भीष्म उवाच:
ततः कदाचिद्देवेन्द्रो दिव्यरूपवपुर्धरः |
१ क
भीष्म उवाच:
इदमन्तरमित्येवं ततोऽभ्यागादथाश्रमम् ||
१ ख
भीष्म उवाच:
रूपमप्रतिमं कृत्वा लोभनीय़ं जनाधिप |
२ क
भीष्म उवाच:
दर्शनीय़तमो भूत्वा प्रविवेश तमाश्रमम् ||
२ ख
भीष्म उवाच:
स ददर्श तमासीनं विपुलस्य कलेवरम् |
३ क
भीष्म उवाच:
निश्चेष्टं स्तव्धनय़नं यथालेख्यगतं तथा ||
३ ख
भीष्म उवाच:
रुचिं च रुचिरापाङ्गीं पीनश्रोणिपय़ोधराम् |
४ क
भीष्म उवाच:
पद्मपत्रविशालाक्षीं सम्पूर्णेन्दुनिभाननाम् ||
४ ख
भीष्म उवाच:
सा तमालोक्य सहसा प्रत्युत्थातुमिय़ेष ह |
५ क
भीष्म उवाच:
रूपेण विस्मिता कोऽसीत्यथ वक्तुमिहेच्छती ||
५ ख
भीष्म उवाच:
उत्थातुकामापि सती व्यतिष्ठद्विपुलेन सा |
६ क
भीष्म उवाच:
निगृहीता मनुष्येन्द्र न शशाक विचेष्टितुम् ||
६ ख
भीष्म उवाच:
तामावभाषे देवेन्द्रः साम्ना परमवल्गुना |
७ क
भीष्म उवाच:
त्वदर्थमागतं विद्धि देवेन्द्रं मां शुचिस्मिते ||
७ ख
भीष्म उवाच:
क्लिश्यमानमनङ्गेन त्वत्सङ्कल्पोद्भवेन वै |
८ क
भीष्म उवाच:
तत्पर्याप्नुहि मां सुभ्रु पुरा कालोऽतिवर्तते ||
८ ख
भीष्म उवाच:
तमेवंवादिनं शक्रं शुश्राव विपुलो मुनिः |
९ क
भीष्म उवाच:
गुरुपत्न्याः शरीरस्थो ददर्श च सुराधिपम् ||
९ ख
भीष्म उवाच:
न शशाक च सा राजन्प्रत्युत्थातुमनिन्दिता |
१० क
भीष्म उवाच:
वक्तुं च नाशकद्राजन्विष्टव्धा विपुलेन सा ||
१० ख
भीष्म उवाच:
आकारं गुरुपत्न्यास्तु विज्ञाय़ स भृगूद्वहः |
११ क
भीष्म उवाच:
निजग्राह महातेजा योगेन वलवत्प्रभो |
११ ख
भीष्म उवाच:
ववन्ध योगवन्धैश्च तस्याः सर्वेन्द्रिय़ाणि सः ||
११ ग
भीष्म उवाच:
तां निर्विकारां दृष्ट्वा तु पुनरेव शचीपतिः |
१२ क
भीष्म उवाच:
उवाच व्रीडितो राजंस्तां योगवलमोहिताम् ||
१२ ख
भीष्म उवाच:
एह्येहीति ततः सा तं प्रतिवक्तुमिय़ेष च |
१३ क
भीष्म उवाच:
स तां वाचं गुरोः पत्न्या विपुलः पर्यवर्तय़त् ||
१३ ख
भीष्म उवाच:
भोः किमागमने कृत्यमिति तस्याश्च निःसृता |
१४ क
भीष्म उवाच:
वक्त्राच्छशाङ्कप्रतिमाद्वाणी संस्कारभूषिता ||
१४ ख
भीष्म उवाच:
व्रीडिता सा तु तद्वाक्यमुक्त्वा परवशा तदा |
१५ क
भीष्म उवाच:
पुरन्दरश्च सन्त्रस्तो वभूव विमनास्तदा ||
१५ ख
भीष्म उवाच:
स तद्वैकृतमालक्ष्य देवराजो विशां पते |
१६ क
भीष्म उवाच:
अवैक्षत सहस्राक्षस्तदा दिव्येन चक्षुषा ||
१६ ख
भीष्म उवाच:
ददर्श च मुनिं तस्याः शरीरान्तरगोचरम् |
१७ क
भीष्म उवाच:
प्रतिविम्वमिवादर्शे गुरुपत्न्याः शरीरगम् ||
१७ ख
भीष्म उवाच:
स तं घोरेण तपसा युक्तं दृष्ट्वा पुरन्दरः |
१८ क
भीष्म उवाच:
प्रावेपत सुसन्त्रस्तः शापभीतस्तदा विभो ||
१८ ख
भीष्म उवाच:
विमुच्य गुरुपत्नीं तु विपुलः सुमहातपाः |
१९ क
भीष्म उवाच:
स्वं कलेवरमाविश्य शक्रं भीतमथाव्रवीत् ||
१९ ख
भीष्म उवाच:
अजितेन्द्रिय़ पापात्मन्कामात्मक पुरन्दर |
२० क
भीष्म उवाच:
न चिरं पूजय़िष्यन्ति देवास्त्वां मानुषास्तथा ||
२० ख
भीष्म उवाच:
किं नु तद्विस्मृतं शक्र न तन्मनसि ते स्थितम् |
२१ क
भीष्म उवाच:
गौतमेनासि यन्मुक्तो भगाङ्कपरिचिह्नितः ||
२१ ख
भीष्म उवाच:
जाने त्वां वालिशमतिमकृतात्मानमस्थिरम् |
२२ क
भीष्म उवाच:
मय़ेय़ं रक्ष्यते मूढ गच्छ पाप यथागतम् ||
२२ ख
भीष्म उवाच:
नाहं त्वामद्य मूढात्मन्दहेय़ं हि स्वतेजसा |
२३ क
भीष्म उवाच:
कृपाय़माणस्तु न ते दग्धुमिच्छामि वासव ||
२३ ख
भीष्म उवाच:
स च घोरतपा धीमान्गुरुर्मे पापचेतसम् |
२४ क
भीष्म उवाच:
दृष्ट्वा त्वां निर्दहेदद्य क्रोधदीप्तेन चक्षुषा ||
२४ ख
भीष्म उवाच:
नैवं तु शक्र कर्तव्यं पुनर्मान्याश्च ते द्विजाः |
२५ क
भीष्म उवाच:
मा गमः ससुतामात्योऽत्ययं व्रह्मवलार्दितः ||
२५ ख
भीष्म उवाच:
अमरोऽस्मीति यद्वुद्धिमेतामास्थाय़ वर्तसे |
२६ क
भीष्म उवाच:
मावमंस्था न तपसामसाध्यं नाम किञ्चन ||
२६ ख
भीष्म उवाच:
तच्छ्रुत्वा वचनं शक्रो विपुलस्य महात्मनः |
२७ क
भीष्म उवाच:
अकिञ्चिदुक्त्वा व्रीडितस्तत्रैवान्तरधीय़त ||
२७ ख
भीष्म उवाच:
मुहूर्तय़ाते शक्रे तु देवशर्मा महातपाः |
२८ क
भीष्म उवाच:
कृत्वा यज्ञं यथाकाममाजगाम स्वमाश्रमम् ||
२८ ख
भीष्म उवाच:
आगतेऽथ गुरौ राजन्विपुलः प्रिय़कर्मकृत् |
२९ क
भीष्म उवाच:
रक्षितां गुरवे भार्यां न्यवेदय़दनिन्दिताम् ||
२९ ख
भीष्म उवाच:
अभिवाद्य च शान्तात्मा स गुरुं गुरुवत्सलः |
३० क
भीष्म उवाच:
विपुलः पर्युपातिष्ठद्यथापूर्वमशङ्कितः ||
३० ख
भीष्म उवाच:
विश्रान्ताय़ ततस्तस्मै सहासीनाय़ भार्यया |
३१ क
भीष्म उवाच:
निवेदय़ामास तदा विपुलः शक्रकर्म तत् ||
३१ ख
भीष्म उवाच:
तच्छ्रुत्वा स मुनिस्तुष्टो विपुलस्य प्रतापवान् |
३२ क
भीष्म उवाच:
वभूव शीलवृत्ताभ्यां तपसा निय़मेन च ||
३२ ख
भीष्म उवाच:
विपुलस्य गुरौ वृत्तिं भक्तिमात्मनि च प्रभुः |
३३ क
भीष्म उवाच:
धर्मे च स्थिरतां दृष्ट्वा साधु साध्वित्युवाच ह ||
३३ ख
भीष्म उवाच:
प्रतिनन्द्य च धर्मात्मा शिष्यं धर्मपराय़णम् |
३४ क
भीष्म उवाच:
वरेण च्छन्दय़ामास स तस्माद्गुरुवत्सलः |
३४ ख
भीष्म उवाच:
अनुज्ञातश्च गुरुणा चचारानुत्तमं तपः ||
३४ ग
भीष्म उवाच:
तथैव देवशर्मापि सभार्यः स महातपाः |
३५ क
भीष्म उवाच:
निर्भय़ो वलवृत्रघ्नाच्चचार विजने वने ||
३५ ख