chevron_left सभा पर्व अध्याय ४५
वैशम्पाय़न उवाच:
अनुभूय़ तु राज्ञस्तं राजसूय़ं महाक्रतुम् |
१ क
वैशम्पाय़न उवाच:
युधिष्ठिरस्य नृपतेर्गान्धारीपुत्रसंय़ुतः ||
१ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
प्रिय़कृन्मतमाज्ञाय़ पूर्वं दुर्योधनस्य तत् |
२ क
वैशम्पाय़न उवाच:
प्रज्ञाचक्षुषमासीनं शकुनिः सौवलस्तदा ||
२ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
दुर्योधनवचः श्रुत्वा धृतराष्ट्रं जनाधिपम् |
३ क
वैशम्पाय़न उवाच:
उपगम्य महाप्राज्ञं शकुनिर्वाक्यमव्रवीत् ||
३ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
दुर्योधनो महाराज विवर्णो हरिणः कृशः |
४ क
वैशम्पाय़न उवाच:
दीनश्चिन्तापरश्चैव तद्विद्धि भरतर्षभ ||
४ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
न वै परीक्षसे सम्यगसह्यं शत्रुसम्भवम् |
५ क
वैशम्पाय़न उवाच:
ज्येष्ठपुत्रस्य शोकं त्वं किमर्थं नाववुध्यसे ||
५ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
दुर्योधन कुतोमूलं भृशमार्तोऽसि पुत्रक |
६ क
धृतराष्ट्र उवाच:
श्रोतव्यश्चेन्मय़ा सोऽर्थो व्रूहि मे कुरुनन्दन ||
६ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
अय़ं त्वां शकुनिः प्राह विवर्णं हरिणं कृशम् |
७ क
धृतराष्ट्र उवाच:
चिन्तय़ंश्च न पश्यामि शोकस्य तव सम्भवम् ||
७ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
ऐश्वर्यं हि महत्पुत्र त्वय़ि सर्वं समर्पितम् |
८ क
धृतराष्ट्र उवाच:
भ्रातरः सुहृदश्चैव नाचरन्ति तवाप्रिय़म् ||
८ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
आच्छादय़सि प्रावारानश्नासि पिशितौदनम् |
९ क
धृतराष्ट्र उवाच:
आजानेय़ा वहन्ति त्वां केनासि हरिणः कृशः ||
९ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
शय़नानि महार्हाणि योषितश्च मनोरमाः |
१० क
धृतराष्ट्र उवाच:
गुणवन्ति च वेश्मानि विहाराश्च यथासुखम् ||
१० ख
धृतराष्ट्र उवाच:
देवानामिव ते सर्वं वाचि वद्धं न संशय़ः |
११ क
धृतराष्ट्र उवाच:
स दीन इव दुर्धर्षः कस्माच्छोचसि पुत्रक ||
११ ख
दुर्योधन उवाच:
अश्नाम्याच्छादय़े चाहं यथा कुपुरुषस्तथा |
१२ क
दुर्योधन उवाच:
अमर्षं धारय़े चोग्रं तितिक्षन्कालपर्ययम् ||
१२ ख
दुर्योधन उवाच:
अमर्षणः स्वाः प्रकृतीरभिभूय़ परे स्थिताः |
१३ क
दुर्योधन उवाच:
क्लेशान्मुमुक्षुः परजान्स वै पुरुष उच्यते ||
१३ ख
दुर्योधन उवाच:
सन्तोषो वै श्रिय़ं हन्ति अभिमानश्च भारत |
१४ क
दुर्योधन उवाच:
अनुक्रोशभय़े चोभे यैर्वृतो नाश्नुते महत् ||
१४ ख
दुर्योधन उवाच:
न मामवति तद्भुक्तं श्रिय़ं दृष्ट्वा युधिष्ठिरे |
१५ क
दुर्योधन उवाच:
ज्वलन्तीमिव कौन्तेय़े विवर्णकरणीं मम ||
१५ ख
दुर्योधन उवाच:
सपत्नानृध्यतोऽऽत्मानं हीय़मानं निशाम्य च |
१६ क
दुर्योधन उवाच:
