chevron_left अनुशासन पर्व अध्याय ४०
भीष्म उवाच:
एवमेतन्महावाहो नात्र मिथ्यास्ति किञ्चन |
१ क
भीष्म उवाच:
यथा व्रवीषि कौरव्य नारीं प्रति जनाधिप ||
१ ख
भीष्म उवाच:
अत्र ते वर्तय़िष्यामि इतिहासं पुरातनम् |
२ क
भीष्म उवाच:
यथा रक्षा कृता पूर्वं विपुलेन महात्मना ||
२ ख
भीष्म उवाच:
प्रमदाश्च यथा सृष्टा व्रह्मणा भरतर्षभ |
३ क
भीष्म उवाच:
यदर्थं तच्च ते तात प्रवक्ष्ये वसुधाधिप ||
३ ख
भीष्म उवाच:
न हि स्त्रीभ्य परं पुत्र पापीय़ः किञ्चिदस्ति वै |
४ क
भीष्म उवाच:
अग्निर्हि प्रमदा दीप्तो माय़ाश्च मय़जा विभो |
४ ख
भीष्म उवाच:
क्षुरधारा विषं सर्पो मृत्युरित्येकतः स्त्रिय़ः ||
४ ग
भीष्म उवाच:
इमाः प्रजा महावाहो धार्मिका इति नः श्रुतम् |
५ क
भीष्म उवाच:
स्वय़ं गच्छन्ति देवत्वं ततो देवानिय़ाद्भय़म् ||
५ ख
भीष्म उवाच:
अथाभ्यगच्छन्देवास्ते पितामहमरिन्दम |
६ क
भीष्म उवाच:
निवेद्य मानसं चापि तूष्णीमासन्नवाङ्मुखाः ||
६ ख
भीष्म उवाच:
तेषामन्तर्गतं ज्ञात्वा देवानां स पितामहः |
७ क
भीष्म उवाच:
मानवानां प्रमोहार्थं कृत्या नार्योऽसृजत्प्रभुः ||
७ ख
भीष्म उवाच:
पूर्वसर्गे तु कौन्तेय़ साध्व्यो नार्य इहाभवन् |
८ क
भीष्म उवाच:
असाध्व्यस्तु समुत्पन्ना कृत्या सर्गात्प्रजापतेः ||
८ ख
भीष्म उवाच:
ताभ्यः कामान्यथाकामं प्रादाद्धि स पितामहः |
९ क
भीष्म उवाच:
ताः कामलुव्धाः प्रमदाः प्रामथ्नन्त नरांस्तदा ||
९ ख
भीष्म उवाच:
क्रोधं कामस्य देवेशः सहाय़ं चासृजत्प्रभुः |
१० क
भीष्म उवाच:
असज्जन्त प्रजाः सर्वाः कामक्रोधवशं गताः ||
१० ख
भीष्म उवाच:
न च स्त्रीणां क्रिय़ा काचिदिति धर्मो व्यवस्थितः |
११ क
भीष्म उवाच:
निरिन्द्रिय़ा अमन्त्राश्च स्त्रिय़ोऽनृतमिति श्रुतिः ||
११ ख
भीष्म उवाच:
शय़्यासनमलङ्कारमन्नपानमनार्यताम् |
१२ क
भीष्म उवाच:
दुर्वाग्भावं रतिं चैव ददौ स्त्रीभ्यः प्रजापतिः ||
१२ ख
भीष्म उवाच:
न तासां रक्षणं कर्तुं शक्यं पुंसा कथञ्चन |
१३ क
भीष्म उवाच:
अपि विश्वकृता तात कुतस्तु पुरुषैरिह ||
१३ ख
भीष्म उवाच:
वाचा वा वधवन्धैर्वा क्लेशैर्वा विविधैस्तथा |
१४ क
भीष्म उवाच:
न शक्या रक्षितुं नार्यस्ता हि नित्यमसंय़ताः ||
१४ ख
भीष्म उवाच:
इदं तु पुरुषव्याघ्र पुरस्ताच्छ्रुतवानहम् |
१५ क
भीष्म उवाच:
यथा रक्षा कृता पूर्वं विपुलेन गुरुस्त्रिय़ः ||
१५ ख
भीष्म उवाच:
ऋषिरासीन्महाभागो देवशर्मेति विश्रुतः |
१६ क
भीष्म उवाच:
