chevron_left कर्ण पर्व अध्याय ५
धृतराष्ट्र उवाच:
मद्रराजो महेष्वासः शल्यः समितिशोभनः |
९८ क
धृतराष्ट्र उवाच:
दिष्टं तेन हि तत्सर्वं यथा कर्णो निपातितः ||
९८ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
ये च केचन राजानः पृथिव्यां योद्धुमागताः |
९९ क
धृतराष्ट्र उवाच:
वैकर्तनं हतं दृष्ट्वा किमभाषन्त सञ्जय़ ||
९९ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
कर्णे तु निहते वीरे रथव्याघ्रे नरर्षभे |
१०० क
धृतराष्ट्र उवाच:
किं वो मुखमनीकानामासीत्सञ्जय़ भागशः ||
१०० ख
धृतराष्ट्र उवाच:
मद्रराजः कथं शल्यो निय़ुक्तो रथिनां वरः |
१०१ क
धृतराष्ट्र उवाच:
वैकर्तनस्य सारथ्ये तन्ममाचक्ष्व सञ्जय़ ||
१०१ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
केऽरक्षन्दक्षिणं चक्रं सूतपुत्रस्य संय़ुगे |
१०२ क
धृतराष्ट्र उवाच:
वामं चक्रं ररक्षुर्वा के वा वीरस्य पृष्ठतः ||
१०२ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
के कर्णं वाजहुः शूराः के क्षुद्राः प्राद्रवन्भय़ात् |
१०३ क
धृतराष्ट्र उवाच:
कथं च वः समेतानां हतः कर्णो महारथः ||
१०३ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
पाण्डवाश्च कथं शूराः प्रत्युदीय़ुर्महारथम् |
१०४ क
धृतराष्ट्र उवाच:
सृजन्तं शरवर्षाणि वारिधारा इवाम्वुदम् ||
१०४ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
स च सर्पमुखो दिव्यो महेषुप्रवरस्तदा |
१०५ क
धृतराष्ट्र उवाच:
व्यर्थः कथं समभवत्तन्ममाचक्ष्व सञ्जय़ ||
१०५ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
मामकस्यास्य सैन्यस्य हृतोत्सेधस्य सञ्जय़ |
१०६ क
धृतराष्ट्र उवाच:
अवशेषं न पश्यामि ककुदे मृदिते सति ||
१०६ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
तौ हि वीरौ महेष्वासौ मदर्थे कुरुसत्तमौ |
१०७ क
धृतराष्ट्र उवाच:
भीष्मद्रोणौ हतौ श्रुत्वा को न्वर्थो जीवितेन मे ||
१०७ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
न मृष्यामि च राधेय़ं हतमाहवशोभिनम् |
१०८ क
धृतराष्ट्र उवाच:
यस्य वाह्वोर्वलं तुल्यं कुञ्जराणां शतं शतम् ||
१०८ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
द्रोणे हते च यद्वृत्तं कौरवाणां परैः सह |
१०९ क
धृतराष्ट्र उवाच:
सङ्ग्रामे नरवीराणां तन्ममाचक्ष्व सञ्जय़ ||
१०९ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
यथा च कर्णः कौन्तेय़ैः सह युद्धमय़ोजय़त् |
११० क
धृतराष्ट्र उवाच:
यथा च द्विषतां हन्ता रणे शान्तस्तदुच्यताम् ||
११० ख