युधिष्ठिर उवाच:
तस्मिन्नन्तर्हिते विप्रे राजा किमकरोत्तदा |
१ क
युधिष्ठिर उवाच:
भार्या चास्य महाभागा तन्मे व्रूहि पितामह ||
१ ख
भीष्म उवाच:
अदृष्ट्वा स महीपालस्तमृषिं सह भार्यया |
२ क
भीष्म उवाच:
परिश्रान्तो निववृते व्रीडितो नष्टचेतनः ||
२ ख
भीष्म उवाच:
स प्रविश्य पुरीं दीनो नाभ्यभाषत किञ्चन |
३ क
भीष्म उवाच:
तदेव चिन्तय़ामास च्यवनस्य विचेष्टितम् ||
३ ख
भीष्म उवाच:
अथ शून्येन मनसा प्रविवेश गृहं नृपः |
४ क
भीष्म उवाच:
ददर्श शय़ने तस्मिञ्शय़ानं भृगुनन्दनम् ||
४ ख
भीष्म उवाच:
विस्मितौ तौ तु दृष्ट्वा तं तदाश्चर्यं विचिन्त्य च |
५ क
भीष्म उवाच:
दर्शनात्तस्य च मुनेर्विश्रान्तौ सम्वभूवतुः ||
५ ख
भीष्म उवाच:
यथास्थानं तु तौ स्थित्वा भूय़स्तं संववाहतुः |
६ क
भीष्म उवाच:
अथापरेण पार्श्वेन सुष्वाप स महामुनिः ||
६ ख
भीष्म उवाच:
तेनैव च स कालेन प्रत्यवुध्यत वीर्यवान् |
७ क
भीष्म उवाच:
न च तौ चक्रतुः किञ्चिद्विकारं भय़शङ्कितौ ||
७ ख
भीष्म उवाच:
प्रतिवुद्धस्तु स मुनिस्तौ प्रोवाच विशां पते |
८ क
भीष्म उवाच:
तैलाभ्यङ्गो दीय़तां मे स्नास्येऽहमिति भारत ||
८ ख
भीष्म उवाच:
तथेति तौ प्रतिश्रुत्य क्षुधितौ श्रमकर्शितौ |
९ क
भीष्म उवाच:
शतपाकेन तैलेन महार्हेणोपतस्थतुः ||
९ ख
भीष्म उवाच:
ततः सुखासीनमृषिं वाग्यतौ संववाहतुः |
१० क
भीष्म उवाच:
न च पर्याप्तमित्याह भार्गवः सुमहातपाः ||
१० ख
भीष्म उवाच:
यदा तौ निर्विकारौ तु लक्षय़ामास भार्गवः |
११ क
भीष्म उवाच:
तत उत्थाय़ सहसा स्नानशालां विवेश ह |
११ ख
भीष्म उवाच:
कॢप्तमेव तु तत्रासीत्स्नानीय़ं पार्थिवोचितम् ||
११ ग
भीष्म उवाच:
असत्कृत्य तु तत्सर्वं तत्रैवान्तरधीय़त |
१२ क
भीष्म उवाच:
स मुनिः पुनरेवाथ नृपतेः पश्यतस्तदा |
१२ ख
भीष्म उवाच:
नासूय़ां चक्रतुस्तौ च दम्पती भरतर्षभ ||
१२ ग
भीष्म उवाच:
अथ स्नातः स भगवान्सिंहासनगतः प्रभुः |
१३ क
भीष्म उवाच:
दर्शय़ामास कुशिकं सभार्यं भृगुनन्दनः ||
१३ ख
भीष्म उवाच:
संहृष्टवदनो राजा सभार्यः कुशिको मुनिम् |
१४ क
भीष्म उवाच:
सिद्धमन्नमिति प्रह्वो निर्विकारो न्यवेदय़त् ||
१४ ख
भीष्म उवाच:
आनीय़तामिति मुनिस्तं चोवाच नराधिपम् |
१५ क
भीष्म उवाच:
राजा च समुपाजह्रे तदन्नं सह भार्यया ||
१५ ख
भीष्म उवाच:
मांसप्रकारान्विविधाञ्शाकानि विविधानि च |
१६ क
भीष्म उवाच:
वेसवारविकारांश्च पानकानि लघूनि च ||
१६ ख