तस्य भार्या रुचिर्नाम रूपेणासदृशी भुवि ||
१६ ख
भीष्म उवाच:
तस्य रूपेण संमत्ता देवगन्धर्वदानवाः |
१७ क
भीष्म उवाच:
विशेषतस्तु राजेन्द्र वृत्रहा पाकशासनः ||
१७ ख
भीष्म उवाच:
नारीणां चरितज्ञश्च देवशर्मा महामुनिः |
१८ क
भीष्म उवाच:
यथाशक्ति यथोत्साहं भार्यां तामभ्यरक्षत ||
१८ ख
भीष्म उवाच:
पुरन्दरं च जानीते परस्त्रीकामचारिणम् |
१९ क
भीष्म उवाच:
तस्माद्यत्नेन भार्याय़ा रक्षणं स चकार ह ||
१९ ख
भीष्म उवाच:
स कदाचिदृषिस्तात यज्ञं कर्तुमनास्तदा |
२० क
भीष्म उवाच:
भार्यासंरक्षणं कार्यं कथं स्यादित्यचिन्तय़त् ||
२० ख
भीष्म उवाच:
रक्षाविधानं मनसा स विचिन्त्य महातपाः |
२१ क
भीष्म उवाच:
आहूय़ दय़ितं शिष्यं विपुलं प्राह भार्गवम् ||
२१ ख
भीष्म उवाच:
यज्ञकारो गमिष्यामि रुचिं चेमां सुरेश्वरः |
२२ क
भीष्म उवाच:
पुत्र प्रार्थय़ते नित्यं तां रक्षस्व यथावलम् ||
२२ ख
भीष्म उवाच:
अप्रमत्तेन ते भाव्यं सदा प्रति पुरन्दरम् |
२३ क
भीष्म उवाच:
स हि रूपाणि कुरुते विविधानि भृगूद्वह ||
२३ ख
भीष्म उवाच:
इत्युक्तो विपुलस्तेन तपस्वी निय़तेन्द्रिय़ः |
२४ क
भीष्म उवाच:
सदैवोग्रतपा राजन्नग्न्यर्कसदृशद्युतिः ||
२४ ख
भीष्म उवाच:
धर्मज्ञः सत्यवादी च तथेति प्रत्यभाषत |
२५ क
भीष्म उवाच:
पुनश्चेदं महाराज पप्रच्छ प्रथितं गुरुम् ||
२५ ख
भीष्म उवाच:
कानि रूपाणि शक्रस्य भवन्त्यागच्छतो मुने |
२६ क
भीष्म उवाच:
वपुस्तेजश्च कीदृग्वै तन्मे व्याख्यातुमर्हसि ||
२६ ख
भीष्म उवाच:
ततः स भगवांस्तस्मै विपुलाय़ महात्मने |
२७ क
भीष्म उवाच:
आचचक्षे यथातत्त्वं माय़ां शक्रस्य भारत ||
२७ ख
भीष्म उवाच:
वहुमाय़ः स विप्रर्षे वलहा पाकशासनः |
२८ क
भीष्म उवाच:
तांस्तान्विकुरुते भावान्वहूनथ मुहुर्मुहुः ||
२८ ख
भीष्म उवाच:
किरीटी वज्रभृद्धन्वी मुकुटी वद्धकुण्डलः |
२९ क
भीष्म उवाच:
भवत्यथ मुहूर्तेन चण्डालसमदर्शनः ||
२९ ख
भीष्म उवाच:
शिखी जटी चीरवासाः पुनर्भवति पुत्रक |
३० क
भीष्म उवाच:
वृहच्छरीरश्च पुनः पीवरोऽथ पुनः कृशः ||
३० ख
भीष्म उवाच:
गौरं श्यामं च कृष्णं च वर्णं विकुरुते पुनः |
३१ क
भीष्म उवाच:
विरूपो रूपवांश्चैव युवा वृद्धस्तथैव च ||
३१ ख
भीष्म उवाच:
प्राज्ञो जडश्च मूकश्च ह्रस्वो दीर्घस्तथैव च |
३२ क
भीष्म उवाच:
व्राह्मणः क्षत्रिय़श्चैव वैश्यः शूद्रस्तथैव च |
३२ ख
भीष्म उवाच:
प्रतिलोमानुलोमश्च भवत्यथ शतक्रतुः ||
३२ ग
भीष्म उवाच:
