chevron_left उद्योग पर्व अध्याय ३९
धृतराष्ट्र उवाच:
अनीश्वरोऽय़ं पुरुषो भवाभवे; सूत्रप्रोता दारुमय़ीव योषा |
१ क
धृतराष्ट्र उवाच:
धात्रा तु दिष्टस्य वशे किलाय़ं; तस्माद्वद त्वं श्रवणे धृतोऽहम् ||
१ ख
विदुर उवाच:
अप्राप्तकालं वचनं वृहस्पतिरपि व्रुवन् |
२ क
विदुर उवाच:
लभते वुद्ध्यवज्ञानमवमानं च भारत ||
२ ख
विदुर उवाच:
प्रिय़ो भवति दानेन प्रिय़वादेन चापरः |
३ क
विदुर उवाच:
मन्त्रं मूलवलेनान्यो यः प्रिय़ः प्रिय़ एव सः ||
३ ख
विदुर उवाच:
द्वेष्यो न साधुर्भवति न मेधावी न पण्डितः |
४ क
विदुर उवाच:
प्रिय़े शुभानि कर्माणि द्वेष्ये पापानि भारत ||
४ ख
विदुर उवाच:
न स क्षय़ो महाराज यः क्षय़ो वृद्धिमावहेत् |
५ क
विदुर उवाच:
क्षय़ः स त्विह मन्तव्यो यं लव्ध्वा वहु नाशय़ेत् ||
५ ख
विदुर उवाच:
समृद्धा गुणतः केचिद्भवन्ति धनतोऽपरे |
६ क
विदुर उवाच:
धनवृद्धान्गुणैर्हीनान्धृतराष्ट्र विवर्जय़ेत् ||
६ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
सर्वं त्वमाय़तीय़ुक्तं भाषसे प्राज्ञसंमतम् |
७ क
धृतराष्ट्र उवाच:
न चोत्सहे सुतं त्यक्तुं यतो धर्मस्ततो जय़ः ||
७ ख
विदुर उवाच:
स्वभावगुणसम्पन्नो न जातु विनय़ान्वितः |
८ क
विदुर उवाच:
सुसूक्ष्ममपि भूतानामुपमर्दं प्रय़ोक्ष्यते ||
८ ख
विदुर उवाच:
परापवादनिरताः परदुःखोदय़ेषु च |
९ क
विदुर उवाच:
परस्परविरोधे च यतन्ते सततोत्थिताः ||
९ ख
विदुर उवाच:
सदोषं दर्शनं येषां संवासे सुमहद्भय़म् |
१० क
विदुर उवाच:
अर्थादाने महान्दोषः प्रदाने च महद्भय़म् ||
१० ख
विदुर उवाच:
ये पापा इति विख्याताः संवासे परिगर्हिताः |
११ क
विदुर उवाच:
युक्ताश्चान्यैर्महादोषैर्ये नरास्तान्विवर्जय़ेत् ||
११ ख
विदुर उवाच:
निवर्तमाने सौहार्दे प्रीतिर्नीचे प्रणश्यति |
१२ क
विदुर उवाच:
या चैव फलनिर्वृत्तिः सौहृदे चैव यत्सुखम् ||
१२ ख
विदुर उवाच:
यतते चापवादाय़ यत्नमारभते क्षय़े |
१३ क
विदुर उवाच:
अल्पेऽप्यपकृते मोहान्न शान्तिमुपगच्छति ||
१३ ख
विदुर उवाच:
तादृशैः सङ्गतं नीचैर्नृशंसैरकृतात्मभिः |
१४ क
विदुर उवाच:
निशाम्य निपुणं वुद्ध्या विद्वान्दूराद्विवर्जय़ेत् ||
१४ ख
विदुर उवाच:
यो ज्ञातिमनुगृह्णाति दरिद्रं दीनमातुरम् |
१५ क
विदुर उवाच:
स पुत्रपशुभिर्वृद्धिं यशश्चाव्ययमश्नुते ||
१५ ख
विदुर उवाच:
ज्ञातय़ो वर्धनीय़ास्तैर्य इच्छन्त्यात्मनः शुभम् |
१६ क
विदुर उवाच:
कुलवृद्धिं च राजेन्द्र तस्मात्साधु समाचर ||
१६ ख
विदुर उवाच:
