धृतराष्ट्र उवाच:
सर्व एते महोत्साहा ये त्वय़ा परिकीर्तिताः |
१ क
धृतराष्ट्र उवाच:
एकतस्त्वेव ते सर्वे समेता भीम एकतः ||
१ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
भीमसेनाद्धि मे भूय़ो भय़ं सञ्जाय़ते महत् |
२ क
धृतराष्ट्र उवाच:
क्रुद्धादमर्षणात्तात व्याघ्रादिव महारुरोः ||
२ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
जागर्मि रात्रय़ः सर्वा दीर्घमुष्णं च निःश्वसन् |
३ क
धृतराष्ट्र उवाच:
भीतो वृकोदरात्तात सिंहात्पशुरिवावलः ||
३ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
न हि तस्य महावाहोः शक्रप्रतिमतेजसः |
४ क
धृतराष्ट्र उवाच:
सैन्येऽस्मिन्प्रतिपश्यामि य एनं विषहेद्युधि ||
४ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
अमर्षणश्च कौन्तेय़ो दृढवैरश्च पाण्डवः |
५ क
धृतराष्ट्र उवाच:
अनर्महासी सोन्मादस्तिर्यक्प्रेक्षी महास्वनः ||
५ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
महावेगो महोत्साहो महावाहुर्महावलः |
६ क
धृतराष्ट्र उवाच:
मन्दानां मम पुत्राणां युद्धेनान्तं करिष्यति ||
६ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
ऊरुग्राहगृहीतानां गदां विभ्रद्वृकोदरः |
७ क
धृतराष्ट्र उवाच:
कुरूणामृषभो युद्धे दण्डपाणिरिवान्तकः ||
७ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
शैक्याय़समय़ीं घोरां गदां काञ्चनभूषिताम् |
८ क
धृतराष्ट्र उवाच:
मनसाहं प्रपश्यामि व्रह्मदण्डमिवोद्यतम् ||
८ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
यथा रुरूणां यूथेषु सिंहो जातवलश्चरेत् |
९ क
धृतराष्ट्र उवाच:
मामकेषु तथा भीमो वलेषु विचरिष्यति ||
९ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
सर्वेषां मम पुत्राणां स एकः क्रूरविक्रमः |
१० क
धृतराष्ट्र उवाच:
वह्वाशी विप्रतीपश्च वाल्येऽपि रभसः सदा ||
१० ख
धृतराष्ट्र उवाच:
उद्वेपते मे हृदय़ं यदा दुर्योधनादय़ः |
११ क
धृतराष्ट्र उवाच:
वाल्येऽपि तेन युध्यन्तो वारणेनेव मर्दिताः ||
११ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
तस्य वीर्येण सङ्क्लिष्टा नित्यमेव सुता मम |
१२ क
धृतराष्ट्र उवाच:
स एव हेतुर्भेदस्य भीमो भीमपराक्रमः ||
१२ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
ग्रसमानमनीकानि नरवारणवाजिनाम् |
१३ क
धृतराष्ट्र उवाच:
पश्यामीवाग्रतो भीमं क्रोधमूर्छितमाहवे ||
१३ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
अस्त्रे द्रोणार्जुनसमं वाय़ुवेगसमं जवे |
१४ क
धृतराष्ट्र उवाच:
सञ्जय़ाचक्ष्व मे शूरं भीमसेनममर्षणम् ||
१४ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
अतिलाभं तु मन्येऽहं यत्तेन रिपुघातिना |
१५ क
धृतराष्ट्र उवाच:
तदैव न हताः सर्वे मम पुत्रा मनस्विना ||
१५ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
येन भीमवला यक्षा राक्षसाश्च समाहताः |
१६ क
धृतराष्ट्र उवाच:
कथं तस्य रणे वेगं मानुषः प्रसहिष्यति ||
१६ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
न स जातु वशे तस्थौ मम वालोऽपि सञ्जय़ |
१७ क
धृतराष्ट्र उवाच:
किं पुनर्मम दुष्पुत्रैः क्लिष्टः सम्प्रति पाण्डवः ||
