chevron_left अनुशासन पर्व अध्याय ५३
भीष्म उवाच:
अवतीर्य रथश्रेष्ठाद्दम्पती तौ मुमोच ह |
५० क
भीष्म उवाच:
विमोच्य चैतौ विधिवत्ततो वाक्यमुवाच ह ||
५० ख
भीष्म उवाच:
स्निग्धगम्भीरय़ा वाचा भार्गवः सुप्रसन्नय़ा |
५१ क
भीष्म उवाच:
ददानि वां वरं श्रेष्ठं तद्व्रूतामिति भारत ||
५१ ख
भीष्म उवाच:
सुकुमारौ च तौ विद्वान्कराभ्यां मुनिसत्तमः |
५२ क
भीष्म उवाच:
पस्पर्शामृतकल्पाभ्यां स्नेहाद्भरतसत्तम ||
५२ ख
भीष्म उवाच:
अथाव्रवीन्नृपो वाक्यं श्रमो नास्त्यावय़ोरिह |
५३ क
भीष्म उवाच:
विश्रान्तौ स्वः प्रभावात्ते ध्यानेनैवेति भार्गव ||
५३ ख
भीष्म उवाच:
अथ तौ भगवान्प्राह प्रहृष्टश्च्यवनस्तदा |
५४ क
भीष्म उवाच:
न वृथा व्याहृतं पूर्वं यन्मय़ा तद्भविष्यति ||
५४ ख
भीष्म उवाच:
रमणीय़ः समुद्देशो गङ्गातीरमिदं शुभम् |
५५ क
भीष्म उवाच:
कञ्चित्कालं व्रतपरो निवत्स्यामीह पार्थिव ||
५५ ख
भीष्म उवाच:
गम्यतां स्वपुरं पुत्र विश्रान्तः पुनरेष्यसि |
५६ क
भीष्म उवाच:
इहस्थं मां सभार्यस्त्वं द्रष्टासि श्वो नराधिप ||
५६ ख
भीष्म उवाच:
न च मन्युस्त्वय़ा कार्यः श्रेय़स्ते समुपस्थितम् |
५७ क
भीष्म उवाच:
यत्काङ्क्षितं हृदिस्थं ते तत्सर्वं सम्भविष्यति ||
५७ ख
भीष्म उवाच:
इत्येवमुक्तः कुशिकः प्रहृष्टेनान्तरात्मना |
५८ क
भीष्म उवाच:
प्रोवाच मुनिशार्दूलमिदं वचनमर्थवत् ||
५८ ख
भीष्म उवाच:
न मे मन्युर्महाभाग पूतोऽस्मि भगवंस्त्वय़ा |
५९ क
भीष्म उवाच:
संवृत्तौ यौवनस्थौ स्वो वपुष्मन्तौ वलान्वितौ ||
५९ ख
भीष्म उवाच:
प्रतोदेन व्रणा ये मे सभार्यस्य कृतास्त्वय़ा |
६० क
भीष्म उवाच:
तान्न पश्यामि गात्रेषु स्वस्थोऽस्मि सह भार्यया ||
६० ख
भीष्म उवाच:
इमां च देवीं पश्यामि मुने दिव्याप्सरोपमाम् |
६१ क
भीष्म उवाच:
श्रिय़ा परमय़ा युक्तां यथादृष्टां मय़ा पुरा ||
६१ ख
भीष्म उवाच:
तव प्रसादात्संवृत्तमिदं सर्वं महामुने |
६२ क
भीष्म उवाच:
नैतच्चित्रं तु भगवंस्त्वय़ि सत्यपराक्रम ||
६२ ख
भीष्म उवाच:
इत्युक्तः प्रत्युवाचेदं च्यवनः कुशिकं तदा |
६३ क
भीष्म उवाच:
आगच्छेथाः सभार्यश्च त्वमिहेति नराधिप ||
६३ ख
भीष्म उवाच:
इत्युक्तः समनुज्ञातो राजर्षिरभिवाद्य तम् |
६४ क
भीष्म उवाच:
प्रय़यौ वपुषा युक्तो नगरं देवराजवत् ||
६४ ख
भीष्म उवाच:
तत एनमुपाजग्मुरमात्याः सपुरोहिताः |
६५ क
भीष्म उवाच:
वलस्था गणिकाय़ुक्ताः सर्वाः प्रकृतय़स्तथा ||
६५ ख
भीष्म उवाच:
तैर्वृतः कुशिको राजा श्रिय़ा परमय़ा ज्वलन् |
६६ क
भीष्म उवाच:
प्रविवेश पुरं हृष्टः पूज्यमानोऽथ वन्दिभिः ||
६६ ख
भीष्म उवाच:
ततः प्रविश्य नगरं कृत्वा सर्वाह्णिकक्रिय़ाः |
६७ क
भीष्म उवाच:
भुक्त्वा सभार्यो रजनीमुवास स महीपतिः ||
६७ ख
भीष्म उवाच:
ततस्तु तौ नवमभिवीक्ष्य यौवनं; परस्परं विगतजराविवामरौ |
६८ क
भीष्म उवाच:
ननन्दतुः शय़नगतौ वपुर्धरौ; श्रिय़ा युतौ द्विजवरदत्तय़ा तय़ा ||
६८ ख
भीष्म उवाच:
स चाप्यृषिर्भृगुकुलकीर्तिवर्धन; स्तपोधनो वनमभिराममृद्धिमत् |
६९ क
भीष्म उवाच:
मनीषय़ा वहुविधरत्नभूषितं; ससर्ज यन्नास्ति शतक्रतोरपि ||
६९ ख