chevron_left उद्योग पर्व अध्याय ५४
दुर्योधन उवाच:
अय़ोनिजं त्रय़ं ह्येतत्पिता माता च मातुलः |
४९ क
दुर्योधन उवाच:
अश्वत्थाम्नो महाराज स च शूरः स्थितो मम ||
४९ ख
दुर्योधन उवाच:
सर्व एते महाराज देवकल्पा महारथाः |
५० क
दुर्योधन उवाच:
शक्रस्यापि व्यथां कुर्युः संय़ुगे भरतर्षभ ||
५० ख
दुर्योधन उवाच:
भीष्मद्रोणकृपाणां च तुल्यः कर्णो मतो मम |
५१ क
दुर्योधन उवाच:
अनुज्ञातश्च रामेण मत्समोऽसीति भारत ||
५१ ख
दुर्योधन उवाच:
कुण्डले रुचिरे चास्तां कर्णस्य सहजे शुभे |
५२ क
दुर्योधन उवाच:
ते शच्यर्थे महेन्द्रेण याचितः स परन्तपः |
५२ ख
दुर्योधन उवाच:
अमोघय़ा महाराज शक्त्या परमभीमय़ा ||
५२ ग
दुर्योधन उवाच:
तस्य शक्त्योपगूढस्य कस्माज्जीवेद्धनञ्जय़ः |
५३ क
दुर्योधन उवाच:
विजय़ो मे ध्रुवं राजन्फलं पाणाविवाहितम् |
५३ ख
दुर्योधन उवाच:
अभिव्यक्तः परेषां च कृत्स्नो भुवि पराजय़ः ||
५३ ग
दुर्योधन उवाच:
अह्ना ह्येकेन भीष्मोऽय़मय़ुतं हन्ति भारत |
५४ क
दुर्योधन उवाच:
तत्समाश्च महेष्वासा द्रोणद्रौणिकृपा अपि ||
५४ ख
दुर्योधन उवाच:
संशप्तानि च वृन्दानि क्षत्रिय़ाणां परन्तप |
५५ क
दुर्योधन उवाच:
अर्जुनं वय़मस्मान्वा धनञ्जय़ इति स्म ह ||
५५ ख
दुर्योधन उवाच:
तांश्चालमिति मन्यन्ते सव्यसाचिवधे विभो |
५६ क
दुर्योधन उवाच:
पार्थिवाः स भवान्राजन्नकस्माद्व्यथते कथम् ||
५६ ख
दुर्योधन उवाच:
भीमसेने च निहते कोऽन्यो युध्येत भारत |
५७ क
दुर्योधन उवाच:
परेषां तन्ममाचक्ष्व यदि वेत्थ परन्तप ||
५७ ख
दुर्योधन उवाच:
पञ्च ते भ्रातरः सर्वे धृष्टद्युम्नोऽथ सात्यकिः |
५८ क
दुर्योधन उवाच:
परेषां सप्त ये राजन्योधाः परमकं वलम् ||
५८ ख
दुर्योधन उवाच:
अस्माकं तु विशिष्टा ये भीष्मद्रोणकृपादय़ः |
५९ क
दुर्योधन उवाच:
द्रौणिर्वैकर्तनः कर्णः सोमदत्तोऽथ वाह्लिकः ||
५९ ख
दुर्योधन उवाच:
प्राग्ज्योतिषाधिपः शल्य आवन्त्योऽथ जय़द्रथः |
६० क
दुर्योधन उवाच:
दुःशासनो दुर्मुखश्च दुःसहश्च विशां पते ||
६० ख
दुर्योधन उवाच:
श्रुताय़ुश्चित्रसेनश्च पुरुमित्रो विविंशतिः |
६१ क
दुर्योधन उवाच:
शलो भूरिश्रवाश्चोभौ विकर्णश्च तवात्मजः ||
६१ ख
दुर्योधन उवाच:
अक्षौहिण्यो हि मे राजन्दशैका च समाहृताः |
६२ क
दुर्योधन उवाच:
न्यूनाः परेषां सप्तैव कस्मान्मे स्यात्पराजय़ः ||
६२ ख
दुर्योधन उवाच:
वलं त्रिगुणतो हीनं योध्यं प्राह वृहस्पतिः |
६३ क
दुर्योधन उवाच:
परेभ्यस्त्रिगुणा चेय़ं मम राजन्ननीकिनी ||
६३ ख
दुर्योधन उवाच:
गुणहीनं परेषां च वहु पश्यामि भारत |
६४ क
दुर्योधन उवाच:
गुणोदय़ं वहुगुणमात्मनश्च विशां पते ||
६४ ख
दुर्योधन उवाच:
एतत्सर्वं समाज्ञाय़ वलाग्र्यं मम भारत |
६५ क
दुर्योधन उवाच:
न्यूनतां पाण्डवानां च न मोहं गन्तुमर्हसि ||
६५ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
इत्युक्त्वा सञ्जय़ं भूय़ः पर्यपृच्छत भारत |
६६ क
वैशम्पाय़न उवाच:
विधित्सुः प्राप्तकालानि ज्ञात्वा परपुरञ्जय़ः ||
६६ ख