chevron_left कर्ण पर्व अध्याय ५
धृतराष्ट्र उवाच:
पानीय़ं याचितः पार्थः सोऽविध्यन्मेदिनीतलम् ||
४९ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
जलस्य धारां विहितां दृष्ट्वा तां पाण्डवेन ह |
५० क
धृतराष्ट्र उवाच:
अव्रवीत्स महावाहुस्तात संशाम्य पाण्डवैः ||
५० ख
धृतराष्ट्र उवाच:
प्रशमाद्धि भवेच्छान्तिर्मदन्तं युद्धमस्तु च |
५१ क
धृतराष्ट्र उवाच:
भ्रातृभावेन पृथिवीं भुङ्क्ष्व पाण्डुसुतैः सह ||
५१ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
अकुर्वन्वचनं तस्य नूनं शोचति मे सुतः |
५२ क
धृतराष्ट्र उवाच:
तदिदं समनुप्राप्तं वचनं दीर्घदर्शिनः ||
५२ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
अहं तु निहतामात्यो हतपुत्रश्च सञ्जय़ |
५३ क
धृतराष्ट्र उवाच:
द्यूततः कृच्छ्रमापन्नो लूनपक्ष इव द्विजः ||
५३ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
यथा हि शकुनिं गृह्य छित्त्वा पक्षौ च सञ्जय़ |
५४ क
धृतराष्ट्र उवाच:
विसर्जय़न्ति संहृष्टाः क्रीडमानाः कुमारकाः ||
५४ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
छिन्नपक्षतय़ा तस्य गमनं नोपपद्यते |
५५ क
धृतराष्ट्र उवाच:
तथाहमपि सम्प्राप्तो लूनपक्ष इव द्विजः ||
५५ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
क्षीणः सर्वार्थहीनश्च निर्वन्धुर्ज्ञातिवर्जितः |
५६ क
धृतराष्ट्र उवाच:
कां दिशं प्रतिपत्स्यामि दीनः शत्रुवशं गतः ||
५६ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
दुर्योधनस्य वृद्ध्यर्थं पृथिवीं योऽजय़त्प्रभुः |
५७ क
धृतराष्ट्र उवाच:
स जितः पाण्डवैः शूरैः समर्थैर्वीर्यशालिभिः ||
५७ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
तस्मिन्हते महेष्वासे कर्णे युधि किरीटिना |
५८ क
धृतराष्ट्र उवाच:
के वीराः पर्यवर्तन्त तन्ममाचक्ष्व सञ्जय़ ||
५८ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
कच्चिन्नैकः परित्यक्तः पाण्डवैर्निहतो रणे |
५९ क
धृतराष्ट्र उवाच:
उक्तं त्वय़ा पुरा वीर यथा वीरा निपातिताः ||
५९ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
भीष्ममप्रतिय़ुध्यन्तं शिखण्डी साय़कोत्तमैः |
६० क
धृतराष्ट्र उवाच:
पातय़ामास समरे सर्वशस्त्रभृतां वरम् ||
६० ख
धृतराष्ट्र उवाच:
तथा द्रौपदिना द्रोणो न्यस्तसर्वाय़ुधो युधि |
६१ क
धृतराष्ट्र उवाच:
युक्तय़ोगो महेष्वासः शरैर्वहुभिराचितः |
६१ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
निहतः खड्गमुद्यम्य धृष्टद्युम्नेन सञ्जय़ ||
६१ ग
धृतराष्ट्र उवाच:
अन्तरेण हतावेतौ छलेन च विशेषतः |
६२ क
धृतराष्ट्र उवाच:
अश्रौषमहमेतद्वै भीष्मद्रोणौ निपातितौ ||
६२ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
भीष्मद्रोणौ हि समरे न हन्याद्वज्रभृत्स्वय़म् |
६३ क
धृतराष्ट्र उवाच:
न्याय़ेन युध्यमानौ हि तद्वै सत्यं व्रवीमि ते ||
६३ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
कर्णं त्वस्यन्तमस्त्राणि दिव्यानि च वहूनि च |
६४ क
धृतराष्ट्र उवाच:
कथमिन्द्रोपमं वीरं मृत्युर्युद्धे समस्पृशत् ||
६४ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
यस्य विद्युत्प्रभां शक्तिं दिव्यां कनकभूषणाम् |
६५ क