अदृश्यामपि कौन्तेय़े स्थितां पश्यन्निवोद्यताम् |
१६ ख
दुर्योधन उवाच:
तस्मादहं विवर्णश्च दीनश्च हरिणः कृशः ||
१६ ग
दुर्योधन उवाच:
अष्टाशीतिसहस्राणि स्नातका गृहमेधिनः |
१७ क
दुर्योधन उवाच:
त्रिंशद्दासीक एकैको यान्विभर्ति युधिष्ठिरः ||
१७ ख
दुर्योधन उवाच:
दशान्यानि सहस्राणि नित्यं तत्रान्नमुत्तमम् |
१८ क
दुर्योधन उवाच:
भुञ्जते रुक्मपात्रीभिर्युधिष्ठिरनिवेशने ||
१८ ख
दुर्योधन उवाच:
कदलीमृगमोकानि कृष्णश्यामारुणानि च |
१९ क
दुर्योधन उवाच:
काम्वोजः प्राहिणोत्तस्मै परार्ध्यानपि कम्वलान् ||
१९ ख
दुर्योधन उवाच:
रथय़ोषिद्गवाश्वस्य शतशोऽथ सहस्रशः |
२० क
दुर्योधन उवाच:
त्रिंशतं चोष्ट्रवामीनां शतानि विचरन्त्युत ||
२० ख
दुर्योधन उवाच:
पृथग्विधानि रत्नानि पार्थिवाः पृथिवीपते |
२१ क
दुर्योधन उवाच:
आहरन्क्रतुमुख्येऽस्मिन्कुन्तीपुत्राय़ भूरिशः ||
२१ ख
दुर्योधन उवाच:
न क्वचिद्धि मय़ा दृष्टस्तादृशो नैव च श्रुतः |
२२ क
दुर्योधन उवाच:
यादृग्धनागमो यज्ञे पाण्डुपुत्रस्य धीमतः ||
२२ ख
दुर्योधन उवाच:
अपर्यन्तं धनौघं तं दृष्ट्वा शत्रोरहं नृप |
२३ क
दुर्योधन उवाच:
शर्म नैवाधिगच्छामि चिन्तय़ानोऽनिशं विभो ||
२३ ख
दुर्योधन उवाच:
व्राह्मणा वाटधानाश्च गोमन्तः शतसङ्घशः |
२४ क
दुर्योधन उवाच:
त्रैखर्वं वलिमादाय़ द्वारि तिष्ठन्ति वारिताः ||
२४ ख
दुर्योधन उवाच:
कमण्डलूनुपादाय़ जातरूपमय़ाञ्शुभान् |
२५ क
दुर्योधन उवाच:
एवं वलिं समादाय़ प्रवेशं लेभिरे ततः ||
२५ ख
दुर्योधन उवाच:
यन्नैव मधु शक्राय़ धारय़न्त्यमरस्त्रिय़ः |
२६ क
दुर्योधन उवाच:
तदस्मै कांस्यमाहार्षीद्वारुणं कलशोदधिः ||
२६ ख
दुर्योधन उवाच:
शैक्यं रुक्मसहस्रस्य वहुरत्नविभूषितम् |
२७ क
दुर्योधन उवाच:
दृष्ट्वा च मम तत्सर्वं ज्वररूपमिवाभवत् ||
२७ ख
दुर्योधन उवाच:
गृहीत्वा तत्तु गच्छन्ति समुद्रौ पूर्वदक्षिणौ |
२८ क
दुर्योधन उवाच:
तथैव पश्चिमं यान्ति गृहीत्वा भरतर्षभ ||
२८ ख
दुर्योधन उवाच:
उत्तरं तु न गच्छन्ति विना तात पतत्रिभिः |
२९ क
दुर्योधन उवाच:
इदं चाद्भुतमत्रासीत्तन्मे निगदतः शृणु ||
२९ ख
दुर्योधन उवाच:
पूर्णे शतसहस्रे तु विप्राणां परिविष्यताम् |
३० क
दुर्योधन उवाच:
स्थापिता तत्र सञ्ज्ञाभूच्छङ्खो ध्माय़ति नित्यशः ||
३० ख
दुर्योधन उवाच:
मुहुर्मुहुः प्रणदतस्तस्य शङ्खस्य भारत |
३१ क
दुर्योधन उवाच:
उत्तमं शव्दमश्रौषं ततो रोमाणि मेऽहृषन् ||
३१ ख
दुर्योधन उवाच:
पार्थिवैर्वहुभिः कीर्णमुपस्थानं दिदृक्षुभिः |
३२ क
दुर्योधन उवाच:
सर्वरत्नान्युपादाय़ पार्थिवा वै जनेश्वर ||
३२ ख
दुर्योधन उवाच:
यज्ञे तस्य महाराज पाण्डुपुत्रस्य धीमतः |
३३ क
दुर्योधन उवाच:
वैश्या इव महीपाला द्विजातिपरिवेषकाः ||
३३ ख
दुर्योधन उवाच:
न सा श्रीर्देवराजस्य यमस्य वरुणस्य वा |
३४ क
दुर्योधन उवाच:
गुह्यकाधिपतेर्वापि या श्री राजन्युधिष्ठिरे ||
३४ ख
