chevron_left स्वर्गारोहण पर्व अध्याय ५
सूत उवाच:
ऊर्ध्ववाहुर्विरौम्येष न च कश्चिच्छृणोति मे |
४९ क
सूत उवाच:
धर्मादर्थश्च कामश्च स किमर्थं न सेव्यते ||
४९ ख
सूत उवाच:
न जातु कामान्न भय़ान्न लोभा; द्धर्मं त्यजेज्जीवितस्यापि हेतोः |
५० क
सूत उवाच:
नित्यो धर्मः सुखदुःखे त्वनित्ये; जीवो नित्यो हेतुरस्य त्वनित्यः ||
५० ख
सूत उवाच:
इमां भारतसावित्रीं प्रातरुत्थाय़ यः पठेत् |
५१ क
सूत उवाच:
स भारतफलं प्राप्य परं व्रह्माधिगच्छति ||
५१ ख
सूत उवाच:
यथा समुद्रो भगवान्यथा च हिमवान्गिरिः |
५२ क
सूत उवाच:
ख्यातावुभौ रत्ननिधी तथा भारतमुच्यते ||
५२ ख
सूत उवाच:
महाभारतमाख्यानं यः पठेत्सुसमाहितः |
५३ क
सूत उवाच:
स गच्छेत्परमां सिद्धिमिति मे नास्ति संशय़ः ||
५३ ख
सूत उवाच:
द्वैपाय़नोष्ठपुटनिःसृतमप्रमेय़ं; पुण्यं पवित्रमथ पापहरं शिवं च |
५४ क
सूत उवाच:
यो भारतं समधिगच्छति वाच्यमानं; किं तस्य पुष्करजलैरभिषेचनेन ||
५४ ख