श्रेय़सा योक्ष्यसे राजन्कुर्वाणो ज्ञातिसत्क्रिय़ाम् |
१७ क
विदुर उवाच:
विगुणा ह्यपि संरक्ष्या ज्ञातय़ो भरतर्षभ ||
१७ ख
विदुर उवाच:
किं पुनर्गुणवन्तस्ते त्वत्प्रसादाभिकाङ्क्षिणः |
१८ क
विदुर उवाच:
प्रसादं कुरु दीनानां पाण्डवानां विशां पते ||
१८ ख
विदुर उवाच:
दीय़न्तां ग्रामकाः केचित्तेषां वृत्त्यर्थमीश्वर |
१९ क
विदुर उवाच:
एवं लोके यशःप्राप्तो भविष्यसि नराधिप ||
१९ ख
विदुर उवाच:
वृद्धेन हि त्वय़ा कार्यं पुत्राणां तात रक्षणम् |
२० क
विदुर उवाच:
मय़ा चापि हितं वाच्यं विद्धि मां त्वद्धितैषिणम् ||
२० ख
विदुर उवाच:
ज्ञातिभिर्विग्रहस्तात न कर्तव्यो भवार्थिना |
२१ क
विदुर उवाच:
सुखानि सह भोज्यानि ज्ञातिभिर्भरतर्षभ ||
२१ ख
विदुर उवाच:
सम्भोजनं सङ्कथनं सम्प्रीतिश्च परस्परम् |
२२ क
विदुर उवाच:
ज्ञातिभिः सह कार्याणि न विरोधः कथञ्चन ||
२२ ख
विदुर उवाच:
ज्ञातय़स्तारय़न्तीह ज्ञातय़ो मज्जय़न्ति च |
२३ क
विदुर उवाच:
सुवृत्तास्तारय़न्तीह दुर्वृत्ता मज्जय़न्ति च ||
२३ ख
विदुर उवाच:
सुवृत्तो भव राजेन्द्र पाण्डवान्प्रति मानद |
२४ क
विदुर उवाच:
अधर्षणीय़ः शत्रूणां तैर्वृतस्त्वं भविष्यसि ||
२४ ख
विदुर उवाच:
श्रीमन्तं ज्ञातिमासाद्य यो ज्ञातिरवसीदति |
२५ क
विदुर उवाच:
दिग्धहस्तं मृग इव स एनस्तस्य विन्दति ||
२५ ख
विदुर उवाच:
पश्चादपि नरश्रेष्ठ तव तापो भविष्यति |
२६ क
विदुर उवाच:
तान्वा हतान्सुतान्वापि श्रुत्वा तदनुचिन्तय़ ||
२६ ख
विदुर उवाच:
येन खट्वां समारूढः परितप्येत कर्मणा |
२७ क
विदुर उवाच:
आदावेव न तत्कुर्यादध्रुवे जीविते सति ||
२७ ख
विदुर उवाच:
न कश्चिन्नापनय़ते पुमानन्यत्र भार्गवात् |
२८ क
विदुर उवाच:
शेषसम्प्रतिपत्तिस्तु वुद्धिमत्स्वेव तिष्ठति ||
२८ ख
विदुर उवाच:
दुर्योधनेन यद्येतत्पापं तेषु पुरा कृतम् |
२९ क
विदुर उवाच:
त्वय़ा तत्कुलवृद्धेन प्रत्यानेय़ं नरेश्वर ||
२९ ख
विदुर उवाच:
तांस्त्वं पदे प्रतिष्ठाप्य लोके विगतकल्मषः |
३० क
विदुर उवाच:
भविष्यसि नरश्रेष्ठ पूजनीय़ो मनीषिणाम् ||
३० ख
विदुर उवाच:
सुव्याहृतानि धीराणां फलतः प्रविचिन्त्य यः |
३१ क
विदुर उवाच:
अध्यवस्यति कार्येषु चिरं यशसि तिष्ठति ||
३१ ख
विदुर उवाच:
अवृत्तिं विनय़ो हन्ति हन्त्यनर्थं पराक्रमः |
३२ क
विदुर उवाच:
हन्ति नित्यं क्षमा क्रोधमाचारो हन्त्यलक्षणम् ||
३२ ख
विदुर उवाच:
परिच्छदेन क्षेत्रेण वेश्मना परिचर्यया |
३३ क
विदुर उवाच:
परीक्षेत कुलं राजन्भोजनाच्छादनेन च ||
