chevron_left सभा पर्व अध्याय ४८
दुर्योधन उवाच:
दाय़ं तु तस्मै विविधं शृणु मे गदतोऽनघ |
१ क
दुर्योधन उवाच:
यज्ञार्थं राजभिर्दत्तं महान्तं धनसञ्चय़म् ||
१ ख
दुर्योधन उवाच:
मेरुमन्दरय़ोर्मध्ये शैलोदामभितो नदीम् |
२ क
दुर्योधन उवाच:
ये ते कीचकवेणूनां छाय़ां रम्यामुपासते ||
२ ख
दुर्योधन उवाच:
खशा एकाशनाज्योहाः प्रदरा दीर्घवेणवः |
३ क
दुर्योधन उवाच:
पशुपाश्च कुणिन्दाश्च तङ्गणाः परतङ्गणाः ||
३ ख
दुर्योधन उवाच:
ते वै पिपीलिकं नाम वरदत्तं पिपीलिकैः |
४ क
दुर्योधन उवाच:
जातरूपं द्रोणमेय़महार्षुः पुञ्जशो नृपाः ||
४ ख
दुर्योधन उवाच:
कृष्णाँल्ललामांश्चमराञ्शुक्लांश्चान्याञ्शशिप्रभान् |
५ क
दुर्योधन उवाच:
हिमवत्पुष्पजं चैव स्वादु क्षौद्रं तथा वहु ||
५ ख
दुर्योधन उवाच:
उत्तरेभ्यः कुरुभ्यश्चाप्यपोढं माल्यमम्वुभिः |
६ क
दुर्योधन उवाच:
उत्तरादपि कैलासादोषधीः सुमहावलाः ||
६ ख
दुर्योधन उवाच:
पार्वतीय़ा वलिं चान्यमाहृत्य प्रणताः स्थिताः |
७ क
दुर्योधन उवाच:
अजातशत्रोर्नृपतेर्द्वारि तिष्ठन्ति वारिताः ||
७ ख
दुर्योधन उवाच:
ये परार्धे हिमवतः सूर्योदय़गिरौ नृपाः |
८ क
दुर्योधन उवाच:
वारिषेणसमुद्रान्ते लोहित्यमभितश्च ये |
८ ख
दुर्योधन उवाच:
फलमूलाशना ये च किराताश्चर्मवाससः ||
८ ग
दुर्योधन उवाच:
चन्दनागुरुकाष्ठानां भारान्कालीय़कस्य च |
९ क
दुर्योधन उवाच:
चर्मरत्नसुवर्णानां गन्धानां चैव राशय़ः ||
९ ख
दुर्योधन उवाच:
कैरातिकानामय़ुतं दासीनां च विशां पते |
१० क
दुर्योधन उवाच:
आहृत्य रमणीय़ार्थान्दूरजान्मृगपक्षिणः ||
१० ख
दुर्योधन उवाच:
निचितं पर्वतेभ्यश्च हिरण्यं भूरिवर्चसम् |
११ क
दुर्योधन उवाच:
वलिं च कृत्स्नमादाय़ द्वारि तिष्ठन्ति वारिताः ||
११ ख
दुर्योधन उवाच:
काय़व्या दरदा दार्वाः शूरा वैय़मकास्तथा |
१२ क
दुर्योधन उवाच:
औदुम्वरा दुर्विभागाः पारदा वाह्लिकैः सह ||
१२ ख
दुर्योधन उवाच:
काश्मीराः कुन्दमानाश्च पौरका हंसकाय़नाः |
१३ क
दुर्योधन उवाच:
शिवित्रिगर्तय़ौधेय़ा राजन्या मद्रकेकय़ाः ||
१३ ख
दुर्योधन उवाच:
अम्वष्ठाः कौकुरास्तार्क्ष्या वस्त्रपाः पह्लवैः सह |
१४ क
दुर्योधन उवाच:
वसातय़ः समौलेय़ाः सह क्षुद्रकमालवैः ||
१४ ख
दुर्योधन उवाच:
शौण्डिकाः कुक्कुराश्चैव शकाश्चैव विशां पते |
१५ क
दुर्योधन उवाच:
अङ्गा वङ्गाश्च पुण्ड्राश्च शानवत्या गय़ास्तथा ||
१५ ख
दुर्योधन उवाच:
सुजातय़ः श्रेणिमन्तः श्रेय़ांसः शस्त्रपाणय़ः |
१६ क
दुर्योधन उवाच:
आहार्षुः क्षत्रिय़ा वित्तं शतशोऽजातशत्रवे ||
१६ ख
दुर्योधन उवाच:
वङ्गाः कलिङ्गपतय़स्ताम्रलिप्ताः सपुण्ड्रकाः |
१७ क
दुर्योधन उवाच:
दुकूलं कौशिकं चैव पत्रोर्णं प्रावरानपि ||
१७ ख
दुर्योधन उवाच:
तत्र स्म द्वारपालैस्ते प्रोच्यन्ते राजशासनात् |
१८ क
दुर्योधन उवाच:
कृतकाराः सुवलय़स्ततो द्वारमवाप्स्यथ ||
१८ ख
दुर्योधन उवाच:
ईषादन्तान्हेमकक्षान्पद्मवर्णान्कुथावृतान् |
१९ क
दुर्योधन उवाच:
शैलाभान्नित्यमत्तांश्च अभितः काम्यकं सरः ||
१९ ख
दुर्योधन उवाच:
दत्त्वैकैको दशशतान्कुञ्जरान्कवचावृतान् |
२० क
दुर्योधन उवाच:
क्षमावतः कुलीनांश्च द्वारेण प्राविशंस्ततः ||
२० ख
दुर्योधन उवाच:
एते चान्ये च वहवो गणा दिग्भ्यः समागताः |
२१ क
दुर्योधन उवाच:
अन्यैश्चोपाहृतान्यत्र रत्नानीह महात्मभिः ||
२१ ख
दुर्योधन उवाच:
राजा चित्ररथो नाम गन्धर्वो वासवानुगः |
२२ क
दुर्योधन उवाच:
शतानि चत्वार्यददद्धय़ानां वातरंहसाम् ||
२२ ख
दुर्योधन उवाच:
तुम्वुरुस्तु प्रमुदितो गन्धर्वो वाजिनां शतम् |
२३ क
दुर्योधन उवाच:
आम्रपत्रसवर्णानामददद्धेममालिनाम् ||
२३ ख
दुर्योधन उवाच:
कृती तु राजा कौरव्य शूकराणां विशां पते |
२४ क
दुर्योधन उवाच:
अददद्गजरत्नानां शतानि सुवहून्यपि ||
२४ ख
दुर्योधन उवाच:
विराटेन तु मत्स्येन वल्यर्थं हेममालिनाम् |
२५ क
दुर्योधन उवाच:
कुञ्जराणां सहस्रे द्वे मत्तानां समुपाहृते ||
२५ ख
दुर्योधन उवाच:
पांशुराष्ट्राद्वसुदानो राजा षड्विंशतिं गजान् |
२६ क
दुर्योधन उवाच:
अश्वानां च सहस्रे द्वे राजन्काञ्चनमालिनाम् ||
२६ ख
दुर्योधन उवाच:
जवसत्त्वोपपन्नानां वय़ःस्थानां नराधिप |
२७ क
दुर्योधन उवाच:
वलिं च कृत्स्नमादाय़ पाण्डवेभ्यो न्यवेदय़त् ||
२७ ख
दुर्योधन उवाच:
यज्ञसेनेन दासीनां सहस्राणि चतुर्दश |
२८ क
दुर्योधन उवाच:
दासानामय़ुतं चैव सदाराणां विशां पते ||
२८ ख
दुर्योधन उवाच:
गजय़ुक्ता महाराज रथाः षड्विंशतिस्तथा |
२९ क
दुर्योधन उवाच:
राज्यं च कृत्स्नं पार्थेभ्यो यज्ञार्थं वै निवेदितम् ||
