भीष्म उवाच:
साधु पश्यति वै द्रोणः कृपः साध्वनुपश्यति |
१ क
भीष्म उवाच:
कर्णस्तु क्षत्रधर्मेण यथावद्योद्धुमिच्छति ||
१ ख
भीष्म उवाच:
आचार्यो नाभिषक्तव्यः पुरुषेण विजानता |
२ क
भीष्म उवाच:
देशकालौ तु सम्प्रेक्ष्य योद्धव्यमिति मे मतिः ||
२ ख
भीष्म उवाच:
यस्य सूर्यसमाः पञ्च सपत्नाः स्युः प्रहारिणः |
३ क
भीष्म उवाच:
कथमभ्युदय़े तेषां न प्रमुह्येत पण्डितः ||
३ ख
भीष्म उवाच:
स्वार्थे सर्वे विमुह्यन्ति येऽपि धर्मविदो जनाः |
४ क
भीष्म उवाच:
तस्माद्राजन्व्रवीम्येष वाक्यं ते यदि रोचते ||
४ ख
भीष्म उवाच:
कर्णो यदभ्यवोचन्नस्तेजःसञ्जननाय़ तत् |
५ क
भीष्म उवाच:
आचार्यपुत्रः क्षमतां महत्कार्यमुपस्थितम् ||
५ ख
भीष्म उवाच:
नाय़ं कालो विरोधस्य कौन्तेय़े समुपस्थिते |
६ क
भीष्म उवाच:
क्षन्तव्यं भवता सर्वमाचार्येण कृपेण च ||
६ ख
भीष्म उवाच:
भवतां हि कृतास्त्रत्वं यथादित्ये प्रभा तथा |
७ क
भीष्म उवाच:
यथा चन्द्रमसो लक्ष्म सर्वथा नापकृष्यते |
७ ख
भीष्म उवाच:
एवं भवत्सु व्राह्मण्यं व्रह्मास्त्रं च प्रतिष्ठितम् ||
७ ग
भीष्म उवाच:
चत्वार एकतो वेदाः क्षात्रमेकत्र दृश्यते |
८ क
भीष्म उवाच:
नैतत्समस्तमुभय़ं कस्मिंश्चिदनुशुश्रुमः ||
८ ख
भीष्म उवाच:
अन्यत्र भारताचार्यात्सपुत्रादिति मे मतिः |
९ क
भीष्म उवाच:
व्रह्मास्त्रं चैव वेदाश्च नैतदन्यत्र दृश्यते ||
९ ख
भीष्म उवाच:
आचार्यपुत्रः क्षमतां नाय़ं कालः स्वभेदने |
१० क
भीष्म उवाच:
सर्वे संहत्य युध्यामः पाकशासनिमागतम् ||
१० ख
भीष्म उवाच:
वलस्य व्यसनानीह यान्युक्तानि मनीषिभिः |
११ क
भीष्म उवाच:
मुख्यो भेदो हि तेषां वै पापिष्ठो विदुषां मतः ||
११ ख
अश्वत्थामो उवाच:
आचार्य एव क्षमतां शान्तिरत्र विधीय़ताम् |
१२ क
अश्वत्थामो उवाच:
अभिषज्यमाने हि गुरौ तद्वृत्तं रोषकारितम् ||
१२ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
ततो दुर्योधनो द्रोणं क्षमय़ामास भारत |
१३ क
वैशम्पाय़न उवाच:
सह कर्णेन भीष्मेण कृपेण च महात्मना ||
१३ ख
द्रोण उवाच:
यदेव प्रथमं वाक्यं भीष्मः शान्तनवोऽव्रवीत् |
१४ क
द्रोण उवाच:
तेनैवाहं प्रसन्नो वै परमत्र विधीय़ताम् ||
१४ ख
द्रोण उवाच:
यथा दुर्योधनेऽय़त्ते नागः स्पृशति सैनिकान् |
१५ क
द्रोण उवाच:
साहसाद्यदि वा मोहात्तथा नीतिर्विधीय़ताम् ||
१५ ख
द्रोण उवाच:
वनवासे ह्यनिर्वृत्ते दर्शय़ेन्न धनञ्जय़ः |
१६ क
द्रोण उवाच:
धनं वालभमानोऽत्र नाद्य नः क्षन्तुमर्हति ||
१६ ख
द्रोण उवाच:
यथा नाय़ं समाय़ुज्याद्धार्तराष्ट्रान्कथञ्चन |
१७ क
द्रोण उवाच:
यथा च न पराजय़्यात्तथा नीतिर्विधीय़ताम् ||
१७ ख
द्रोण उवाच:
उक्तं दुर्योधनेनापि पुरस्ताद्वाक्यमीदृशम् |
१८ क
द्रोण उवाच:
तदनुस्मृत्य गाङ्गेय़ यथावद्वक्तुमर्हसि ||
१८ ख