३३ ख
विदुर उवाच:
यय़ोश्चित्तेन वा चित्तं नैभृतं नैभृतेन वा |
३४ क
विदुर उवाच:
समेति प्रज्ञय़ा प्रज्ञा तय़ोर्मैत्री न जीर्यते ||
३४ ख
विदुर उवाच:
दुर्वुद्धिमकृतप्रज्ञं छन्नं कूपं तृणैरिव |
३५ क
विदुर उवाच:
विवर्जय़ीत मेधावी तस्मिन्मैत्री प्रणश्यति ||
३५ ख
विदुर उवाच:
अवलिप्तेषु मूर्खेषु रौद्रसाहसिकेषु च |
३६ क
विदुर उवाच:
तथैवापेतधर्मेषु न मैत्रीमाचरेद्वुधः ||
३६ ख
विदुर उवाच:
कृतज्ञं धार्मिकं सत्यमक्षुद्रं दृढभक्तिकम् |
३७ क
विदुर उवाच:
जितेन्द्रिय़ं स्थितं स्थित्यां मित्रमत्यागि चेष्यते ||
३७ ख
विदुर उवाच:
इन्द्रिय़ाणामनुत्सर्गो मृत्युना न विशिष्यते |
३८ क
विदुर उवाच:
अत्यर्थं पुनरुत्सर्गः सादय़ेद्दैवतान्यपि ||
३८ ख
विदुर उवाच:
मार्दवं सर्वभूतानामनसूय़ा क्षमा धृतिः |
३९ क
विदुर उवाच:
आय़ुष्याणि वुधाः प्राहुर्मित्राणां चाविमानना ||
३९ ख
विदुर उवाच:
अपनीतं सुनीतेन योऽर्थं प्रत्यानिनीषते |
४० क
विदुर उवाच:
मतिमास्थाय़ सुदृढां तदकापुरुषव्रतम् ||
४० ख
विदुर उवाच:
आय़त्यां प्रतिकारज्ञस्तदात्वे दृढनिश्चय़ः |
४१ क
विदुर उवाच:
अतीते कार्यशेषज्ञो नरोऽर्थैर्न प्रहीय़ते ||
४१ ख
विदुर उवाच:
कर्मणा मनसा वाचा यदभीक्ष्णं निषेवते |
४२ क
विदुर उवाच:
तदेवापहरत्येनं तस्मात्कल्याणमाचरेत् ||
४२ ख
विदुर उवाच:
मङ्गलालम्भनं योगः श्रुतमुत्थानमार्जवम् |
४३ क
विदुर उवाच:
भूतिमेतानि कुर्वन्ति सतां चाभीक्ष्णदर्शनम् ||
४३ ख
विदुर उवाच:
अनिर्वेदः श्रिय़ो मूलं दुःखनाशे सुखस्य च |
४४ क
विदुर उवाच:
महान्भवत्यनिर्विण्णः सुखं चात्यन्तमश्नुते ||
४४ ख
विदुर उवाच:
नातः श्रीमत्तरं किञ्चिदन्यत्पथ्यतमं तथा |
४५ क
विदुर उवाच:
प्रभविष्णोर्यथा तात क्षमा सर्वत्र सर्वदा ||
४५ ख
विदुर उवाच:
क्षमेदशक्तः सर्वस्य शक्तिमान्धर्मकारणात् |
४६ क
विदुर उवाच:
अर्थानर्थौ समौ यस्य तस्य नित्यं क्षमा हिता ||
४६ ख
विदुर उवाच:
यत्सुखं सेवमानोऽपि धर्मार्थाभ्यां न हीय़ते |
४७ क
विदुर उवाच:
कामं तदुपसेवेत न मूढव्रतमाचरेत् ||
४७ ख
विदुर उवाच:
दुःखार्तेषु प्रमत्तेषु नास्तिकेष्वलसेषु च |
४८ क
विदुर उवाच:
न श्रीर्वसत्यदान्तेषु ये चोत्साहविवर्जिताः ||
४८ ख
विदुर उवाच:
आर्जवेन नरं युक्तमार्जवात्सव्यपत्रपम् |
४९ क
विदुर उवाच:
अशक्तिमन्तं मन्यन्तो धर्षय़न्ति कुवुद्धय़ः ||
४९ ख
विदुर उवाच:
अत्यार्यमतिदातारमतिशूरमतिव्रतम् |
५० क
विदुर उवाच:
प्रज्ञाभिमानिनं चैव श्रीर्भय़ान्नोपसर्पति ||
५० ख