१७ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
निष्ठुरः स च नैष्ठुर्याद्भज्येदपि न संनमेत् |
१८ क
धृतराष्ट्र उवाच:
तिर्यक्प्रेक्षी संहतभ्रूः कथं शाम्येद्वृकोदरः ||
१८ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
वृहदंसोऽप्रतिवलो गौरस्ताल इवोद्गतः |
१९ क
धृतराष्ट्र उवाच:
प्रमाणतो भीमसेनः प्रादेशेनाधिकोऽर्जुनात् ||
१९ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
जवेन वाजिनोऽत्येति वलेनात्येति कुञ्जरान् |
२० क
धृतराष्ट्र उवाच:
अव्यक्तजल्पी मध्वक्षो मध्यमः पाण्डवो वली ||
२० ख
धृतराष्ट्र उवाच:
इति वाल्ये श्रुतः पूर्वं मय़ा व्यासमुखात्पुरा |
२१ क
धृतराष्ट्र उवाच:
रूपतो वीर्यतश्चैव याथातथ्येन पाण्डवः ||
२१ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
आय़सेन स दण्डेन रथान्नागान्हय़ान्नरान् |
२२ क
धृतराष्ट्र उवाच:
हनिष्यति रणे क्रुद्धो भीमः प्रहरतां वरः ||
२२ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
अमर्षी नित्यसंरव्धो रौद्रः क्रूरपराक्रमः |
२३ क
धृतराष्ट्र उवाच:
मम तात प्रतीपानि कुर्वन्पूर्वं विमानितः ||
२३ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
निष्कीर्णामाय़सीं स्थूलां सुपर्वां काञ्चनीं गदाम् |
२४ क
धृतराष्ट्र उवाच:
शतघ्नीं शतनिर्ह्रादां कथं शक्ष्यन्ति मे सुताः ||
२४ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
अपारमप्लवागाधं समुद्रं शरवेगिनम् |
२५ क
धृतराष्ट्र उवाच:
भीमसेनमय़ं दुर्गं तात मन्दास्तितीर्षवः ||
२५ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
क्रोशतो मे न शृण्वन्ति वालाः पण्डितमानिनः |
२६ क
धृतराष्ट्र उवाच:
विषमं नाववुध्यन्ते प्रपातं मधुदर्शिनः ||
२६ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
संय़ुगं ये करिष्यन्ति नररूपेण वाय़ुना |
२७ क
धृतराष्ट्र उवाच:
निय़तं चोदिता धात्रा सिंहेनेव महामृगाः ||
२७ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
शैक्यां तात चतुष्किष्कुं षडस्रिममितौजसम् |
२८ क
धृतराष्ट्र उवाच:
प्रहितां दुःखसंस्पर्शां कथं शक्ष्यन्ति मे सुताः ||
२८ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
गदां भ्रामय़तस्तस्य भिन्दतो हस्तिमस्तकान् |
२९ क
धृतराष्ट्र उवाच:
सृक्किणी लेलिहानस्य वाष्पमुत्सृजतो मुहुः ||
२९ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
उद्दिश्य पातान्पततः कुर्वतो भैरवान्रवान् |
३० क
धृतराष्ट्र उवाच:
प्रतीपान्पततो मत्तान्कुञ्जरान्प्रतिगर्जतः ||
३० ख
धृतराष्ट्र उवाच:
विगाह्य रथमार्गेषु वरानुद्दिश्य निघ्नतः |
३१ क
धृतराष्ट्र उवाच:
अग्नेः प्रज्वलितस्येव अपि मुच्येत मे प्रजा ||
३१ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
वीथीं कुर्वन्महावाहुर्द्रावय़न्मम वाहिनीम् |
३२ क
धृतराष्ट्र उवाच:
नृत्यन्निव गदापाणिर्युगान्तं दर्शय़िष्यति ||
३२ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
प्रभिन्न इव मातङ्गः प्रभञ्जन्पुष्पितान्द्रुमान् |
३३ क
धृतराष्ट्र उवाच:
प्रवेक्ष्यति रणे सेनां पुत्राणां मे वृकोदरः ||
३३ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
कुर्वन्रथान्विपुरुषान्विध्वजान्भग्नपुष्करान् |
