chevron_left आदि पर्व अध्याय ४३
सूत उवाच:
वासुकिस्त्वव्रवीद्वाक्यं जरत्कारुमृषिं तदा |
१ क
सूत उवाच:
सनामा तव कन्येय़ं स्वसा मे तपसान्विता ||
१ ख
सूत उवाच:
भरिष्यामि च ते भार्यां प्रतीच्छेमां द्विजोत्तम |
२ क
सूत उवाच:
रक्षणं च करिष्येऽस्याः सर्वशक्त्या तपोधन ||
२ ख
सूत उवाच:
प्रतिश्रुते तु नागेन भरिष्ये भगिनीमिति |
३ क
सूत उवाच:
जरत्कारुस्तदा वेश्म भुजगस्य जगाम ह ||
३ ख
सूत उवाच:
तत्र मन्त्रविदां श्रेष्ठस्तपोवृद्धो महाव्रतः |
४ क
सूत उवाच:
जग्राह पाणिं धर्मात्मा विधिमन्त्रपुरस्कृतम् ||
४ ख
सूत उवाच:
ततो वासगृहं शुभ्रं पन्नगेन्द्रस्य संमतम् |
५ क
सूत उवाच:
जगाम भार्यामादाय़ स्तूय़मानो महर्षिभिः ||
५ ख
सूत उवाच:
शय़नं तत्र वै कॢप्तं स्पर्ध्यास्तरणसंवृतम् |
६ क
सूत उवाच:
तत्र भार्यासहाय़ः स जरत्कारुरुवास ह ||
६ ख
सूत उवाच:
स तत्र समय़ं चक्रे भार्यया सह सत्तमः |
७ क
सूत उवाच:
विप्रिय़ं मे न कर्तव्यं न च वाच्यं कदाचन ||
७ ख
सूत उवाच:
त्यजेय़मप्रिय़े हि त्वां कृते वासं च ते गृहे |
८ क
सूत उवाच:
एतद्गृहाण वचनं मय़ा यत्समुदीरितम् ||
८ ख
सूत उवाच:
ततः परमसंविग्ना स्वसा नागपतेस्तु सा |
९ क
सूत उवाच:
अतिदुःखान्विता वाचं तमुवाचैवमस्त्विति ||
९ ख
सूत उवाच:
तथैव सा च भर्तारं दुःखशीलमुपाचरत् |
१० क
सूत उवाच:
उपाय़ैः श्वेतकाकीय़ैः प्रिय़कामा यशस्विनी ||
१० ख
सूत उवाच:
ऋतुकाले ततः स्नाता कदाचिद्वासुकेः स्वसा |
११ क
सूत उवाच:
भर्तारं तं यथान्याय़मुपतस्थे महामुनिम् ||
११ ख
सूत उवाच:
तत्र तस्याः समभवद्गर्भो ज्वलनसंनिभः |
१२ क
सूत उवाच:
अतीव तपसा युक्तो वैश्वानरसमद्युतिः |
१२ ख
सूत उवाच:
शुक्लपक्षे यथा सोमो व्यवर्धत तथैव सः ||
१२ ग
सूत उवाच:
ततः कतिपय़ाहस्य जरत्कारुर्महातपाः |
१३ क
सूत उवाच:
उत्सङ्गेऽस्याः शिरः कृत्वा सुष्वाप परिखिन्नवत् ||
१३ ख
सूत उवाच:
तस्मिंश्च सुप्ते विप्रेन्द्रे सवितास्तमिय़ाद्गिरिम् |
१४ क
सूत उवाच:
अह्नः परिक्षय़े व्रह्मंस्ततः साचिन्तय़त्तदा |
१४ ख
सूत उवाच:
वासुकेर्भगिनी भीता धर्मलोपान्मनस्विनी ||
१४ ग
सूत उवाच:
किं नु मे सुकृतं भूय़ाद्भर्तुरुत्थापनं न वा |
१५ क
सूत उवाच:
दुःखशीलो हि धर्मात्मा कथं नास्यापराध्नुय़ाम् ||
१५ ख
सूत उवाच:
कोपो वा धर्मशीलस्य धर्मलोपोऽथ वा पुनः |
१६ क
सूत उवाच:
धर्मलोपो गरीय़ान्वै स्यादत्रेत्यकरोन्मनः ||
१६ ख
सूत उवाच:
उत्थापय़िष्ये यद्येनं ध्रुवं कोपं करिष्यति |
१७ क
सूत उवाच:
धर्मलोपो भवेदस्य सन्ध्यातिक्रमणे ध्रुवम् ||
१७ ख
सूत उवाच:
इति निश्चित्य मनसा जरत्कारुर्भुजङ्गमा |
१८ क
सूत उवाच:
तमृषिं दीप्ततपसं शय़ानमनलोपमम् |
१८ ख
सूत उवाच:
उवाचेदं वचः श्लक्ष्णं ततो मधुरभाषिणी ||
१८ ग
सूत उवाच:
उत्तिष्ठ त्वं महाभाग सूर्योऽस्तमुपगच्छति |
१९ क
सूत उवाच:
सन्ध्यामुपास्स्व भगवन्नपः स्पृष्ट्वा यतव्रतः ||
१९ ख
सूत उवाच:
प्रादुष्कृताग्निहोत्रोऽय़ं मुहूर्तो रम्यदारुणः |