भीष्म उवाच:
रसालापूपकांश्चित्रान्मोदकानथ षाडवान् |
१७ क
भीष्म उवाच:
रसान्नानाप्रकारांश्च वन्यं च मुनिभोजनम् ||
१७ ख
भीष्म उवाच:
फलानि च विचित्राणि तथा भोज्यानि भूरिशः |
१८ क
भीष्म उवाच:
वदरेङ्गुदकाश्मर्यभल्लातकवटानि च ||
१८ ख
भीष्म उवाच:
गृहस्थानां च यद्भोज्यं यच्चापि वनवासिनाम् |
१९ क
भीष्म उवाच:
सर्वमाहारय़ामास राजा शापभय़ान्मुनेः ||
१९ ख
भीष्म उवाच:
अथ सर्वमुपन्यस्तमग्रतश्च्यवनस्य तत् |
२० क
भीष्म उवाच:
ततः सर्वं समानीय़ तच्च शय़्यासनं मुनिः ||
२० ख
भीष्म उवाच:
वस्त्रैः शुभैरवच्छाद्य भोजनोपस्करैः सह |
२१ क
भीष्म उवाच:
सर्वमादीपय़ामास च्यवनो भृगुनन्दनः ||
२१ ख
भीष्म उवाच:
न च तौ चक्रतुः कोपं दम्पती सुमहाव्रतौ |
२२ क
भीष्म उवाच:
तय़ोः सम्प्रेक्षतोरेव पुनरन्तर्हितोऽभवत् ||
२२ ख
भीष्म उवाच:
तत्रैव च स राजर्षिस्तस्थौ तां रजनीं तदा |
२३ क
भीष्म उवाच:
सभार्यो वाग्यतः श्रीमान्न च तं कोप आविशत् ||
२३ ख
भीष्म उवाच:
नित्यं संस्कृतमन्नं तु विविधं राजवेश्मनि |
२४ क
भीष्म उवाच:
शय़नानि च मुख्यानि परिषेकाश्च पुष्कलाः ||
२४ ख
भीष्म उवाच:
वस्त्रं च विविधाकारमभवत्समुपार्जितम् |
२५ क
भीष्म उवाच:
न शशाक ततो द्रष्टुमन्तरं च्यवनस्तदा ||
२५ ख
भीष्म उवाच:
पुनरेव च विप्रर्षिः प्रोवाच कुशिकं नृपम् |
२६ क
भीष्म उवाच:
सभार्यो मां रथेनाशु वह यत्र व्रवीम्यहम् ||
२६ ख
भीष्म उवाच:
तथेति च प्राह नृपो निर्विशङ्कस्तपोधनम् |
२७ क
भीष्म उवाच:
क्रीडारथोऽस्तु भगवन्नुत साङ्ग्रामिको रथः ||
२७ ख
भीष्म उवाच:
इत्युक्तः स मुनिस्तेन राज्ञा हृष्टेन तद्वचः |
२८ क
भीष्म उवाच:
च्यवनः प्रत्युवाचेदं हृष्टः परपुरञ्जय़म् ||
२८ ख
भीष्म उवाच:
सज्जीकुरु रथं क्षिप्रं यस्ते साङ्ग्रामिको मतः |
२९ क
भीष्म उवाच:
साय़ुधः सपताकश्च सशक्तिः कणय़ष्टिमान् ||
२९ ख
भीष्म उवाच:
किङ्किणीशतनिर्घोषो युक्तस्तोमरकल्पनैः |
३० क
भीष्म उवाच:
गदाखड्गनिवद्धश्च परमेषुशतान्वितः ||
३० ख
भीष्म उवाच:
ततः स तं तथेत्युक्त्वा कल्पय़ित्वा महारथम् |
३१ क
भीष्म उवाच:
भार्यां वामे धुरि तदा चात्मानं दक्षिणे तथा ||
३१ ख
भीष्म उवाच:
त्रिदंष्ट्रं वज्रसूच्यग्रं प्रतोदं तत्र चादधत् |
३२ क
भीष्म उवाच:
सर्वमेतत्ततो दत्त्वा नृपो वाक्यमथाव्रवीत् ||
३२ ख
भीष्म उवाच:
भगवन्क्व रथो यातु व्रवीतु भृगुनन्दनः |
३३ क
भीष्म उवाच:
