दुर्योधन उवाच:
यन्मय़ा पाण्डवानां तु दृष्टं तच्छृणु भारत |
१ क
दुर्योधन उवाच:
आहृतं भूमिपालैर्हि वसु मुख्यं ततस्ततः ||
१ ख
दुर्योधन उवाच:
न विन्दे दृढमात्मानं दृष्ट्वाहं तदरेर्धनम् |
२ क
दुर्योधन उवाच:
फलतो भूमितो वापि प्रतिपद्यस्व भारत ||
२ ख
दुर्योधन उवाच:
ऐडांश्चैलान्वार्षदंशाञ्जातरूपपरिष्कृतान् |
३ क
दुर्योधन उवाच:
प्रावाराजिनमुख्यांश्च काम्वोजः प्रददौ वसु ||
३ ख
दुर्योधन उवाच:
अश्वांस्तित्तिरिकल्माषांस्त्रिशतं शुकनासिकान् |
४ क
दुर्योधन उवाच:
उष्ट्रवामीस्त्रिशतं च पुष्टाः पीलुशमीङ्गुदैः ||
४ ख
दुर्योधन उवाच:
गोवासना व्राह्मणाश्च दासमीय़ाश्च सर्वशः |
५ क
दुर्योधन उवाच:
प्रीत्यर्थं ते महाभागा धर्मराज्ञो महात्मनः |
५ ख
दुर्योधन उवाच:
त्रिखर्वं वलिमादाय़ द्वारि तिष्ठन्ति वारिताः ||
५ ग
दुर्योधन उवाच:
कमण्डलूनुपादाय़ जातरूपमय़ाञ्शुभान् |
६ क
दुर्योधन उवाच:
एवं वलिं प्रदाय़ाथ प्रवेशं लेभिरे ततः ||
६ ख
दुर्योधन उवाच:
शतं दासीसहस्राणां कार्पासिकनिवासिनाम् |
७ क
दुर्योधन उवाच:
श्यामास्तन्व्यो दीर्घकेश्यो हेमाभरणभूषिताः |
७ ख
दुर्योधन उवाच:
शूद्रा विप्रोत्तमार्हाणि राङ्कवान्यजिनानि च ||
७ ग
दुर्योधन उवाच:
वलिं च कृत्स्नमादाय़ भरुकच्छनिवासिनः |
८ क
दुर्योधन उवाच:
उपनिन्युर्महाराज हय़ान्गान्धारदेशजान् ||
८ ख
दुर्योधन उवाच:
इन्द्रकृष्टैर्वर्तय़न्ति धान्यैर्नदीमुखैश्च ये |
९ क
दुर्योधन उवाच:
समुद्रनिष्कुटे जाताः परिसिन्धु च मानवाः ||
९ ख
दुर्योधन उवाच:
ते वैरामाः पारदाश्च वङ्गाश्च कितवैः सह |
१० क
दुर्योधन उवाच:
विविधं वलिमादाय़ रत्नानि विविधानि च ||
१० ख
दुर्योधन उवाच:
अजाविकं गोहिरण्यं खरोष्ट्रं फलजं मधु |
११ क
दुर्योधन उवाच:
कम्वलान्विविधांश्चैव द्वारि तिष्ठन्ति वारिताः ||
११ ख
दुर्योधन उवाच:
प्राग्ज्योतिषाधिपः शूरो म्लेच्छानामधिपो वली |
१२ क
दुर्योधन उवाच:
यनवैः सहितो राजा भगदत्तो महारथः ||
१२ ख
दुर्योधन उवाच:
आजानेय़ान्हय़ाञ्शीघ्रानादाय़ानिलरंहसः |
१३ क
दुर्योधन उवाच:
वलिं च कृत्स्नमादाय़ द्वारि तिष्ठति वारितः ||
१३ ख
दुर्योधन उवाच:
अश्मसारमय़ं भाण्डं शुद्धदन्तत्सरूनसीन् |
१४ क
दुर्योधन उवाच:
प्राग्ज्योतिषोऽथ तद्दत्त्वा भगदत्तोऽव्रजत्तदा ||
१४ ख
दुर्योधन उवाच:
द्व्यक्षांस्त्र्यक्षाँल्ललाटाक्षान्नानादिग्भ्यः समागतान् |
१५ क
दुर्योधन उवाच:
औष्णीषाननिवासांश्च वाहुकान्पुरुषादकान् ||