धृतराष्ट्र उवाच:
प्राय़च्छद्द्विषतां हन्त्रीं कुण्डलाभ्यां पुरन्दरः ||
६५ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
यस्य सर्पमुखो दिव्यः शरः कनकभूषणः |
६६ क
धृतराष्ट्र उवाच:
अशेत निहतः पत्री चन्दनेष्वरिसूदनः ||
६६ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
भीष्मद्रोणमुखान्वीरान्योऽवमन्य महारथान् |
६७ क
धृतराष्ट्र उवाच:
जामदग्न्यान्महाघोरं व्राह्ममस्त्रमशिक्षत ||
६७ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
यश्च द्रोणमुखान्दृष्ट्वा विमुखानर्दिताञ्शरैः |
६८ क
धृतराष्ट्र उवाच:
सौभद्रस्य महावाहुर्व्यधमत्कार्मुकं शरैः ||
६८ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
यश्च नागाय़ुतप्राणं वातरंहसमच्युतम् |
६९ क
धृतराष्ट्र उवाच:
विरथं भ्रातरं कृत्वा भीमसेनमुपाहसत् ||
६९ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
सहदेवं च निर्जित्य शरैः संनतपर्वभिः |
७० क
धृतराष्ट्र उवाच:
कृपय़ा विरथं कृत्वा नाहनद्धर्मवित्तय़ा ||
७० ख
धृतराष्ट्र उवाच:
यश्च माय़ासहस्राणि ध्वंसय़ित्वा रणोत्कटम् |
७१ क
धृतराष्ट्र उवाच:
घटोत्कचं राक्षसेन्द्रं शक्रशक्त्याभिजघ्निवान् ||
७१ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
एतानि दिवसान्यस्य युद्धे भीतो धनञ्जय़ः |
७२ क
धृतराष्ट्र उवाच:
नागमद्द्वैरथं वीरः स कथं निहतो रणे ||
७२ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
रथसङ्गो न चेत्तस्य धनुर्वा न व्यशीर्यत |
७३ क
धृतराष्ट्र उवाच:
न चेदस्त्राणि निर्णेशुः स कथं निहतः परैः ||
७३ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
को हि शक्तो रणे कर्णं विधुन्वानं महद्धनुः |
७४ क
धृतराष्ट्र उवाच:
विमुञ्चन्तं शरान्घोरान्दिव्यान्यस्त्राणि चाहवे |
७४ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
जेतुं पुरुषशार्दूलं शार्दूलमिव वेगितम् ||
७४ ग
धृतराष्ट्र उवाच:
ध्रुवं तस्य धनुश्छिन्नं रथो वापि गतो महीम् |
७५ क
धृतराष्ट्र उवाच:
अस्त्राणि वा प्रनष्टानि यथा शंससि मे हतम् |
७५ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
न ह्यन्यदनुपश्यामि कारणं तस्य नाशने ||
७५ ग
धृतराष्ट्र उवाच:
न हन्यामर्जुनं यावत्तावत्पादौ न धावय़े |
७६ क
धृतराष्ट्र उवाच:
इति यस्य महाघोरं व्रतमासीन्महात्मनः ||
७६ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
यस्य भीतो वने नित्यं धर्मराजो युधिष्ठिरः |
७७ क
धृतराष्ट्र उवाच:
त्रय़ोदश समा निद्रां न लेभे पुरुषर्षभः ||
७७ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
यस्य वीर्यवतो वीर्यं समाश्रित्य महात्मनः |
७८ क
धृतराष्ट्र उवाच:
मम पुत्रः सभां भार्यां पाण्डूनां नीतवान्वलात् ||
७८ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
तत्र चापि सभामध्ये पाण्डवानां च पश्यताम् |
७९ क
धृतराष्ट्र उवाच:
दासभार्येति पाञ्चालीमव्रवीत्कुरुसंसदि ||
७९ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
यश्च गाण्डीवमुक्तानां स्पर्शमुग्रमचिन्तय़न् |
८० क
धृतराष्ट्र उवाच:
अपतिर्ह्यसि कृष्णेति व्रुवन्पार्थानवैक्षत ||
८० ख
धृतराष्ट्र उवाच:
यस्य नासीद्भय़ं पार्थैः सपुत्रैः सजनार्दनैः |