दुर्योधन उवाच:
तां दृष्ट्वा पाण्डुपुत्रस्य श्रिय़ं परमिकामहम् |
३५ क
दुर्योधन उवाच:
शान्तिं न परिगच्छामि दह्यमानेन चेतसा ||
३५ ख
शकुनिरु उवाच:
यामेतामुत्तमां लक्ष्मीं दृष्टवानसि पाण्डवे |
३६ क
शकुनिरु उवाच:
तस्याः प्राप्तावुपाय़ं मे शृणु सत्यपराक्रम ||
३६ ख
शकुनिरु उवाच:
अहमक्षेष्वभिज्ञातः पृथिव्यामपि भारत |
३७ क
शकुनिरु उवाच:
हृदय़ज्ञः पणज्ञश्च विशेषज्ञश्च देवने ||
३७ ख
शकुनिरु उवाच:
द्यूतप्रिय़श्च कौन्तेय़ो न च जानाति देवितुम् |
३८ क
शकुनिरु उवाच:
आहूतश्चैष्यति व्यक्तं दीव्यावेत्याह्वय़स्व तम् ||
३८ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
एवमुक्तः शकुनिना राजा दुर्योधनस्तदा |
३९ क
वैशम्पाय़न उवाच:
धृतराष्ट्रमिदं वाक्यमपदान्तरमव्रवीत् ||
३९ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
अय़मुत्सहते राजञ्श्रिय़माहर्तुमक्षवित् |
४० क
वैशम्पाय़न उवाच:
द्यूतेन पाण्डुपुत्रस्य तदनुज्ञातुमर्हसि ||
४० ख
धृतराष्ट्र उवाच:
क्षत्ता मन्त्री महाप्राज्ञः स्थितो यस्यास्मि शासने |
४१ क
धृतराष्ट्र उवाच:
तेन सङ्गम्य वेत्स्यामि कार्यस्यास्य विनिश्चय़म् ||
४१ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
स हि धर्मं पुरस्कृत्य दीर्घदर्शी परं हितम् |
४२ क
धृतराष्ट्र उवाच:
उभय़ोः पक्षय़ोर्युक्तं वक्ष्यत्यर्थविनिश्चय़म् ||
४२ ख
दुर्योधन उवाच:
निवर्तय़िष्यति त्वासौ यदि क्षत्ता समेष्यति |
४३ क
दुर्योधन उवाच:
निवृत्ते त्वय़ि राजेन्द्र मरिष्येऽहमसंशय़म् ||
४३ ख
दुर्योधन उवाच:
स मय़ि त्वं मृते राजन्विदुरेण सुखी भव |
४४ क
दुर्योधन उवाच:
भोक्ष्यसे पृथिवीं कृत्स्नां किं मय़ा त्वं करिष्यसि ||
४४ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
आर्तवाक्यं तु तत्तस्य प्रणय़ोक्तं निशम्य सः |
४५ क
वैशम्पाय़न उवाच:
धृतराष्ट्रोऽव्रवीत्प्रेष्यान्दुर्योधनमते स्थितः ||
४५ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
स्थूणासहस्रैर्वृहतीं शतद्वारां सभां मम |
४६ क
वैशम्पाय़न उवाच:
मनोरमां दर्शनीय़ामाशु कुर्वन्तु शिल्पिनः ||
४६ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
ततः संस्तीर्य रत्नैस्तामक्षानावाप्य सर्वशः |
४७ क
वैशम्पाय़न उवाच:
सुकृतां सुप्रवेशां च निवेदय़त मे शनैः ||
४७ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
दुर्योधनस्य शान्त्यर्थमिति निश्चित्य भूमिपः |
४८ क
वैशम्पाय़न उवाच:
धृतराष्ट्रो महाराज प्राहिणोद्विदुराय़ वै ||
४८ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
अपृष्ट्वा विदुरं ह्यस्य नासीत्कश्चिद्विनिश्चय़ः |
४९ क
वैशम्पाय़न उवाच:
द्यूतदोषांश्च जानन्स पुत्रस्नेहादकृष्यत ||
४९ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
तच्छ्रुत्वा विदुरो धीमान्कलिद्वारमुपस्थितम् |
५० क