युधिष्ठिर उवाच:
दर्शने कीदृशः स्नेहः संवासे च पितामह |
१ क
युधिष्ठिर उवाच:
महाभाग्यं गवां चैव तन्मे व्रूहि पितामह ||
१ ख
भीष्म उवाच:
हन्त ते कथय़िष्यामि पुरावृत्तं महाद्युते |
२ क
भीष्म उवाच:
नहुषस्य च संवादं महर्षेश्च्यवनस्य च ||
२ ख
भीष्म उवाच:
पुरा महर्षिश्च्यवनो भार्गवो भरतर्षभ |
३ क
भीष्म उवाच:
उदवासकृतारम्भो वभूव सुमहाव्रतः ||
३ ख
भीष्म उवाच:
निहत्य मानं क्रोधं च प्रहर्षं शोकमेव च |
४ क
भीष्म उवाच:
वर्षाणि द्वादश मुनिर्जलवासे धृतव्रतः ||
४ ख
भीष्म उवाच:
आदधत्सर्वभूतेषु विस्रम्भं परमं शुभम् |
५ क
भीष्म उवाच:
जलेचरेषु सत्त्वेषु शीतरश्मिरिव प्रभुः ||
५ ख
भीष्म उवाच:
स्थाणुभूतः शुचिर्भूत्वा दैवतेभ्यः प्रणम्य च |
६ क
भीष्म उवाच:
गङ्गाय़मुनय़ोर्मध्ये जलं सम्प्रविवेश ह ||
६ ख
भीष्म उवाच:
गङ्गाय़मुनय़ोर्वेगं सुभीमं भीमनिःस्वनम् |
७ क
भीष्म उवाच:
प्रतिजग्राह शिरसा वातवेगसमं जवे ||
७ ख
भीष्म उवाच:
गङ्गा च यमुना चैव सरितश्चानुगास्तय़ोः |
८ क
भीष्म उवाच:
प्रदक्षिणमृषिं चक्रुर्न चैनं पर्यपीडय़न् ||
८ ख
भीष्म उवाच:
अन्तर्जले स सुष्वाप काष्ठभूतो महामुनिः |
९ क
भीष्म उवाच:
ततश्चोर्ध्वस्थितो धीमानभवद्भरतर्षभ ||
९ ख
भीष्म उवाच:
जलौकसां स सत्त्वानां वभूव प्रिय़दर्शनः |
१० क
भीष्म उवाच:
उपाजिघ्रन्त च तदा मत्स्यास्तं हृष्टमानसाः |
१० ख
भीष्म उवाच:
तत्र तस्यासतः कालः समतीतोऽभवन्महान् ||
१० ग
भीष्म उवाच:
ततः कदाचित्समय़े कस्मिंश्चिन्मत्स्यजीविनः |
११ क
भीष्म उवाच:
तं देशं समुपाजग्मुर्जालहस्ता महाद्युते ||
११ ख
भीष्म उवाच:
निषादा वहवस्तत्र मत्स्योद्धरणनिश्चिताः |
१२ क
भीष्म उवाच:
व्याय़ता वलिनः शूराः सलिलेष्वनिवर्तिनः |
१२ ख
भीष्म उवाच:
अभ्याय़युश्च तं देशं निश्चिता जालकर्मणि ||
१२ ग
भीष्म उवाच:
जालं च योजय़ामासुर्विशेषेण जनाधिप |
१३ क
भीष्म उवाच:
मत्स्योदकं समासाद्य तदा भरतसत्तम ||
१३ ख
भीष्म उवाच:
ततस्ते वहुभिर्योगैः कैवर्ता मत्स्यकाङ्क्षिणः |
१४ क
भीष्म उवाच:
गङ्गाय़मुनय़ोर्वारि जालैरभ्यकिरंस्ततः ||
१४ ख
भीष्म उवाच:
जालं सुविततं तेषां नवसूत्रकृतं तथा |
१५ क
भीष्म उवाच:
विस्ताराय़ामसम्पन्नं यत्तत्र सलिले क्षमम् ||
१५ ख
भीष्म उवाच:
ततस्ते सुमहच्चैव वलवच्च सुवर्तितम् |
१६ क
भीष्म उवाच:
प्रकीर्य सर्वतः सर्वे जालं चकृषिरे तदा ||
१६ ख
भीष्म उवाच:
अभीतरूपाः संहृष्टास्तेऽन्योन्यवशवर्तिनः |
१७ क
भीष्म उवाच:
ववन्धुस्तत्र मत्स्यांश्च तथान्याञ्जलचारिणः ||
१७ ख
भीष्म उवाच:
तथा मत्स्यैः परिवृतं च्यवनं भृगुनन्दनम् |
१८ क
भीष्म उवाच:
आकर्षन्त महाराज जालेनाथ यदृच्छय़ा ||
१८ ख
भीष्म उवाच:
नदीशैवलदिग्धाङ्गं हरिश्मश्रुजटाधरम् |
१९ क
भीष्म उवाच:
लग्नैः शङ्खगणैर्गात्रैः कोष्ठैश्चित्रैरिवावृतम् ||
१९ ख
भीष्म उवाच:
तं जालेनोद्धृतं दृष्ट्वा ते तदा वेदपारगम् |
२० क
भीष्म उवाच:
सर्वे प्राञ्जलय़ो दाशाः शिरोभिः प्रापतन्भुवि ||
२० ख
भीष्म उवाच:
परिखेदपरित्रासाज्जालस्याकर्षणेन च |
२१ क
भीष्म उवाच:
मत्स्या वभूवुर्व्यापन्नाः स्थलसङ्कर्षणेन च ||
२१ ख
भीष्म उवाच:
स मुनिस्तत्तदा दृष्ट्वा मत्स्यानां कदनं कृतम् |
२२ क
भीष्म उवाच:
वभूव कृपय़ाविष्टो निःश्वसंश्च पुनः पुनः ||
२२ ख
निषादा ऊचुः:
अज्ञानाद्यत्कृतं पापं प्रसादं तत्र नः कुरु |
२३ क
निषादा ऊचुः:
करवाम प्रिय़ं किं ते तन्नो व्रूहि महामुने ||
२३ ख
भीष्म उवाच:
इत्युक्तो मत्स्यमध्यस्थश्च्यवनो वाक्यमव्रवीत् |
२४ क
भीष्म उवाच:
यो मेऽद्य परमः कामस्तं शृणुध्वं समाहिताः ||
२४ ख
भीष्म उवाच:
प्राणोत्सर्गं विक्रय़ं वा मत्स्यैर्यास्याम्यहं सह |
२५ क
भीष्म उवाच:
संवासान्नोत्सहे त्यक्तुं सलिलाध्युषितानिमान् ||
२५ ख
भीष्म उवाच:
इत्युक्तास्ते निषादास्तु सुभृशं भय़कम्पिताः |
२६ क
भीष्म उवाच:
सर्वे विषण्णवदना नहुषाय़ न्यवेदय़न् ||
२६ ख