भीष्म उवाच:
श्रूय़तां पार्थ तत्त्वेन विश्वामित्रो यथा पुरा |
१ क
भीष्म उवाच:
व्राह्मणत्वं गतस्तात व्रह्मर्षित्वं तथैव च ||
१ ख
भीष्म उवाच:
भरतस्यान्वय़े चैवाजमीढो नाम पार्थिवः |
२ क
भीष्म उवाच:
वभूव भरतश्रेष्ठ यज्वा धर्मभृतां वरः ||
२ ख
भीष्म उवाच:
तस्य पुत्रो महानासीज्जह्नुर्नाम नरेश्वरः |
३ क
भीष्म उवाच:
दुहितृत्वमनुप्राप्ता गङ्गा यस्य महात्मनः ||
३ ख
भीष्म उवाच:
तस्यात्मजस्तुल्यगुणः सिन्धुद्वीपो महाय़शाः |
४ क
भीष्म उवाच:
सिन्धुद्वीपाच्च राजर्षिर्वलाकाश्वो महावलः ||
४ ख
भीष्म उवाच:
वल्लभस्तस्य तनय़ः साक्षाद्धर्म इवापरः |
५ क
भीष्म उवाच:
कुशिकस्तस्य तनय़ः सहस्राक्षसमद्युतिः ||
५ ख
भीष्म उवाच:
कुशिकस्यात्मजः श्रीमान्गाधिर्नाम जनेश्वरः |
६ क
भीष्म उवाच:
अपुत्रः स महावाहुर्वनवासमुदावसत् ||
६ ख
भीष्म उवाच:
कन्या जज्ञे सुता तस्य वने निवसतः सतः |
७ क
भीष्म उवाच:
नाम्ना सत्यवती नाम रूपेणाप्रतिमा भुवि ||
७ ख
भीष्म उवाच:
तां वव्रे भार्गवः श्रीमांश्च्यवनस्यात्मजः प्रभुः |
८ क
भीष्म उवाच:
ऋचीक इति विख्यातो विपुले तपसि स्थितः ||
८ ख
भीष्म उवाच:
स तां न प्रददौ तस्मै ऋचीकाय़ महात्मने |
९ क
भीष्म उवाच:
दरिद्र इति मत्वा वै गाधिः शत्रुनिवर्हणः ||
९ ख
भीष्म उवाच:
प्रत्याख्याय़ पुनर्यान्तमव्रवीद्राजसत्तमः |
१० क
भीष्म उवाच:
शुल्कं प्रदीय़तां मह्यं ततो वेत्स्यसि मे सुताम् ||
१० ख
ऋचीक उवाच:
किं प्रय़च्छामि राजेन्द्र तुभ्यं शुल्कमहं नृप |
११ क
ऋचीक उवाच:
दुहितुर्व्रूह्यसंसक्तो मात्राभूत्ते विचारणा ||
११ ख
गाधिरु उवाच:
चन्द्ररश्मिप्रकाशानां हय़ानां वातरंहसाम् |
१२ क
गाधिरु उवाच:
एकतः श्यामकर्णानां सहस्रं देहि भार्गव ||
१२ ख
भीष्म उवाच:
ततः स भृगुशार्दूलश्च्यवनस्यात्मजः प्रभुः |
१३ क
भीष्म उवाच:
अव्रवीद्वरुणं देवमादित्यं पतिमम्भसाम् ||
१३ ख
भीष्म उवाच:
एकतः श्यामकर्णानां हय़ानां चन्द्रवर्चसाम् |
१४ क
भीष्म उवाच:
सहस्रं वातवेगानां भिक्षे त्वां देवसत्तम ||
१४ ख
भीष्म उवाच:
तथेति वरुणो देव आदित्यो भृगुसत्तमम् |
१५ क
भीष्म उवाच:
उवाच यत्र ते छन्दस्तत्रोत्थास्यन्ति वाजिनः ||
१५ ख
भीष्म उवाच:
ध्यातमात्रे ऋचीकेन हय़ानां चन्द्रवर्चसाम् |
१६ क
भीष्म उवाच:
गङ्गाजलात्समुत्तस्थौ सहस्रं विपुलौजसाम् ||
१६ ख
भीष्म उवाच:
अदूरे कन्यकुव्जस्य गङ्गाय़ास्तीरमुत्तमम् |
१७ क
भीष्म उवाच:
अश्वतीर्थं तदद्यापि मानवाः परिचक्षते ||