१५ ख
दुर्योधन उवाच:
एकपादांश्च तत्राहमपश्यं द्वारि वारितान् |
१६ क
दुर्योधन उवाच:
वल्यर्थं ददतस्तस्मै हिरण्यं रजतं वहु ||
१६ ख
दुर्योधन उवाच:
इन्द्रगोपकवर्णाभाञ्शुकवर्णान्मनोजवान् |
१७ क
दुर्योधन उवाच:
तथैवेन्द्राय़ुधनिभान्सन्ध्याभ्रसदृशानपि ||
१७ ख
दुर्योधन उवाच:
अनेकवर्णानारण्यान्गृहीत्वाश्वान्मनोजवान् |
१८ क
दुर्योधन उवाच:
जातरूपमनर्घ्यं च ददुस्तस्यैकपादकाः ||
१८ ख
दुर्योधन उवाच:
चीनान्हूणाञ्शकानोड्रान्पर्वतान्तरवासिनः |
१९ क
दुर्योधन उवाच:
वार्ष्णेय़ान्हारहूणांश्च कृष्णान्हैमवतांस्तथा ||
१९ ख
दुर्योधन उवाच:
न पारय़ाम्यभिगतान्विविधान्द्वारि वारितान् |
२० क
दुर्योधन उवाच:
वल्यर्थं ददतस्तस्य नानारूपाननेकशः ||
२० ख
दुर्योधन उवाच:
कृष्णग्रीवान्महाकाय़ान्रासभाञ्शतपातिनः |
२१ क
दुर्योधन उवाच:
आहार्षुर्दशसाहस्रान्विनीतान्दिक्षु विश्रुतान् ||
२१ ख
दुर्योधन उवाच:
प्रमाणरागस्पर्शाढ्यं वाह्लीचीनसमुद्भवम् |
२२ क
दुर्योधन उवाच:
और्णं च राङ्कवं चैव कीटजं पट्टजं तथा ||
२२ ख
दुर्योधन उवाच:
कुट्टीकृतं तथैवान्यत्कमलाभं सहस्रशः |
२३ क
दुर्योधन उवाच:
श्लक्ष्णं वस्त्रमकार्पासमाविकं मृदु चाजिनम् ||
२३ ख
दुर्योधन उवाच:
निशितांश्चैव दीर्घासीनृष्टिशक्तिपरश्वधान् |
२४ क
दुर्योधन उवाच:
अपरान्तसमुद्भूतांस्तथैव परशूञ्शितान् ||
२४ ख
दुर्योधन उवाच:
रसान्गन्धांश्च विविधान्रत्नानि च सहस्रशः |
२५ क
दुर्योधन उवाच:
वलिं च कृत्स्नमादाय़ द्वारि तिष्ठन्ति वारिताः ||
२५ ख
दुर्योधन उवाच:
शकास्तुखाराः कङ्काश्च रोमशाः शृङ्गिणो नराः |
२६ क
दुर्योधन उवाच:
महागमान्दूरगमान्गणितानर्वुदं हय़ान् ||
२६ ख
दुर्योधन उवाच:
कोटिशश्चैव वहुशः सुवर्णं पद्मसंमितम् |
२७ क
दुर्योधन उवाच:
वलिमादाय़ विविधं द्वारि तिष्ठन्ति वारिताः ||
२७ ख
दुर्योधन उवाच:
आसनानि महार्हाणि यानानि शय़नानि च |
२८ क
दुर्योधन उवाच:
मणिकाञ्चनचित्राणि गजदन्तमय़ानि च ||
२८ ख
दुर्योधन उवाच:
रथांश्च विविधाकाराञ्जातरूपपरिष्कृतान् |
२९ क
दुर्योधन उवाच:
हय़ैर्विनीतैः सम्पन्नान्वैय़ाघ्रपरिवारणान् ||
२९ ख
दुर्योधन उवाच:
विचित्रांश्च परिस्तोमान्रत्नानि च सहस्रशः |
३० क
दुर्योधन उवाच:
नाराचानर्धनाराचाञ्शस्त्राणि विविधानि च ||
३० ख
दुर्योधन उवाच:
एतद्दत्त्वा महद्द्रव्यं पूर्वदेशाधिपो नृपः |
३१ क
दुर्योधन उवाच:
प्रविष्टो यज्ञसदनं पाण्डवस्य महात्मनः ||
३१ ख