chevron_left आदि पर्व अध्याय ५
शौनक उवाच:
पुराणमखिलं तात पिता तेऽधीतवान्पुरा |
१ क
शौनक उवाच:
कच्चित्त्वमपि तत्सर्वमधीषे लोमहर्षणे ||
१ ख
शौनक उवाच:
पुराणे हि कथा दिव्या आदिवंशाश्च धीमताम् |
२ क
शौनक उवाच:
कथ्यन्ते ताः पुरास्माभिः श्रुताः पूर्वं पितुस्तव ||
२ ख
शौनक उवाच:
तत्र वंशमहं पूर्वं श्रोतुमिच्छामि भार्गवम् |
३ क
शौनक उवाच:
कथय़स्व कथामेतां कल्याः स्म श्रवणे तव ||
३ ख
सूत उवाच:
यदधीतं पुरा सम्यग्द्विजश्रेष्ठ महात्मभिः |
४ क
सूत उवाच:
वैशम्पाय़नविप्राद्यैस्तैश्चापि कथितं पुरा ||
४ ख
सूत उवाच:
यदधीतं च पित्रा मे सम्यक्चैव ततो मय़ा |
५ क
सूत उवाच:
तत्तावच्छृणु यो देवैः सेन्द्रैः साग्निमरुद्गणैः |
५ ख
सूत उवाच:
पूजितः प्रवरो वंशो भृगूणां भृगुनन्दन ||
५ ग
सूत उवाच:
इमं वंशमहं व्रह्मन्भार्गवं ते महामुने |
६ क
सूत उवाच:
निगदामि कथाय़ुक्तं पुराणाश्रय़संय़ुतम् ||
६ ख
सूत उवाच:
भृगोः सुदय़ितः पुत्रश्च्यवनो नाम भार्गवः |
७ क
सूत उवाच:
च्यवनस्यापि दाय़ादः प्रमतिर्नाम धार्मिकः |
७ ख
सूत उवाच:
प्रमतेरप्यभूत्पुत्रो घृताच्यां रुरुरित्युत ||
७ ग
सूत उवाच:
रुरोरपि सुतो जज्ञे शुनको वेदपारगः |
८ क
सूत उवाच:
प्रमद्वराय़ां धर्मात्मा तव पूर्वपितामहात् ||
८ ख
सूत उवाच:
तपस्वी च यशस्वी च श्रुतवान्व्रह्मवित्तमः |
९ क
सूत उवाच:
धर्मिष्ठः सत्यवादी च निय़तो निय़तेन्द्रिय़ः ||
९ ख
शौनक उवाच:
सूतपुत्र यथा तस्य भार्गवस्य महात्मनः |
१० क
शौनक उवाच:
च्यवनत्वं परिख्यातं तन्ममाचक्ष्व पृच्छतः ||
१० ख
सूत उवाच:
भृगोः सुदय़िता भार्या पुलोमेत्यभिविश्रुता |
११ क
सूत उवाच:
तस्यां गर्भः समभवद्भृगोर्वीर्यसमुद्भवः ||
११ ख
सूत उवाच:
तस्मिन्गर्भे सम्भृतेऽथ पुलोमाय़ां भृगूद्वह |
१२ क
सूत उवाच:
समय़े समशीलिन्यां धर्मपत्न्यां यशस्विनः ||
१२ ख
सूत उवाच:
अभिषेकाय़ निष्क्रान्ते भृगौ धर्मभृतां वरे |
१३ क
सूत उवाच:
आश्रमं तस्य रक्षोऽथ पुलोमाभ्याजगाम ह ||
१३ ख
सूत उवाच:
तं प्रविश्याश्रमं दृष्ट्वा भृगोर्भार्यामनिन्दिताम् |
१४ क
सूत उवाच:
हृच्छय़ेन समाविष्टो विचेताः समपद्यत ||
१४ ख
सूत उवाच:
अभ्यागतं तु तद्रक्षः पुलोमा चारुदर्शना |
१५ क
सूत उवाच:
न्यमन्त्रय़त वन्येन फलमूलादिना तदा ||
१५ ख
सूत उवाच:
तां तु रक्षस्ततो व्रह्मन्हृच्छय़ेनाभिपीडितम् |
१६ क
सूत उवाच:
दृष्ट्वा हृष्टमभूत्तत्र जिहीर्षुस्तामनिन्दिताम् ||
१६ ख
सूत उवाच:
अथाग्निशरणेऽपश्यज्ज्वलितं जातवेदसम् |
१७ क
सूत उवाच:
तमपृच्छत्ततो रक्षः पावकं ज्वलितं तदा ||
१७ ख
सूत उवाच:
शंस मे कस्य भार्येय़मग्ने पृष्ट ऋतेन वै |
१८ क
सूत उवाच:
सत्यस्त्वमसि सत्यं मे वद पावक पृच्छते ||
१८ ख
सूत उवाच:
मय़ा हीय़ं पूर्ववृता भार्यार्थे वरवर्णिनी |
१९ क
सूत उवाच:
पश्चात्त्विमां पिता प्रादाद्भृगवेऽनृतकारिणे ||
१९ ख
सूत उवाच:
सेय़ं यदि वरारोहा भृगोर्भार्या रहोगता |
२० क
सूत उवाच:
तथा सत्यं समाख्याहि जिहीर्षाम्याश्रमादिमाम् ||
२० ख
सूत उवाच:
मन्युर्हि हृदय़ं मेऽद्य प्रदहन्निव तिष्ठति |
२१ क
सूत उवाच:
मत्पुर्वभार्यां यदिमां भृगुः प्राप सुमध्यमाम् ||
२१ ख
सूत उवाच:
तद्रक्ष एवमामन्त्र्य ज्वलितं जातवेदसम् |
२२ क
सूत उवाच:
शङ्कमानो भृगोर्भार्यां पुनः पुनरपृच्छत ||
२२ ख
सूत उवाच:
त्वमग्ने सर्वभूतानामन्तश्चरसि नित्यदा |
२३ क
सूत उवाच:
साक्षिवत्पुण्यपापेषु सत्यं व्रूहि कवे वचः ||
२३ ख
सूत उवाच:
मत्पूर्वभार्यापहृता भृगुणानृतकारिणा |
२४ क
सूत उवाच:
सेय़ं यदि तथा मे त्वं सत्यमाख्यातुमर्हसि ||
२४ ख
सूत उवाच:
श्रुत्वा त्वत्तो भृगोर्भार्यां हरिष्याम्यहमाश्रमात् |
२५ क
सूत उवाच:
जातवेदः पश्यतस्ते वद सत्यां गिरं मम ||
२५ ख
सूत उवाच:
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा सप्तार्चिर्दुःखितो भृशम् |
२६ क
सूत उवाच:
भीतोऽनृताच्च शापाच्च भृगोरित्यव्रवीच्छनैः ||
२६ ख