शुकवाय़सरूपी च हंसकोकिलरूपवान् |
३३ क
भीष्म उवाच:
सिंहव्याघ्रगजानां च रूपं धारय़ते पुनः ||
३३ ख
भीष्म उवाच:
दैवं दैत्यमथो राज्ञां वपुर्धारय़तेऽपि च |
३४ क
भीष्म उवाच:
सुकृशो वाय़ुभग्नाङ्गः शकुनिर्विकृतस्तथा ||
३४ ख
भीष्म उवाच:
चतुष्पाद्वहुरूपश्च पुनर्भवति वालिशः |
३५ क
भीष्म उवाच:
मक्षिकामशकादीनां वपुर्धारय़तेऽपि च ||
३५ ख
भीष्म उवाच:
न शक्यमस्य ग्रहणं कर्तुं विपुल केनचित् |
३६ क
भीष्म उवाच:
अपि विश्वकृता तात येन सृष्टमिदं जगत् ||
३६ ख
भीष्म उवाच:
पुनरन्तर्हितः शक्रो दृश्यते ज्ञानचक्षुषा |
३७ क
भीष्म उवाच:
वाय़ुभूतश्च स पुनर्देवराजो भवत्युत ||
३७ ख
भीष्म उवाच:
एवं रूपाणि सततं कुरुते पाकशासनः |
३८ क
भीष्म उवाच:
तस्माद्विपुल यत्नेन रक्षेमां तनुमध्यमाम् ||
३८ ख
भीष्म उवाच:
यथा रुचिं नावलिहेद्देवेन्द्रो भृगुसत्तम |
३९ क
भीष्म उवाच:
क्रतावुपहितं न्यस्तं हविः श्वेव दुरात्मवान् ||
३९ ख
भीष्म उवाच:
एवमाख्याय़ स मुनिर्यज्ञकारोऽगमत्तदा |
४० क
भीष्म उवाच:
देवशर्मा महाभागस्ततो भरतसत्तम ||
४० ख
भीष्म उवाच:
विपुलस्तु वचः श्रुत्वा गुरोश्चिन्तापरोऽभवत् |
४१ क
भीष्म उवाच:
रक्षां च परमां चक्रे देवराजान्महावलात् ||
४१ ख
भीष्म उवाच:
किं नु शक्यं मय़ा कर्तुं गुरुदाराभिरक्षणे |
४२ क
भीष्म उवाच:
माय़ावी हि सुरेन्द्रोऽसौ दुर्धर्षश्चापि वीर्यवान् ||
४२ ख
भीष्म उवाच:
नापिधाय़ाश्रमं शक्यो रक्षितुं पाकशासनः |
४३ क
भीष्म उवाच:
उटजं वा तथा ह्यस्य नानाविधसरूपता ||
४३ ख
भीष्म उवाच:
वाय़ुरूपेण वा शक्रो गुरुपत्नीं प्रधर्षय़ेत् |
४४ क
भीष्म उवाच:
तस्मादिमां सम्प्रविश्य रुचिं स्थास्येऽहमद्य वै ||
४४ ख
भीष्म उवाच:
अथ वा पौरुषेणेय़मशक्या रक्षितुं मय़ा |
४५ क
भीष्म उवाच:
वहुरूपो हि भगवाञ्छ्रूय़ते हरिवाहनः ||
४५ ख
भीष्म उवाच:
सोऽहं योगवलादेनां रक्षिष्ये पाकशासनात् |
४६ क
भीष्म उवाच:
गात्राणि गात्रैरस्याहं सम्प्रवेक्ष्येऽभिरक्षितुम् ||
४६ ख
भीष्म उवाच:
यद्युच्छिष्टामिमां पत्नीं रुचिं पश्येत मे गुरुः |
४७ क
भीष्म उवाच:
शप्स्यत्यसंशय़ं कोपाद्दिव्यज्ञानो महातपाः ||
४७ ख
भीष्म उवाच:
न चेय़ं रक्षितुं शक्या यथान्या प्रमदा नृभिः |
४८ क
भीष्म उवाच:
माय़ावी हि सुरेन्द्रोऽसावहो प्राप्तोऽस्मि संशय़म् ||
४८ ख
भीष्म उवाच:
अवश्यकरणीय़ं हि गुरोरिह हि शासनम् |
४९ क
भीष्म उवाच:
यदि त्वेतदहं कुर्यामाश्चर्यं स्यात्कृतं मय़ा ||
४९ ख