यत्र वक्ष्यसि विप्रर्षे तत्र यास्यति ते रथः ||
३३ ख
भीष्म उवाच:
एवमुक्तस्तु भगवान्प्रत्युवाचाथ तं नृपम् |
३४ क
भीष्म उवाच:
इतःप्रभृति यातव्यं पदकं पदकं शनैः ||
३४ ख
भीष्म उवाच:
श्रमो मम यथा न स्यात्तथा मे छन्दचारिणौ |
३५ क
भीष्म उवाच:
सुखं चैवास्मि वोढव्यो जनः सर्वश्च पश्यतु ||
३५ ख
भीष्म उवाच:
नोत्सार्यः पथिकः कश्चित्तेभ्यो दास्याम्यहं वसु |
३६ क
भीष्म उवाच:
व्राह्मणेभ्यश्च ये कामानर्थय़िष्यन्ति मां पथि ||
३६ ख
भीष्म उवाच:
सर्वं दास्याम्यशेषेण धनं रत्नानि चैव हि |
३७ क
भीष्म उवाच:
क्रिय़तां निखिलेनैतन्मा विचारय़ पार्थिव ||
३७ ख
भीष्म उवाच:
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा राजा भृत्यानथाव्रवीत् |
३८ क
भीष्म उवाच:
यद्यद्व्रूय़ान्मुनिस्तत्तत्सर्वं देय़मशङ्कितैः ||
३८ ख
भीष्म उवाच:
ततो रत्नान्यनेकानि स्त्रिय़ो युग्यमजाविकम् |
३९ क
भीष्म उवाच:
कृताकृतं च कनकं गजेन्द्राश्चाचलोपमाः ||
३९ ख
भीष्म उवाच:
अन्वगच्छन्त तमृषिं राजामात्याश्च सर्वशः |
४० क
भीष्म उवाच:
हाहाभूतं च तत्सर्वमासीन्नगरमार्तिमत् ||
४० ख
भीष्म उवाच:
तौ तीक्ष्णाग्रेण सहसा प्रतोदेन प्रचोदितौ |
४१ क
भीष्म उवाच:
पृष्ठे विद्धौ कटे चैव निर्विकारौ तमूहतुः ||
४१ ख
भीष्म उवाच:
वेपमानौ विराहारौ पञ्चाशद्रात्रकर्शितौ |
४२ क
भीष्म उवाच:
कथञ्चिदूहतुर्वीरौ दम्पती तं रथोत्तमम् ||
४२ ख
भीष्म उवाच:
वहुशो भृशविद्धौ तौ क्षरमाणौ क्षतोद्भवम् |
४३ क
भीष्म उवाच:
ददृशाते महाराज पुष्पिताविव किंशुकौ ||
४३ ख
भीष्म उवाच:
तौ दृष्ट्वा पौरवर्गस्तु भृशं शोकपराय़णः |
४४ क
भीष्म उवाच:
अभिशापभय़ात्त्रस्तो न च किञ्चिदुवाच ह ||
४४ ख
भीष्म उवाच:
द्वन्द्वशश्चाव्रुवन्सर्वे पश्यध्वं तपसो वलम् |
४५ क
भीष्म उवाच:
क्रुद्धा अपि मुनिश्रेष्ठं वीक्षितुं नैव शक्नुमः ||
४५ ख
भीष्म उवाच:
अहो भगवतो वीर्यं महर्षेर्भावितात्मनः |
४६ क
भीष्म उवाच:
राज्ञश्चापि सभार्यस्य धैर्यं पश्यत यादृशम् ||
४६ ख
भीष्म उवाच:
श्रान्तावपि हि कृच्छ्रेण रथमेतं समूहतुः |
४७ क
भीष्म उवाच:
न चैतय़ोर्विकारं वै ददर्श भृगुनन्दनः ||
४७ ख
भीष्म उवाच:
ततः स निर्विकारौ तौ दृष्ट्वा भृगुकुलोद्वहः |
४८ क
भीष्म उवाच:
वसु विश्राणय़ामास यथा वैश्रवणस्तथा ||
४८ ख
भीष्म उवाच:
तत्रापि राजा प्रीतात्मा यथाज्ञप्तमथाकरोत् |
४९ क
भीष्म उवाच:
ततोऽस्य भगवान्प्रीतो वभूव मुनिसत्तमः ||
४९ ख