भीष्म उवाच:
प्राचेतसस्य वचनं कीर्तय़न्ति पुराविदः |
१ क
भीष्म उवाच:
यस्याः किञ्चिन्नाददते ज्ञातय़ो न स विक्रय़ः ||
१ ख
भीष्म उवाच:
अर्हणं तत्कुमारीणामानृशंस्यतमं च तत् |
२ क
भीष्म उवाच:
सर्वं च प्रतिदेय़ं स्यात्कन्याय़ै तदशेषतः ||
२ ख
भीष्म उवाच:
पितृभिर्भ्रातृभिश्चैव श्वशुरैरथ देवरैः |
३ क
भीष्म उवाच:
पूज्या लालय़ितव्याश्च वहुकल्याणमीप्सुभिः ||
३ ख
भीष्म उवाच:
यदि वै स्त्री न रोचेत पुमांसं न प्रमोदय़ेत् |
४ क
भीष्म उवाच:
अमोदनात्पुनः पुंसः प्रजनं न प्रवर्धते ||
४ ख
भीष्म उवाच:
पूज्या लालय़ितव्याश्च स्त्रिय़ो नित्यं जनाधिप |
५ क
भीष्म उवाच:
अपूजिताश्च यत्रैताः सर्वास्तत्राफलाः क्रिय़ाः |
५ ख
भीष्म उवाच:
तदैव तत्कुलं नास्ति यदा शोचन्ति जामय़ः ||
५ ग
भीष्म उवाच:
जामीशप्तानि गेहानि निकृत्तानीव कृत्यया |
६ क
भीष्म उवाच:
नैव भान्ति न वर्धन्ते श्रिय़ा हीनानि पार्थिव ||
६ ख
भीष्म उवाच:
स्त्रिय़ः पुंसां परिददे मनुर्जिगमिषुर्दिवम् |
७ क
भीष्म उवाच:
अवलाः स्वल्पकौपीनाः सुहृदः सत्यजिष्णवः ||
७ ख
भीष्म उवाच:
ईर्ष्यवो मानकामाश्च चण्डा असुहृदोऽवुधाः |
८ क
भीष्म उवाच:
स्त्रिय़ो माननमर्हन्ति ता मानय़त मानवाः ||
८ ख
भीष्म उवाच:
स्त्रीप्रत्ययो हि वो धर्मो रतिभोगाश्च केवलाः |
९ क
भीष्म उवाच:
परिचर्यान्नसंस्कारास्तदाय़त्ता भवन्तु वः ||
९ ख
भीष्म उवाच:
उत्पादनमपत्यस्य जातस्य परिपालनम् |
१० क
भीष्म उवाच:
प्रीत्यर्थं लोकय़ात्रा च पश्यत स्त्रीनिवन्धनम् ||
१० ख
भीष्म उवाच:
संमान्यमानाश्चैताभिः सर्वकार्याण्यवाप्स्यथ |
११ क
भीष्म उवाच:
विदेहराजदुहिता चात्र श्लोकमगाय़त ||
११ ख
भीष्म उवाच:
नास्ति यज्ञः स्त्रिय़ः कश्चिन्न श्राद्धं नोपवासकम् |
१२ क
भीष्म उवाच:
धर्मस्तु भर्तृशुश्रूषा तय़ा स्वर्गं जय़त्युत ||
१२ ख
भीष्म उवाच:
पिता रक्षति कौमारे भर्ता रक्षति यौवने |
१३ क
भीष्म उवाच:
पुत्रास्तु स्थविरीभावे न स्त्री स्वातन्त्र्यमर्हति ||
१३ ख
भीष्म उवाच:
श्रिय़ एताः स्त्रिय़ो नाम सत्कार्या भूतिमिच्छता |
१४ क
भीष्म उवाच:
लालिता निगृहीता च स्त्री श्रीर्भवति भारत ||
१४ ख