२० क
सूत उवाच:
सन्ध्या प्रवर्तते चेय़ं पश्चिमाय़ां दिशि प्रभो ||
२० ख
सूत उवाच:
एवमुक्तः स भगवाञ्जरत्कारुर्महातपाः |
२१ क
सूत उवाच:
भार्यां प्रस्फुरमाणोष्ठ इदं वचनमव्रवीत् ||
२१ ख
सूत उवाच:
अवमानः प्रय़ुक्तोऽय़ं त्वय़ा मम भुजङ्गमे |
२२ क
सूत उवाच:
समीपे ते न वत्स्यामि गमिष्यामि यथागतम् ||
२२ ख
सूत उवाच:
न हि तेजोऽस्ति वामोरु मय़ि सुप्ते विभावसोः |
२३ क
सूत उवाच:
अस्तं गन्तुं यथाकालमिति मे हृदि वर्तते ||
२३ ख
सूत उवाच:
न चाप्यवमतस्येह वस्तुं रोचेत कस्यचित् |
२४ क
सूत उवाच:
किं पुनर्धर्मशीलस्य मम वा मद्विधस्य वा ||
२४ ख
सूत उवाच:
एवमुक्ता जरत्कारुर्भर्त्रा हृदय़कम्पनम् |
२५ क
सूत उवाच:
अव्रवीद्भगिनी तत्र वासुकेः संनिवेशने ||
२५ ख
सूत उवाच:
नावमानात्कृतवती तवाहं प्रतिवोधनम् |
२६ क
सूत उवाच:
धर्मलोपो न ते विप्र स्यादित्येतत्कृतं मय़ा ||
२६ ख
सूत उवाच:
उवाच भार्यामित्युक्तो जरत्कारुर्महातपाः |
२७ क
सूत उवाच:
ऋषिः कोपसमाविष्टस्त्यक्तुकामो भुजङ्गमाम् ||
२७ ख
सूत उवाच:
न मे वागनृतं प्राह गमिष्येऽहं भुजङ्गमे |
२८ क
सूत उवाच:
समय़ो ह्येष मे पूर्वं त्वय़ा सह मिथः कृतः ||
२८ ख
सूत उवाच:
सुखमस्म्युषितो भद्रे व्रूय़ास्त्वं भ्रातरं शुभे |
२९ क
सूत उवाच:
इतो मय़ि गते भीरु गतः स भगवानिति |
२९ ख
सूत उवाच:
त्वं चापि मय़ि निष्क्रान्ते न शोकं कर्तुमर्हसि ||
२९ ग
सूत उवाच:
इत्युक्ता सानवद्याङ्गी प्रत्युवाच पतिं तदा |
३० क
सूत उवाच:
जरत्कारुं जरत्कारुश्चिन्ताशोकपराय़णा ||
३० ख
सूत उवाच:
वाष्पगद्गदय़ा वाचा मुखेन परिशुष्यता |
३१ क
सूत उवाच:
कृताञ्जलिर्वरारोहा पर्यश्रुनय़ना ततः |
३१ ख
सूत उवाच:
धैर्यमालम्व्य वामोरूर्हृदय़ेन प्रवेपता ||
३१ ग
सूत उवाच:
न मामर्हसि धर्मज्ञ परित्यक्तुमनागसम् |
३२ क
सूत उवाच:
धर्मे स्थितां स्थितो धर्मे सदा प्रिय़हिते रताम् ||
३२ ख
सूत उवाच:
प्रदाने कारणं यच्च मम तुभ्यं द्विजोत्तम |
३३ क
सूत उवाच:
तदलव्धवतीं मन्दां किं मां वक्ष्यति वासुखिः ||
३३ ख
सूत उवाच:
मातृशापाभिभूतानां ज्ञातीनां मम सत्तम |
३४ क
सूत उवाच:
अपत्यमीप्षितं त्वत्तस्तच्च तावन्न दृश्यते ||
३४ ख
सूत उवाच:
त्वत्तो ह्यपत्यलाभेन ज्ञातीनां मे शिवं भवेत् |
३५ क
सूत उवाच:
सम्प्रय़ोगो भवेन्नाय़ं मम मोघस्त्वय़ा द्विज ||
३५ ख
सूत उवाच:
ज्ञातीनां हितमिच्छन्ती भगवंस्त्वां प्रसादय़े |
३६ क
सूत उवाच:
इममव्यक्तरूपं मे गर्भमाधाय़ सत्तम |
३६ ख
सूत उवाच:
कथं त्यक्त्वा महात्मा सन्गन्तुमिच्छस्यनागसम् ||
३६ ग
सूत उवाच:
एवमुक्तस्तु स मुनिर्भार्यां वचनमव्रवीत् |
३७ क
सूत उवाच:
यद्युक्तमनुरूपं च जरत्कारुस्तपोधनः ||
३७ ख
सूत उवाच:
अस्त्येष गर्भः सुभगे तव वैश्वानरोपमः |
३८ क
सूत उवाच:
ऋषिः परमधर्मात्मा वेदवेदाङ्गपारगः ||
३८ ख
सूत उवाच:
एवमुक्त्वा स धर्मात्मा जरत्कारुर्महानृषिः |
३९ क
सूत उवाच:
उग्राय़ तपसे भूय़ो जगाम कृतनिश्चय़ः ||
३९ ख