chevron_left आदि पर्व अध्याय ४५
शौनक उवाच:
यदपृच्छत्तदा राजा मन्त्रिणो जनमेजय़ः |
१ क
शौनक उवाच:
पितुः स्वर्गगतिं तन्मे विस्तरेण पुनर्वद ||
१ ख
सूत उवाच:
शृणु व्रह्मन्यथा पृष्टा मन्त्रिणो नृपतेस्तदा |
२ क
सूत उवाच:
आख्यातवन्तस्ते सर्वे निधनं तत्परिक्षितः ||
२ ख
जनमेजय़ उवाच:
जानन्ति तु भवन्तस्तद्यथावृत्तः पिता मम |
३ क
जनमेजय़ उवाच:
आसीद्यथा च निधनं गतः काले महाय़शाः ||
३ ख
जनमेजय़ उवाच:
श्रुत्वा भवत्सकाशाद्धि पितुर्वृत्तमशेषतः |
४ क
जनमेजय़ उवाच:
कल्याणं प्रतिपत्स्यामि विपरीतं न जातु चित् ||
४ ख
सूत उवाच:
मन्त्रिणोऽथाव्रुवन्वाक्यं पृष्टास्तेन महात्मना |
५ क
सूत उवाच:
सर्वधर्मविदः प्राज्ञा राजानं जनमेजय़म् ||
५ ख
सूत उवाच:
धर्मात्मा च महात्मा च प्रजापालः पिता तव |
६ क
सूत उवाच:
आसीदिह यथावृत्तः स महात्मा शृणुष्व तत् ||
६ ख
सूत उवाच:
चातुर्वर्ण्यं स्वधर्मस्थं स कृत्वा पर्यरक्षत |
७ क
सूत उवाच:
धर्मतो धर्मविद्राजा धर्मो विग्रहवानिव ||
७ ख
सूत उवाच:
ररक्ष पृथिवीं देवीं श्रीमानतुलविक्रमः |
८ क
सूत उवाच:
द्वेष्टारस्तस्य नैवासन्स च न द्वेष्टि कञ्चन |
८ ख
सूत उवाच:
समः सर्वेषु भूतेषु प्रजापतिरिवाभवत् ||
८ ग
सूत उवाच:
व्राह्मणाः क्षत्रिय़ा वैश्याः शूद्राश्चैव स्वकर्मसु |
९ क
सूत उवाच:
स्थिताः सुमनसो राजंस्तेन राज्ञा स्वनुष्ठिताः ||
९ ख
सूत उवाच:
विधवानाथकृपणान्विकलांश्च वभार सः |
१० क
सूत उवाच:
सुदर्शः सर्वभूतानामासीत्सोम इवापरः ||
१० ख
सूत उवाच:
तुष्टपुष्टजनः श्रीमान्सत्यवाग्दृढविक्रमः |
११ क
सूत उवाच:
धनुर्वेदे च शिष्योऽभून्नृपः शारद्वतस्य सः ||
११ ख
सूत उवाच:
गोविन्दस्य प्रिय़श्चासीत्पिता ते जनमेजय़ |
१२ क
सूत उवाच:
लोकस्य चैव सर्वस्य प्रिय़ आसीन्महाय़शाः ||
१२ ख
सूत उवाच:
परिक्षीणेषु कुरुषु उत्तराय़ामजाय़त |
१३ क
सूत उवाच:
परिक्षिदभवत्तेन सौभद्रस्यात्मजो वली ||
१३ ख
सूत उवाच:
राजधर्मार्थकुशलो युक्तः सर्वगुणैर्नृपः |
१४ क
सूत उवाच:
जितेन्द्रिय़श्चात्मवांश्च मेधावी वृद्धसेवितः ||
१४ ख
सूत उवाच:
षड्वर्गविन्महावुद्धिर्नीतिधर्मविदुत्तमः |
१५ क
सूत उवाच:
प्रजा इमास्तव पिता षष्टिं वर्षाण्यपालय़त् |
१५ ख
सूत उवाच:
ततो दिष्टान्तमापन्नः सर्पेणानतिवर्तितम् ||
१५ ग
सूत उवाच:
ततस्त्वं पुरुषश्रेष्ठ धर्मेण प्रतिपेदिवान् |
१६ क
सूत उवाच:
इदं वर्षसहस्राय़ राज्यं कुरुकुलागतम् |
१६ ख
सूत उवाच:
वाल एवाभिजातोऽसि सर्वभूतानुपालकः ||
१६ ग
जनमेजय़ उवाच:
नास्मिन्कुले जातु वभूव राजा; यो न प्रजानां हितकृत्प्रिय़श्च |
१७ क
जनमेजय़ उवाच:
विशेषतः प्रेक्ष्य पितामहानां; वृत्तं महद्वृत्तपराय़णानाम् ||
१७ ख
जनमेजय़ उवाच:
कथं निधनमापन्नः पिता मम तथाविधः |
१८ क
जनमेजय़ उवाच:
आचक्षध्वं यथावन्मे श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ||
१८ ख
सूत उवाच:
एवं सञ्चोदिता राज्ञा मन्त्रिणस्ते नराधिपम् |
१९ क
सूत उवाच:
ऊचुः सर्वे यथावृत्तं राज्ञः प्रिय़हिते रताः ||
१९ ख
सूत उवाच:
वभूव मृगय़ाशीलस्तव राजन्पिता सदा |
२० क
सूत उवाच:
यथा पाण्डुर्महाभागो धनुर्धरवरो युधि |
२० ख
सूत उवाच:
अस्मास्वासज्य सर्वाणि राजकार्याण्यशेषतः ||
२० ग
सूत उवाच:
स कदाचिद्वनचरो मृगं विव्याध पत्रिणा |
२१ क
सूत उवाच:
विद्ध्वा चान्वसरत्तूर्णं तं मृगं गहने वने ||
२१ ख
सूत उवाच:
पदातिर्वद्धनिस्त्रिंशस्तताय़ुधकलापवान् |
२२ क
सूत उवाच:
न चाससाद गहने मृगं नष्टं पिता तव ||
२२ ख
सूत उवाच:
परिश्रान्तो वय़ःस्थश्च षष्टिवर्षो जरान्वितः |
२३ क
सूत उवाच:
क्षुधितः स महारण्ये ददर्श मुनिमन्तिके ||
२३ ख
सूत उवाच:
स तं पप्रच्छ राजेन्द्रो मुनिं मौनव्रतान्वितम् |
२४ क
सूत उवाच:
न च किञ्चिदुवाचैनं स मुनिः पृच्छतोऽपि सन् ||
२४ ख
सूत उवाच:
ततो राजा क्षुच्छ्रमार्तस्तं मुनिं स्थाणुवत्स्थितम् |
२५ क
सूत उवाच:
मौनव्रतधरं शान्तं सद्यो मन्युवशं यय़ौ ||
२५ ख
सूत उवाच:
न वुवोध हि तं राजा मौनव्रतधरं मुनिम् |
२६ क
सूत उवाच:
स तं मन्युसमाविष्टो धर्षय़ामास ते पिता ||
२६ ख
सूत उवाच:
मृतं सर्पं धनुष्कोट्या समुत्क्षिप्य धरातलात् |
२७ क
सूत उवाच:
तस्य शुद्धात्मनः प्रादात्स्कन्धे भरतसत्तम ||
२७ ख
सूत उवाच:
न चोवाच स मेधावी तमथो साध्वसाधु वा |
२८ क
सूत उवाच:
तस्थौ तथैव चाक्रुध्यन्सर्पं स्कन्धेन धारय़न् ||
२८ ख