भीष्म उवाच:
विपुलस्त्वकरोत्तीव्रं तपः कृत्वा गुरोर्वचः |
१ क
भीष्म उवाच:
तपोय़ुक्तमथात्मानममन्यत च वीर्यवान् ||
१ ख
भीष्म उवाच:
स तेन कर्मणा स्पर्धन्पृथिवीं पृथिवीपते |
२ क
भीष्म उवाच:
चचार गतभीः प्रीतो लव्धकीर्तिर्वरो नृषु ||
२ ख
भीष्म उवाच:
उभौ लोकौ जितौ चापि तथैवामन्यत प्रभुः |
३ क
भीष्म उवाच:
कर्मणा तेन कौरव्य तपसा विपुलेन च ||
३ ख
भीष्म उवाच:
अथ काले व्यतिक्रान्ते कस्मिंश्चित्कुरुनन्दन |
४ क
भीष्म उवाच:
रुच्या भगिन्या दानं वै वभूव धनधान्यवत् ||
४ ख
भीष्म उवाच:
एतस्मिन्नेव काले तु दिव्या काचिद्वराङ्गना |
५ क
भीष्म उवाच:
विभ्रती परमं रूपं जगामाथ विहाय़सा ||
५ ख
भीष्म उवाच:
तस्याः शरीरात्पुष्पाणि पतितानि महीतले |
६ क
भीष्म उवाच:
तस्याश्रमस्याविदूरे दिव्यगन्धानि भारत ||
६ ख
भीष्म उवाच:
तान्यगृह्णात्ततो राजन्रुचिर्नलिनलोचना |
७ क
भीष्म उवाच:
तदा निमन्त्रकस्तस्या अङ्गेभ्यः क्षिप्रमागमत् ||
७ ख
भीष्म उवाच:
तस्या हि भगिनी तात ज्येष्ठा नाम्ना प्रभावती |
८ क
भीष्म उवाच:
भार्या चित्ररथस्याथ वभूवाङ्गेश्वरस्य वै ||
८ ख
भीष्म उवाच:
पिनह्य तानि पुष्पाणि केशेषु वरवर्णिनी |
९ क
भीष्म उवाच:
आमन्त्रिता ततोऽगच्छद्रुचिरङ्गपतेर्गृहान् ||
९ ख
भीष्म उवाच:
पुष्पाणि तानि दृष्ट्वाथ तदाङ्गेन्द्रवराङ्गना |
१० क
भीष्म उवाच:
भगिनीं चोदय़ामास पुष्पार्थे चारुलोचना ||
१० ख
भीष्म उवाच:
सा भर्त्रे सर्वमाचष्ट रुचिः सुरुचिरानना |
११ क
भीष्म उवाच:
भगिन्या भाषितं सर्वमृषिस्तच्चाभ्यनन्दत ||
११ ख
भीष्म उवाच:
ततो विपुलमानाय़्य देवशर्मा महातपाः |
१२ क
भीष्म उवाच:
पुष्पार्थे चोदय़ामास गच्छ गच्छेति भारत ||
१२ ख
भीष्म उवाच:
विपुलस्तु गुरोर्वाक्यमविचार्य महातपाः |
१३ क
भीष्म उवाच:
स तथेत्यव्रवीद्राजंस्तं च देशं जगाम ह ||
१३ ख
भीष्म उवाच:
यस्मिन्देशे तु तान्यासन्पतितानि नभस्तलात् |
१४ क
भीष्म उवाच:
अम्लानान्यपि तत्रासन्कुसुमान्यपराण्यपि ||
१४ ख
भीष्म उवाच:
ततः स तानि जग्राह दिव्यानि रुचिराणि च |
१५ क
भीष्म उवाच:
प्राप्तानि स्वेन तपसा दिव्यगन्धानि भारत ||
१५ ख
भीष्म उवाच:
सम्प्राप्य तानि प्रीतात्मा गुरोर्वचनकारकः |
१६ क
भीष्म उवाच:
ततो जगाम तूर्णं च चम्पां चम्पकमालिनीम् ||
१६ ख
भीष्म उवाच:
स वने विजने तात ददर्श मिथुनं नृणाम् |
१७ क