२९ ख
दुर्योधन उवाच:
समुद्रसारं वैडूर्यं मुक्ताः शङ्खांस्तथैव च |
३० क
दुर्योधन उवाच:
शतशश्च कुथांस्तत्र सिंहलाः समुपाहरन् ||
३० ख
दुर्योधन उवाच:
संवृता मणिचीरैस्तु श्यामास्ताम्रान्तलोचनाः |
३१ क
दुर्योधन उवाच:
तान्गृहीत्वा नरास्तत्र द्वारि तिष्ठन्ति वारिताः ||
३१ ख
दुर्योधन उवाच:
प्रीत्यर्थं व्राह्मणाश्चैव क्षत्रिय़ाश्च विनिर्जिताः |
३२ क
दुर्योधन उवाच:
उपाजह्रुर्विशश्चैव शूद्राः शुश्रूषवोऽपि च |
३२ ख
दुर्योधन उवाच:
प्रीत्या च वहुमानाच्च अभ्यगच्छन्युधिष्ठिरम् ||
३२ ग
दुर्योधन उवाच:
सर्वे म्लेच्छाः सर्ववर्णा आदिमध्यान्तजास्तथा |
३३ क
दुर्योधन उवाच:
नानादेशसमुत्थैश्च नानाजातिभिरागतैः |
३३ ख
दुर्योधन उवाच:
पर्यस्त इव लोकोऽय़ं युधिष्ठिरनिवेशने ||
३३ ग
दुर्योधन उवाच:
उच्चावचानुपग्राहान्राजभिः प्रहितान्वहून् |
३४ क
दुर्योधन उवाच:
शत्रूणां पश्यतो दुःखान्मुमूर्षा मेऽद्य जाय़ते ||
३४ ख
दुर्योधन उवाच:
भृत्यास्तु ये पाण्डवानां तांस्ते वक्ष्यामि भारत |
३५ क
दुर्योधन उवाच:
येषामामं च पक्वं च संविधत्ते युधिष्ठिरः ||
३५ ख
दुर्योधन उवाच:
अय़ुतं त्रीणि पद्मानि गजारोहाः ससादिनः |
३६ क
दुर्योधन उवाच:
रथानामर्वुदं चापि पादाता वहवस्तथा ||
३६ ख
दुर्योधन उवाच:
प्रमीय़माणमारव्धं पच्यमानं तथैव च |
३७ क
दुर्योधन उवाच:
विसृज्यमानं चान्यत्र पुण्याहस्वन एव च ||
३७ ख
दुर्योधन उवाच:
नाभुक्तवन्तं नाहृष्टं नासुभिक्षं कथञ्चन |
३८ क
दुर्योधन उवाच:
अपश्यं सर्ववर्णानां युधिष्ठिरनिवेशने ||
३८ ख
दुर्योधन उवाच:
अष्टाशीतिसहस्राणि स्नातका गृहमेधिनः |
३९ क
दुर्योधन उवाच:
त्रिंशद्दासीक एकैको यान्विभर्ति युधिष्ठिरः |
३९ ख
दुर्योधन उवाच:
सुप्रीताः परितुष्टाश्च तेऽप्याशंसन्त्यरिक्षय़म् ||
३९ ग
दुर्योधन उवाच:
दशान्यानि सहस्राणि यतीनामूर्ध्वरेतसाम् |
४० क
दुर्योधन उवाच:
भुञ्जते रुक्मपात्रीषु युधिष्ठिरनिवेशने ||
४० ख
दुर्योधन उवाच:
भुक्ताभुक्तं कृताकृतं सर्वमाकुव्जवामनम् |
४१ क
दुर्योधन उवाच:
अभुञ्जाना याज्ञसेनी प्रत्यवैक्षद्विशां पते ||
४१ ख
दुर्योधन उवाच:
द्वौ करं न प्रय़च्छेतां कुन्तीपुत्राय़ भारत |
४२ क
दुर्योधन उवाच:
वैवाहिकेन पाञ्चालाः सख्येनान्धकवृष्णय़ः ||
४२ ख