३४ क
धृतराष्ट्र उवाच:
आरुजन्पुरुषव्याघ्रो रथिनः सादिनस्तथा ||
३४ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
गङ्गावेग इवानूपांस्तीरजान्विविधान्द्रुमान् |
३५ क
धृतराष्ट्र उवाच:
प्रवेक्ष्यति महासेनां पुत्राणां मम सञ्जय़ ||
३५ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
वशं नूनं गमिष्यन्ति भीमसेनवलार्दिताः |
३६ क
धृतराष्ट्र उवाच:
मम पुत्राश्च भृत्याश्च राजानश्चैव सञ्जय़ ||
३६ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
येन राजा महावीर्यः प्रविश्यान्तःपुरं पुरा |
३७ क
धृतराष्ट्र उवाच:
वासुदेवसहाय़ेन जरासन्धो निपातितः ||
३७ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
कृत्स्नेय़ं पृथिवी देवी जरासन्धेन धीमता |
३८ क
धृतराष्ट्र उवाच:
मागधेन्द्रेण वलिना वशे कृत्वा प्रतापिता ||
३८ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
भीष्मप्रतापात्कुरवो नय़ेनान्धकवृष्णय़ः |
३९ क
धृतराष्ट्र उवाच:
ते न तस्य वशं जग्मुः केवलं दैवमेव वा ||
३९ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
स गत्वा पाण्डुपुत्रेण तरसा वाहुशालिना |
४० क
धृतराष्ट्र उवाच:
अनाय़ुधेन वीरेण निहतः किं ततोऽधिकम् ||
४० ख
धृतराष्ट्र उवाच:
दीर्घकालेन संसिक्तं विषमाशीविषो यथा |
४१ क
धृतराष्ट्र उवाच:
स मोक्ष्यति रणे तेजः पुत्रेषु मम सञ्जय़ ||
४१ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
महेन्द्र इव वज्रेण दानवान्देवसत्तमः |
४२ क
धृतराष्ट्र उवाच:
भीमसेनो गदापाणिः सूदय़िष्यति मे सुतान् ||
४२ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
अविषह्यमनावार्यं तीव्रवेगपराक्रमम् |
४३ क
धृतराष्ट्र उवाच:
पश्यामीवातिताम्राक्षमापतन्तं वृकोदरम् ||
४३ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
अगदस्याप्यधनुषो विरथस्य विवर्मणः |
४४ क
धृतराष्ट्र उवाच:
वाहुभ्यां युध्यमानस्य कस्तिष्ठेदग्रतः पुमान् ||
४४ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
भीष्मो द्रोणश्च विप्रोऽय़ं कृपः शारद्वतस्तथा |
४५ क
धृतराष्ट्र उवाच:
जानन्त्येते यथैवाहं वीर्यज्ञस्तस्य धीमतः ||
४५ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
आर्यव्रतं तु जानन्तः सङ्गरान्न विभित्सवः |
४६ क
धृतराष्ट्र उवाच:
सेनामुखेषु स्थास्यन्ति मामकानां नरर्षभाः ||
४६ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
वलीय़ः सर्वतो दिष्टं पुरुषस्य विशेषतः |
४७ क
धृतराष्ट्र उवाच:
पश्यन्नपि जय़ं तेषां न निय़च्छामि यत्सुतान् ||
४७ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
ते पुराणं महेष्वासा मार्गमैन्द्रं समास्थिताः |
४८ क
धृतराष्ट्र उवाच:
त्यक्ष्यन्ति तुमुले प्राणान्रक्षन्तः पार्थिवं यशः ||
४८ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
यथैषां मामकास्तात तथैषां पाण्डवा अपि |
४९ क
धृतराष्ट्र उवाच:
पौत्रा भीष्मस्य शिष्याश्च द्रोणस्य च कृपस्य च ||
४९ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
यत्त्वस्मदाश्रय़ं किञ्चिद्दत्तमिष्टं च सञ्जय़ |
५० क
धृतराष्ट्र उवाच:
तस्यापचितिमार्यत्वात्कर्तारः स्थविरास्त्रय़ः ||
५० ख