chevron_left आश्रमवासिक पर्व अध्याय ५
धृतराष्ट्र उवाच:
विदितं भवतामेतद्यथा वृत्तः कुरुक्षय़ः |
१ क
धृतराष्ट्र उवाच:
ममापराधात्तत्सर्वमिति ज्ञेय़ं तु कौरवाः ||
१ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
योऽहं दुष्टमतिं मूढं ज्ञातीनां भय़वर्धनम् |
२ क
धृतराष्ट्र उवाच:
दुर्योधनं कौरवाणामाधिपत्येऽभ्यषेचय़म् ||
२ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
यच्चाहं वासुदेवस्य वाक्यं नाश्रौषमर्थवत् |
३ क
धृतराष्ट्र उवाच:
वध्यतां साध्वय़ं पापः सामात्य इति दुर्मतिः ||
३ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
पुत्रस्नेहाभिभूतश्च हितमुक्तो मनीषिभिः |
४ क
धृतराष्ट्र उवाच:
विदुरेणाथ भीष्मेण द्रोणेन च कृपेण च ||
४ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
पदे पदे भगवता व्यासेन च महात्मना |
५ क
धृतराष्ट्र उवाच:
सञ्जय़ेनाथ गान्धार्या तदिदं तप्यतेऽद्य माम् ||
५ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
यच्चाहं पाण्डुपुत्रेण गुणवत्सु महात्मसु |
६ क
धृतराष्ट्र उवाच:
न दत्तवाञ्श्रिय़ं दीप्तां पितृपैतामहीमिमाम् ||
६ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
विनाशं पश्यमानो हि सर्वराज्ञां गदाग्रजः |
७ क
धृतराष्ट्र उवाच:
एतच्छ्रेय़ः स परमममन्यत जनार्दनः ||
७ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
सोऽहमेतान्यलीकानि निवृत्तान्यात्मनः सदा |
८ क
धृतराष्ट्र उवाच:
हृदय़े शल्यभूतानि धारय़ामि सहस्रशः ||
८ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
विशेषतस्तु दह्यामि वर्षं पञ्चदशं हि वै |
९ क
धृतराष्ट्र उवाच:
अस्य पापस्य शुद्ध्यर्थं निय़तोऽस्मि सुदुर्मतिः ||
९ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
चतुर्थे निय़ते काले कदाचिदपि चाष्टमे |
१० क
धृतराष्ट्र उवाच:
तृष्णाविनय़नं भुञ्जे गान्धारी वेद तन्मम ||
१० ख
धृतराष्ट्र उवाच:
करोत्याहारमिति मां सर्वः परिजनः सदा |
११ क
धृतराष्ट्र उवाच:
युधिष्ठिरभय़ाद्वेत्ति भृशं तप्यति पाण्डवः ||
११ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
भूमौ शय़े जप्यपरो दर्भेष्वजिनसंवृतः |
१२ क
धृतराष्ट्र उवाच:
निय़मव्यपदेशेन गान्धारी च यशस्विनी ||
१२ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
हतं पुत्रशतं शूरं सङ्ग्रामेष्वपलाय़िनम् |
१३ क
धृतराष्ट्र उवाच:
नानुतप्यामि तच्चाहं क्षत्रधर्मं हि तं विदुः |
१३ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
इत्युक्त्वा धर्मराजानमभ्यभाषत कौरवः ||
१३ ग
धृतराष्ट्र उवाच:
भद्रं ते यादवीमातर्वाक्यं चेदं निवोध मे |
१४ क
धृतराष्ट्र उवाच:
सुखमस्म्युषितः पुत्र त्वय़ा सुपरिपालितः ||
१४ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
महादानानि दत्तानि श्राद्धानि च पुनः पुनः |
१५ क
धृतराष्ट्र उवाच:
प्रकृष्टं मे वय़ः पुत्र पुण्यं चीर्णं यथावलम् |
१५ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
गान्धारी हतपुत्रेय़ं धैर्येणोदीक्षते च माम् ||
१५ ग
धृतराष्ट्र उवाच:
द्रौपद्या ह्यपकर्तारस्तव चैश्वर्यहारिणः |
१६ क
धृतराष्ट्र उवाच:
समतीता नृशंसास्ते धर्मेण निहता युधि ||
१६ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
न तेषु प्रतिकर्तव्यं पश्यामि कुरुनन्दन |
१७ क
धृतराष्ट्र उवाच:
सर्वे शस्त्रजिताँल्लोकान्गतास्तेऽभिमुखं हताः ||
१७ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
आत्मनस्तु हितं मुख्यं प्रतिकर्तव्यमद्य मे |
१८ क
धृतराष्ट्र उवाच:
गान्धार्याश्चैव राजेन्द्र तदनुज्ञातुमर्हसि ||
१८ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
त्वं हि धर्मभृतां श्रेष्ठः सततं धर्मवत्सलः |
१९ क
धृतराष्ट्र उवाच:
राजा गुरुः प्राणभृतां तस्मादेतद्व्रवीम्यहम् ||
१९ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
अनुज्ञातस्त्वय़ा वीर संश्रय़ेय़ं वनान्यहम् |
२० क
धृतराष्ट्र उवाच:
चीरवल्कलभृद्राजन्गान्धार्या सहितोऽनय़ा |
२० ख
धृतराष्ट्र उवाच:
तवाशिषः प्रय़ुञ्जानो भविष्यामि वनेचरः ||
२० ग
धृतराष्ट्र उवाच:
उचितं नः कुले तात सर्वेषां भरतर्षभ |
२१ क
धृतराष्ट्र उवाच:
पुत्रेष्वैश्वर्यमाधाय़ वय़सोऽन्ते वनं नृप ||
२१ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
तत्राहं वाय़ुभक्षो वा निराहारोऽपि वा वसन् |
२२ क
धृतराष्ट्र उवाच:
पत्न्या सहानय़ा वीर चरिष्यामि तपः परम् ||
२२ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
त्वं चापि फलभाक्तात तपसः पार्थिवो ह्यसि |
२३ क
धृतराष्ट्र उवाच:
फलभाजो हि राजानः कल्याणस्येतरस्य वा ||
२३ ख