१७ ख
भीष्म उवाच:
तत्तदा गाधय़े तात सहस्रं वाजिनां शुभम् |
१८ क
भीष्म उवाच:
ऋचीकः प्रददौ प्रीतः शुल्कार्थं जपतां वरः ||
१८ ख
भीष्म उवाच:
ततः स विस्मितो राजा गाधिः शापभय़ेन च |
१९ क
भीष्म उवाच:
ददौ तां समलङ्कृत्य कन्यां भृगुसुताय़ वै ||
१९ ख
भीष्म उवाच:
जग्राह पाणिं विधिना तस्य व्रह्मर्षिसत्तमः |
२० क
भीष्म उवाच:
सा च तं पतिमासाद्य परं हर्षमवाप ह ||
२० ख
भीष्म उवाच:
स तुतोष च विप्रर्षिस्तस्या वृत्तेन भारत |
२१ क
भीष्म उवाच:
छन्दय़ामास चैवैनां वरेण वरवर्णिनीम् ||
२१ ख
भीष्म उवाच:
मात्रे तत्सर्वमाचख्यौ सा कन्या राजसत्तमम् |
२२ क
भीष्म उवाच:
अथ तामव्रवीन्माता सुतां किञ्चिदवाङ्मुखीम् ||
२२ ख
भीष्म उवाच:
ममापि पुत्रि भर्ता ते प्रसादं कर्तुमर्हति |
२३ क
भीष्म उवाच:
अपत्यस्य प्रदानेन समर्थः स महातपाः ||
२३ ख
भीष्म उवाच:
ततः सा त्वरितं गत्वा तत्सर्वं प्रत्यवेदय़त् |
२४ क
भीष्म उवाच:
मातुश्चिकीर्षितं राजन्नृचीकस्तामथाव्रवीत् ||
२४ ख
भीष्म उवाच:
गुणवन्तमपत्यं वै त्वं च सा जनय़िष्यथः |
२५ क
भीष्म उवाच:
जनन्यास्तव कल्याणि मा भूद्वै प्रणय़ोऽन्यथा ||
२५ ख
भीष्म उवाच:
तव चैव गुणश्लाघी पुत्र उत्पत्स्यते शुभे |
२६ क
भीष्म उवाच:
अस्मद्वंशकरः श्रीमांस्तव भ्राता च वंशकृत् ||
२६ ख
भीष्म उवाच:
ऋतुस्नाता च साश्वत्थं त्वं च वृक्षमुदुम्वरम् |
२७ क
भीष्म उवाच:
परिष्वजेथाः कल्याणि तत इष्टमवाप्स्यथः ||
२७ ख
भीष्म उवाच:
चरुद्वय़मिदं चैव मन्त्रपूतं शुचिस्मिते |
२८ क
भीष्म उवाच:
त्वं च सा चोपय़ुञ्जीथां ततः पुत्राववाप्स्यथः ||
२८ ख
भीष्म उवाच:
ततः सत्यवती हृष्टा मातरं प्रत्यभाषत |
२९ क
भीष्म उवाच:
यदृचीकेन कथितं तच्चाचख्यौ चरुद्वय़म् ||
२९ ख
भीष्म उवाच:
तामुवाच ततो माता सुतां सत्यवतीं तदा |
३० क
भीष्म उवाच:
पुत्रि मूर्ध्ना प्रपन्नाय़ाः कुरुष्व वचनं मम ||
३० ख
भीष्म उवाच:
भर्त्रा य एष दत्तस्ते चरुर्मन्त्रपुरस्कृतः |
३१ क
भीष्म उवाच:
एतं प्रय़च्छ मह्यं त्वं मदीय़ं त्वं गृहाण च ||
३१ ख
भीष्म उवाच:
व्यत्यासं वृक्षय़ोश्चापि करवाव शुचिस्मिते |
३२ क
भीष्म उवाच:
यदि प्रमाणं वचनं मम मातुरनिन्दिते ||
३२ ख
भीष्म उवाच:
व्यक्तं भगवता चात्र कृतमेवं भविष्यति |
३३ क
भीष्म उवाच:
ततो मे त्वच्चरौ भावः पादपे च सुमध्यमे |
३३ ख
भीष्म उवाच:
कथं विशिष्टो भ्राता ते भवेदित्येव चिन्तय़ ||
३३ ग
भीष्म उवाच:
तथा च कृतवत्यौ ते माता सत्यवती च सा |
३४ क
भीष्म उवाच:
अथ गर्भावनुप्राप्ते उभे ते वै युधिष्ठिर ||
३४ ख
भीष्म उवाच:
दृष्ट्वा गर्भमनुप्राप्तां भार्यां स च महानृषिः |
३५ क
भीष्म उवाच:
उवाच तां सत्यवतीं दुर्मना भृगुसत्तमः ||
३५ ख
भीष्म उवाच:
व्यत्यासेनोपय़ुक्तस्ते चरुर्व्यक्तं भविष्यति |
३६ क
भीष्म उवाच:
व्यत्यासः पादपे चापि सुव्यक्तं ते कृतः शुभे ||
३६ ख
भीष्म उवाच:
मय़ा हि विश्वं यद्व्रह्म त्वच्चरौ संनिवेशितम् |
३७ क
भीष्म उवाच:
क्षत्रवीर्यं च सकलं चरौ तस्या निवेशितम् ||
३७ ख
भीष्म उवाच:
त्रिलोकविख्यातगुणं त्वं विप्रं जनय़िष्यसि |
३८ क
भीष्म उवाच:
सा च क्षत्रं विशिष्टं वै तत एतत्कृतं मय़ा ||
३८ ख
भीष्म उवाच:
व्यत्यासस्तु कृतो यस्मात्त्वय़ा मात्रा तथैव च |
३९ क
भीष्म उवाच:
तस्मात्सा व्राह्मणश्रेष्ठं माता ते जनय़िष्यति ||
३९ ख
भीष्म उवाच:
क्षत्रिय़ं तूग्रकर्माणं त्वं भद्रे जनय़िष्यसि |
४० क
भीष्म उवाच:
न हि ते तत्कृतं साधु मातृस्नेहेन भामिनि ||
४० ख
भीष्म उवाच:
सा श्रुत्वा शोकसन्तप्ता पपात वरवर्णिनी |
४१ क
भीष्म उवाच:
भूमौ सत्यवती राजंश्छिन्नेव रुचिरा लता ||
४१ ख
भीष्म उवाच:
प्रतिलभ्य च सा सञ्ज्ञां शिरसा प्रणिपत्य च |
४२ क
भीष्म उवाच:
उवाच भार्या भर्तारं गाधेय़ी व्राह्मणर्षभम् ||
४२ ख
भीष्म उवाच:
प्रसादय़न्त्यां भार्याय़ां मय़ि व्रह्मविदां वर |
४३ क
भीष्म उवाच:
प्रसादं कुरु विप्रर्षे न मे स्यात्क्षत्रिय़ः सुतः ||
४३ ख
भीष्म उवाच:
कामं ममोग्रकर्मा वै पौत्रो भवितुमर्हति |
४४ क
भीष्म उवाच:
न तु मे स्यात्सुतो व्रह्मन्नेष मे दीय़तां वरः ||
४४ ख
भीष्म उवाच:
एवमस्त्विति होवाच स्वां भार्यां सुमहातपाः |
४५ क
भीष्म उवाच:
ततः सा जनय़ामास जमदग्निं सुतं शुभम् ||
४५ ख
भीष्म उवाच:
विश्वामित्रं चाजनय़द्गाधेर्भार्या यशस्विनी |
४६ क
भीष्म उवाच:
ऋषेः प्रभावाद्राजेन्द्र व्रह्मर्षिं व्रह्मवादिनम् ||
४६ ख
भीष्म उवाच:
ततो व्राह्मणतां यातो विश्वामित्रो महातपाः |
४७ क
भीष्म उवाच:
क्षत्रिय़ः सोऽप्यथ तथा व्रह्मवंशस्य कारकः ||
४७ ख
भीष्म उवाच:
तस्य पुत्रा महात्मानो व्रह्मवंशविवर्धनाः |
४८ क
भीष्म उवाच:
तपस्विनो व्रह्मविदो गोत्रकर्तार एव च ||
४८ ख
भीष्म उवाच:
मधुच्छन्दश्च भगवान्देवरातश्च वीर्यवान् |
४९ क
भीष्म उवाच:
अक्षीणश्च शकुन्तश्च वभ्रुः कालपथस्तथा ||
४९ ख
भीष्म उवाच:
याज्ञवल्क्यश्च विख्यातस्तथा स्थूणो महाव्रतः |
५० क