chevron_left वन पर्व अध्याय २६६
मार्कण्डेय़ उवाच:
राघवस्तु ससौमित्रिः सुग्रीवेणाभिपालितः |
१ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
वसन्माल्यवतः पृष्ठे ददर्श विमलं नभः ||
१ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
स दृष्ट्वा विमले व्योम्नि निर्मलं शशलक्षणम् |
२ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
ग्रहनक्षत्रताराभिरनुय़ातममित्रहा ||
२ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
कुमुदोत्पलपद्मानां गन्धमादाय़ वाय़ुना |
३ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
महीधरस्थः शीतेन सहसा प्रतिवोधितः ||
३ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
प्रभाते लक्ष्मणं वीरमभ्यभाषत दुर्मनाः |
४ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
सीतां संस्मृत्य धर्मात्मा रुद्धां राक्षसवेश्मनि ||
४ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
गच्छ लक्ष्मण जानीहि किष्किन्धाय़ां कपीश्वरम् |
५ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
प्रमत्तं ग्राम्यधर्मेषु कृतघ्नं स्वार्थपण्डितम् ||
५ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
योऽसौ कुलाधमो मूढो मय़ा राज्येऽभिषेचितः |
६ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
सर्ववानरगोपुच्छा यमृक्षाश्च भजन्ति वै ||
६ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
यदर्थं निहतो वाली मय़ा रघुकुलोद्वह |
७ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
त्वय़ा सह महावाहो किष्किन्धोपवने तदा ||
७ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
कृतघ्नं तमहं मन्ये वानरापसदं भुवि |
८ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
यो मामेवङ्गतो मूढो न जानीतेऽद्य लक्ष्मण ||
८ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
असौ मन्ये न जानीते समय़प्रतिपादनम् |
९ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
कृतोपकारं मां नूनमवमन्याल्पय़ा धिय़ा ||
९ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
यदि तावदनुद्युक्तः शेते कामसुखात्मकः |
१० क
मार्कण्डेय़ उवाच:
नेतव्यो वालिमार्गेण सर्वभूतगतिं त्वय़ा ||
१० ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
अथापि घटतेऽस्माकमर्थे वानरपुङ्गवः |
११ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
तमादाय़ैहि काकुत्स्थ त्वरावान्भव मा चिरम् ||
११ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
इत्युक्तो लक्ष्मणो भ्रात्रा गुरुवाक्यहिते रतः |
१२ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
प्रतस्थे रुचिरं गृह्य समार्गणगुणं धनुः |
१२ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
किष्किन्धाद्वारमासाद्य प्रविवेशानिवारितः ||
१२ ग
मार्कण्डेय़ उवाच:
सक्रोध इति तं मत्वा राजा प्रत्युद्ययौ हरिः |
१३ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
तं सदारो विनीतात्मा सुग्रीवः प्लवगाधिपः |
१३ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
पूजय़ा प्रतिजग्राह प्रीय़माणस्तदर्हय़ा ||
१३ ग
मार्कण्डेय़ उवाच:
तमव्रवीद्रामवचः सौमित्रिरकुतोभय़ः |
१४ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
स तत्सर्वमशेषेण श्रुत्वा प्रह्वः कृताञ्जलिः ||
१४ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
सभृत्यदारो राजेन्द्र सुग्रीवो वानराधिपः |
१५ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
इदमाह वचः प्रीतो लक्ष्मणं नरकुञ्जरम् ||
१५ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
नास्मि लक्ष्मण दुर्मेधा न कृतघ्नो न निर्घृणः |
१६ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
श्रूय़तां यः प्रय़त्नो मे सीतापर्येषणे कृतः ||
१६ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
दिशः प्रस्थापिताः सर्वे विनीता हरय़ो मय़ा |
१७ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
सर्वेषां च कृतः कालो मासेनागमनं पुनः ||
१७ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
यैरिय़ं सवना साद्रिः सपुरा सागराम्वरा |
१८ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
विचेतव्या मही वीर सग्रामनगराकरा ||
१८ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
स मासः पञ्चरात्रेण पूर्णो भवितुमर्हति |
१९ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
ततः श्रोष्यसि रामेण सहितः सुमहत्प्रिय़म् ||
१९ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
इत्युक्तो लक्ष्मणस्तेन वानरेन्द्रेण धीमता |
२० क
मार्कण्डेय़ उवाच:
त्यक्त्वा रोषमदीनात्मा सुग्रीवं प्रत्यपूजय़त् ||
२० ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
स रामं सहसुग्रीवो माल्यवत्पृष्ठमास्थितम् |
२१ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
अभिगम्योदय़ं तस्य कार्यस्य प्रत्यवेदय़त् ||
२१ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
इत्येवं वानरेन्द्रास्ते समाजग्मुः सहस्रशः |
२२ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
दिशस्तिस्रो विचित्याथ न तु ये दक्षिणां गताः ||
२२ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
आचख्युस्ते तु रामाय़ महीं सागरमेखलाम् |
२३ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
विचितां न तु वैदेह्या दर्शनं रावणस्य वा ||
२३ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
गतास्तु दक्षिणामाशां ये वै वानरपुङ्गवाः |
२४ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
आशावांस्तेषु काकुत्स्थः प्राणानार्तोऽप्यधारय़त् ||
२४ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
