
२० क
सूत उवाच:
जगाम तक्षकस्तूर्णं नगरं नागसाह्वय़म् ||
२० ख
सूत उवाच:
अथ शुश्राव गच्छन्स तक्षको जगतीपतिम् |
२१ क
सूत उवाच:
मन्त्रागदैर्विषहरै रक्ष्यमाणं प्रय़त्नतः ||
२१ ख
सूत उवाच:
स चिन्तय़ामास तदा माय़ाय़ोगेन पार्थिवः |
२२ क
सूत उवाच:
मय़ा वञ्चय़ितव्योऽसौ क उपाय़ो भवेदिति ||
२२ ख
सूत उवाच:
ततस्तापसरूपेण प्राहिणोत्स भुजङ्गमान् |
२३ क
सूत उवाच:
फलपत्रोदकं गृह्य राज्ञे नागोऽथ तक्षकः ||
२३ ख
तक्षक उवाच:
गच्छध्वं यूय़मव्यग्रा राजानं कार्यवत्तय़ा |
२४ क
तक्षक उवाच:
फलपत्रोदकं नाम प्रतिग्राहय़ितुं नृपम् ||
२४ ख
सूत उवाच:
ते तक्षकसमादिष्टास्तथा चक्रुर्भुजङ्गमाः |
२५ क
सूत उवाच:
उपनिन्युस्तथा राज्ञे दर्भानापः फलानि च ||
२५ ख
सूत उवाच:
तच्च सर्वं स राजेन्द्रः प्रतिजग्राह वीर्यवान् |
२६ क
सूत उवाच:
कृत्वा च तेषां कार्याणि गम्यतामित्युवाच तान् ||
२६ ख
सूत उवाच:
गतेषु तेषु नागेषु तापसच्छद्मरूपिषु |
२७ क
सूत उवाच:
अमात्यान्सुहृदश्चैव प्रोवाच स नराधिपः ||
२७ ख
सूत उवाच:
भक्षय़न्तु भवन्तो वै स्वादूनीमानि सर्वशः |
२८ क
सूत उवाच:
तापसैरुपनीतानि फलानि सहिता मय़ा ||
२८ ख
सूत उवाच:
ततो राजा ससचिवः फलान्यादातुमैच्छत |
२९ क
सूत उवाच:
यद्गृहीतं फलं राज्ञा तत्र कृमिरभूदणुः |
२९ ख
सूत उवाच:
ह्रस्वकः कृष्णनय़नस्ताम्रो वर्णेन शौनक ||
२९ ग
सूत उवाच:
स तं गृह्य नृपश्रेष्ठः सचिवानिदमव्रवीत् |
३० क
सूत उवाच:
अस्तमभ्येति सविता विषादद्य न मे भय़म् ||
३० ख
सूत उवाच:
सत्यवागस्तु स मुनिः कृमिको मां दशत्वय़म् |
३१ क
सूत उवाच:
तक्षको नाम भूत्वा वै तथा परिहृतं भवेत् ||
३१ ख
सूत उवाच:
ते चैनमन्ववर्तन्त मन्त्रिणः कालचोदिताः |
३२ क
सूत उवाच:
एवमुक्त्वा स राजेन्द्रो ग्रीवाय़ां संनिवेश्य ह |
३२ ख
सूत उवाच:
कृमिकं प्राहसत्तूर्णं मुमूर्षुर्नष्टचेतनः ||
३२ ग
सूत उवाच:
हसन्नेव च भोगेन तक्षकेणाभिवेष्टितः |
३३ क
सूत उवाच:
तस्मात्फलाद्विनिष्क्रम्य यत्तद्राज्ञे निवेदितम् ||
३३ ख