८१ क
धृतराष्ट्र उवाच:
स्ववाहुवलमाश्रित्य मुहूर्तमपि सञ्जय़ ||
८१ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
तस्य नाहं वधं मन्ये देवैरपि सवासवैः |
८२ क
धृतराष्ट्र उवाच:
प्रतीपमुपधावद्भिः किं पुनस्तात पाण्डवैः ||
८२ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
न हि ज्यां स्पृशमानस्य तलत्रे चापि गृह्णतः |
८३ क
धृतराष्ट्र उवाच:
पुमानाधिरथेः कश्चित्प्रमुखे स्थातुमर्हति ||
८३ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
अपि स्यान्मेदिनी हीना सोमसूर्यप्रभांशुभिः |
८४ क
धृतराष्ट्र उवाच:
न वधः पुरुषेन्द्रस्य समरेष्वपलाय़िनः ||
८४ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
यदि मन्दः सहाय़ेन भ्रात्रा दुःशासनेन च |
८५ क
धृतराष्ट्र उवाच:
वासुदेवस्य दुर्वुद्धिः प्रत्याख्यानमरोचय़त् ||
८५ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
स नूनमृषभस्कन्धं दृष्ट्वा कर्णं निपातितम् |
८६ क
धृतराष्ट्र उवाच:
दुःशासनं च निहतं मन्ये शोचति पुत्रकः ||
८६ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
हतं वैकर्तनं श्रुत्वा द्वैरथे सव्यसाचिना |
८७ क
धृतराष्ट्र उवाच:
जय़तः पाण्डवान्दृष्ट्वा किं स्विद्दुर्योधनोऽव्रवीत् ||
८७ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
दुर्मर्षणं हतं श्रुत्वा वृषसेनं च संय़ुगे |
८८ क
धृतराष्ट्र उवाच:
प्रभग्नं च वलं दृष्ट्वा वध्यमानं महारथैः ||
८८ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
पराङ्मुखांस्तथा राज्ञः पलाय़नपराय़णान् |
८९ क
धृतराष्ट्र उवाच:
विद्रुतान्रथिनो दृष्ट्वा मन्ये शोचति पुत्रकः ||
८९ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
अनेय़श्चाभिमानेन वालवुद्धिरमर्षणः |
९० क
धृतराष्ट्र उवाच:
हतोत्साहं वलं दृष्ट्वा किं स्विद्दुर्योधनोऽव्रवीत् ||
९० ख
धृतराष्ट्र उवाच:
भ्रातरं निहतं दृष्ट्वा भीमसेनेन संय़ुगे |
९१ क
धृतराष्ट्र उवाच:
रुधिरं पीय़मानेन किं स्विद्दुर्योधनोऽव्रवीत् ||
९१ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
सह गान्धारराजेन सभाय़ां यदभाषत |
९२ क
धृतराष्ट्र उवाच:
कर्णोऽर्जुनं रणे हन्ता हते तस्मिन्किमव्रवीत् ||
९२ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
द्यूतं कृत्वा पुरा हृष्टो वञ्चय़ित्वा च पाण्डवान् |
९३ क
धृतराष्ट्र उवाच:
शकुनिः सौवलस्तात हते कर्णे किमव्रवीत् ||
९३ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
कृतवर्मा महेष्वासः सात्वतानां महारथः |
९४ क
धृतराष्ट्र उवाच:
कर्णं विनिहतं दृष्ट्वा हार्दिक्यः किमभाषत ||
९४ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
व्राह्मणाः क्षत्रिय़ा वैश्या यस्य शिक्षामुपासते |
९५ क
धृतराष्ट्र उवाच:
धनुर्वेदं चिकीर्षन्तो द्रोणपुत्रस्य धीमतः ||
९५ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
युवा रूपेण सम्पन्नो दर्शनीय़ो महाय़शाः |
९६ क
धृतराष्ट्र उवाच:
अश्वत्थामा हते कर्णे किमभाषत सञ्जय़ ||
९६ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
आचार्यत्वं धनुर्वेदे गतः परमतत्त्ववित् |
९७ क
धृतराष्ट्र उवाच:
कृपः शारद्वतस्तात हते कर्णे किमव्रवीत् ||
९७ ख