द्विमासोपरमे काले व्यतीते प्लवगास्ततः |
२५ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
सुग्रीवमभिगम्येदं त्वरिता वाक्यमव्रुवन् ||
२५ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
रक्षितं वालिना यत्तत्स्फीतं मधुवनं महत् |
२६ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
त्वय़ा च प्लवगश्रेष्ठ तद्भुङ्क्ते पवनात्मजः ||
२६ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
वालिपुत्रोऽङ्गदश्चैव ये चान्ये प्लवगर्षभाः |
२७ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
विचेतुं दक्षिणामाशां राजन्प्रस्थापितास्त्वय़ा ||
२७ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
तेषां तं प्रणय़ं श्रुत्वा मेने स कृतकृत्यताम् |
२८ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
कृतार्थानां हि भृत्यानामेतद्भवति चेष्टितम् ||
२८ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
स तद्रामाय़ मेधावी शशंस प्लवगर्षभः |
२९ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
रामश्चाप्यनुमानेन मेने दृष्टां तु मैथिलीम् ||
२९ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
हनूमत्प्रमुखाश्चापि विश्रान्तास्ते प्लवङ्गमाः |
३० क
मार्कण्डेय़ उवाच:
अभिजग्मुर्हरीन्द्रं तं रामलक्ष्मणसंनिधौ ||
३० ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
गतिं च मुखवर्णं च दृष्ट्वा रामो हनूमतः |
३१ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
अगमत्प्रत्ययं भूय़ो दृष्टा सीतेति भारत ||
३१ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
हनूमत्प्रमुखास्ते तु वानराः पूर्णमानसाः |
३२ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
प्रणेमुर्विधिवद्रामं सुग्रीवं लक्ष्मणं तथा ||
३२ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
तानुवाचागतान्रामः प्रगृह्य सशरं धनुः |
३३ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
अपि मां जीवय़िष्यध्वमपि वः कृतकृत्यता ||
३३ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
अपि राज्यमय़ोध्याय़ां कारय़िष्याम्यहं पुनः |
३४ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
निहत्य समरे शत्रूनाहृत्य जनकात्मजाम् ||
३४ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
अमोक्षय़ित्वा वैदेहीमहत्वा च रिपून्रणे |
३५ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
हृतदारोऽवधूतश्च नाहं जीवितुमुत्सहे ||
३५ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
इत्युक्तवचनं रामं प्रत्युवाचानिलात्मजः |
३६ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
प्रिय़माख्यामि ते राम दृष्टा सा जानकी मय़ा ||
३६ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
विचित्य दक्षिणामाशां सपर्वतवनाकराम् |
३७ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
श्रान्ताः काले व्यतीते स्म दृष्टवन्तो महागुहाम् ||
३७ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
प्रविशामो वय़ं तां तु वहुय़ोजनमाय़ताम् |
३८ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
अन्धकारां सुविपिनां गहनां कीटसेविताम् ||
३८ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
गत्वा सुमहदध्वानमादित्यस्य प्रभां ततः |
३९ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
दृष्टवन्तः स्म तत्रैव भवनं दिव्यमन्तरा ||
३९ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
मय़स्य किल दैत्यस्य तदासीद्वेश्म राघव |
४० क
मार्कण्डेय़ उवाच:
तत्र प्रभावती नाम तपोऽतप्यत तापसी ||
४० ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
तय़ा दत्तानि भोज्यानि पानानि विविधानि च |
४१ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
भुक्त्वा लव्धवलाः सन्तस्तय़ोक्तेन पथा ततः ||
४१ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
निर्याय़ तस्मादुद्देशात्पश्यामो लवणाम्भसः |
४२ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
समीपे सह्यमलय़ौ दर्दुरं च महागिरिम् ||
४२ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
ततो मलय़मारुह्य पश्यन्तो वरुणालय़म् |
४३ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
विषण्णा व्यथिताः खिन्ना निराशा जीविते भृशम् ||
४३ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
अनेकशतविस्तीर्णं योजनानां महोदधिम् |
४४ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
तिमिनक्रझषावासं चिन्तय़न्तः सुदुःखिताः ||
४४ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
तत्रानशनसङ्कल्पं कृत्वासीना वय़ं तदा |
४५ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
ततः कथान्ते गृध्रस्य जटाय़ोरभवत्कथा ||
४५ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
ततः पर्वतशृङ्गाभं घोररूपं भय़ावहम् |
४६ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
पक्षिणं दृष्टवन्तः स्म वैनतेय़मिवापरम् ||
४६ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
सोऽस्मानतर्कय़द्भोक्तुमथाभ्येत्य वचोऽव्रवीत् |
४७ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
भोः क एष मम भ्रातुर्जटाय़ोः कुरुते कथाम् ||
४७ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
सम्पातिर्नाम तस्याहं ज्येष्ठो भ्राता खगाधिपः |
४८ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
अन्योन्यस्पर्धय़ारूढावावामादित्यसंसदम् ||
४८ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
ततो दग्धाविमौ पक्षौ न दग्धौ तु जटाय़ुषः |
४९ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
तदा मे चिरदृष्टः स भ्राता गृध्रपतिः प्रिय़ः |
४९ ख