भीष्म उवाच:
चक्रवत्परिवर्तन्तं गृहीत्वा पाणिना करम् ||
१७ ख
भीष्म उवाच:
तत्रैकस्तूर्णमगमत्तत्पदे परिवर्तय़न् |
१८ क
भीष्म उवाच:
एकस्तु न तथा राजंश्चक्रतुः कलहं ततः ||
१८ ख
भीष्म उवाच:
त्वं शीघ्रं गच्छसीत्येकोऽव्रवीन्नेति तथापरः |
१९ क
भीष्म उवाच:
नेति नेति च तौ तात परस्परमथोचतुः ||
१९ ख
भीष्म उवाच:
तय़ोर्विस्पर्धतोरेवं शपथोऽय़मभूत्तदा |
२० क
भीष्म उवाच:
मनसोद्दिश्य विपुलं ततो वाक्यमथोचतुः ||
२० ख
भीष्म उवाच:
आवय़ोरनृतं प्राह यस्तस्याथ द्विजस्य वै |
२१ क
भीष्म उवाच:
विपुलस्य परे लोके या गतिः सा भवेदिति ||
२१ ख
भीष्म उवाच:
एतच्छ्रुत्वा तु विपुलो विषण्णवदनोऽभवत् |
२२ क
भीष्म उवाच:
एवं तीव्रतपाश्चाहं कष्टश्चाय़ं परिग्रहः ||
२२ ख
भीष्म उवाच:
मिथुनस्यास्य किं मे स्यात्कृतं पापं यतो गतिः |
२३ क
भीष्म उवाच:
अनिष्टा सर्वभूतानां कीर्तितानेन मेऽद्य वै ||
२३ ख
भीष्म उवाच:
एवं सञ्चिन्तय़न्नेव विपुलो राजसत्तम |
२४ क
भीष्म उवाच:
अवाङ्मुखो न्यस्तशिरा दध्यौ दुष्कृतमात्मनः ||
२४ ख
भीष्म उवाच:
ततः षडन्यान्पुरुषानक्षैः काञ्चनराजतैः |
२५ क
भीष्म उवाच:
अपश्यद्दीव्यमानान्वै लोभहर्षान्वितांस्तथा ||
२५ ख
भीष्म उवाच:
कुर्वतः शपथं तं वै यः कृतो मिथुनेन वै |
२६ क
भीष्म उवाच:
विपुलं वै समुद्दिश्य तेऽपि वाक्यमथाव्रुवन् ||
२६ ख
भीष्म उवाच:
यो लोभमास्थाय़ास्माकं विषमं कर्तुमुत्सहेत् |
२७ क
भीष्म उवाच:
विपुलस्य परे लोके या गतिस्तामवाप्नुय़ात् ||
२७ ख
भीष्म उवाच:
एतच्छ्रुत्वा तु विपुलो नापश्यद्धर्मसङ्करम् |
२८ क
भीष्म उवाच:
जन्मप्रभृति कौरव्य कृतपूर्वमथात्मनः ||
२८ ख
भीष्म उवाच:
स प्रदध्यौ तदा राजन्नग्नावग्निरिवाहितः |
२९ क
भीष्म उवाच:
दह्यमानेन मनसा शापं श्रुत्वा तथाविधम् ||
२९ ख
भीष्म उवाच:
तस्य चिन्तय़तस्तात वह्व्यो दिननिशा यय़ुः |
३० क
भीष्म उवाच:
इदमासीन्मनसि च रुच्या रक्षणकारितम् ||
३० ख
भीष्म उवाच:
लक्षणं लक्षणेनैव वदनं वदनेन च |
३१ क
भीष्म उवाच:
विधाय़ न मय़ा चोक्तं सत्यमेतद्गुरोस्तदा ||
३१ ख
भीष्म उवाच:
एतदात्मनि कौरव्य दुष्कृतं विपुलस्तदा |
३२ क
भीष्म उवाच:
अमन्यत महाभाग तथा तच्च न संशय़ः ||
३२ ख
भीष्म उवाच:
स चम्पां नगरीमेत्य पुष्पाणि गुरवे ददौ |
३३ क
भीष्म उवाच:
पूजय़ामास च गुरुं विधिवत्स गुरुप्रिय़ः ||
३३ ख