सूत उवाच:
गतमात्रं तु भर्तारं जरत्कारुरवेदय़त् |
१ क
सूत उवाच:
भ्रातुस्त्वरितमागम्य यथातथ्यं तपोधन ||
१ ख
सूत उवाच:
ततः स भुजगश्रेष्ठः श्रुत्वा सुमहदप्रिय़म् |
२ क
सूत उवाच:
उवाच भगिनीं दीनां तदा दीनतरः स्वय़म् ||
२ ख
सूत उवाच:
जानासि भद्रे यत्कार्यं प्रदाने कारणं च यत् |
३ क
सूत उवाच:
पन्नगानां हितार्थाय़ पुत्रस्ते स्यात्ततो यदि ||
३ ख
सूत उवाच:
स सर्पसत्रात्किल नो मोक्षय़िष्यति वीर्यवान् |
४ क
सूत उवाच:
एवं पितामहः पूर्वमुक्तवान्मां सुरैः सह ||
४ ख
सूत उवाच:
अप्यस्ति गर्भः सुभगे तस्मात्ते मुनिसत्तमात् |
५ क
सूत उवाच:
न चेच्छाम्यफलं तस्य दारकर्म मनीषिणः ||
५ ख
सूत उवाच:
कामं च मम न न्याय़्यं प्रष्टुं त्वां कार्यमीदृशम् |
६ क
सूत उवाच:
किं तु कार्यगरीय़स्त्वात्ततस्त्वाहमचूचुदम् ||
६ ख
सूत उवाच:
दुर्वासतां विदित्वा च भर्तुस्तेऽतितपस्विनः |
७ क
सूत उवाच:
नैनमन्वागमिष्यामि कदाचिद्धि शपेत्स माम् ||
७ ख
सूत उवाच:
आचक्ष्व भद्रे भर्तुस्त्वं सर्वमेव विचेष्टितम् |
८ क
सूत उवाच:
शल्यमुद्धर मे घोरं भद्रे हृदि चिरस्थितम् ||
८ ख
सूत उवाच:
जरत्कारुस्ततो वाक्यमित्युक्ता प्रत्यभाषत |
९ क
सूत उवाच:
आश्वासय़न्ती सन्तप्तं वासुकिं पन्नगेश्वरम् ||
९ ख
सूत उवाच:
पृष्टो मय़ापत्यहेतोः स महात्मा महातपाः |
१० क
सूत उवाच:
अस्तीत्युदरमुद्दिश्य ममेदं गतवांश्च सः ||
१० ख
सूत उवाच:
स्वैरेष्वपि न तेनाहं स्मरामि वितथं क्वचित् |
११ क
सूत उवाच:
उक्तपूर्वं कुतो राजन्साम्पराय़े स वक्ष्यति ||
११ ख
सूत उवाच:
न सन्तापस्त्वय़ा कार्यः कार्यं प्रति भुजङ्गमे |
१२ क
सूत उवाच:
उत्पत्स्यति हि ते पुत्रो ज्वलनार्कसमद्युतिः ||
१२ ख
सूत उवाच:
इत्युक्त्वा हि स मां भ्रातर्गतो भर्ता तपोवनम् |
१३ क
सूत उवाच:
तस्माद्व्येतु परं दुःखं तवेदं मनसि स्थितम् ||
१३ ख
सूत उवाच:
एतच्छ्रुत्वा स नागेन्द्रो वासुकिः परय़ा मुदा |
१४ क
सूत उवाच:
एवमस्त्विति तद्वाक्यं भगिन्याः प्रत्यगृह्णत ||
१४ ख
सूत उवाच:
सान्त्वमानार्थदानैश्च पूजय़ा चानुरूपय़ा |
१५ क
सूत उवाच:
सोदर्यां पूजय़ामास स्वसारं पन्नगोत्तमः ||
१५ ख
सूत उवाच:
ततः स ववृधे गर्भो महातेजा रविप्रभः |
१६ क
सूत उवाच:
यथा सोमो द्विजश्रेष्ठ शुक्लपक्षोदितो दिवि ||
१६ ख
सूत उवाच:
यथाकालं तु सा व्रह्मन्प्रजज्ञे भुजगस्वसा |
१७ क
सूत उवाच:
कुमारं देवगर्भाभं पितृमातृभय़ापहम् ||
१७ ख
सूत उवाच:
ववृधे स च तत्रैव नागराजनिवेशने |
१८ क
सूत उवाच:
वेदांश्चाधिजगे साङ्गान्भार्गवाच्च्यवनात्मजात् ||
१८ ख
सूत उवाच:
चरितव्रतो वाल एव वुद्धिसत्त्वगुणान्वितः |
१९ क
सूत उवाच:
नाम चास्याभवत्ख्यातं लोकेष्वास्तीक इत्युत ||
१९ ख
सूत उवाच:
अस्तीत्युक्त्वा गतो यस्मात्पिता गर्भस्थमेव तम् |
२० क
सूत उवाच:
वनं तस्मादिदं तस्य नामास्तीकेति विश्रुतम् ||
२० ख
सूत उवाच:
स वाल एव तत्रस्थश्चरन्नमितवुद्धिमान् |
२१ क
सूत उवाच:
गृहे पन्नगराजस्य प्रय़त्नात्पर्यरक्ष्यत ||
२१ ख
सूत उवाच:
भगवानिव देवेशः शूलपाणिर्हिरण्यदः |
२२ क
सूत उवाच:
विवर्धमानः सर्वांस्तान्पन्नगानभ्यहर्षय़त् ||
२२ ख