chevron_left आदि पर्व अध्याय ५४
सूत उवाच:
श्रुत्वा तु सर्पसत्राय़ दीक्षितं जनमेजय़म् |
१ क
सूत उवाच:
अभ्यागच्छदृषिर्विद्वान्कृष्णद्वैपाय़नस्तदा ||
१ ख
सूत उवाच:
जनय़ामास यं काली शक्तेः पुत्रात्पराशरात् |
२ क
सूत उवाच:
कन्यैव यमुनाद्वीपे पाण्डवानां पितामहम् ||
२ ख
सूत उवाच:
जातमात्रश्च यः सद्य इष्ट्या देहमवीवृधत् |
३ क
सूत उवाच:
वेदांश्चाधिजगे साङ्गान्सेतिहासान्महाय़शाः ||
३ ख
सूत उवाच:
यं नातितपसा कश्चिन्न वेदाध्ययनेन च |
४ क
सूत उवाच:
न व्रतैर्नोपवासैश्च न प्रसूत्या न मन्युना ||
४ ख
सूत उवाच:
विव्यासैकं चतुर्धा यो वेदं वेदविदां वरः |
५ क
सूत उवाच:
परावरज्ञो व्रह्मर्षिः कविः सत्यव्रतः शुचिः ||
५ ख
सूत उवाच:
यः पाण्डुं धृतराष्ट्रं च विदुरं चाप्यजीजनत् |
६ क
सूत उवाच:
शन्तनोः सन्ततिं तन्वन्पुण्यकीर्तिर्महाय़शाः ||
६ ख
सूत उवाच:
जनमेजय़स्य राजर्षेः स तद्यज्ञसदस्तदा |
७ क
सूत उवाच:
विवेश शिष्यैः सहितो वेदवेदाङ्गपारगैः ||
७ ख
सूत उवाच:
तत्र राजानमासीनं ददर्श जनमेजय़म् |
८ क
सूत उवाच:
वृतं सदस्यैर्वहुभिर्देवैरिव पुरन्दरम् ||
८ ख
सूत उवाच:
तथा मूर्धावसिक्तैश्च नानाजनपदेश्वरैः |
९ क
सूत उवाच:
ऋत्विग्भिर्देवकल्पैश्च कुशलैर्यज्ञसंस्तरे ||
९ ख
सूत उवाच:
जनमेजय़स्तु राजर्षिर्दृष्ट्वा तमृषिमागतम् |
१० क
सूत उवाच:
सगणोऽव्युद्ययौ तूर्णं प्रीत्या भरतसत्तमः ||
१० ख
सूत उवाच:
काञ्चनं विष्टरं तस्मै सदस्यानुमते प्रभुः |
११ क
सूत उवाच:
आसनं कल्पय़ामास यथा शक्रो वृहस्पतेः ||
११ ख
सूत उवाच:
तत्रोपविष्टं वरदं देवर्षिगणपूजितम् |
१२ क
सूत उवाच:
पूजय़ामास राजेन्द्रः शास्त्रदृष्टेन कर्मणा ||
१२ ख
सूत उवाच:
पाद्यमाचमनीय़ं च अर्घ्यं गां च विधानतः |
१३ क
सूत उवाच:
पितामहाय़ कृष्णाय़ तदर्हाय़ न्यवेदय़त् ||
१३ ख
सूत उवाच:
प्रतिगृह्य च तां पूजां पाण्डवाज्जनमेजय़ात् |
१४ क
सूत उवाच:
गां चैव समनुज्ञाय़ व्यासः प्रीतोऽभवत्तदा ||
१४ ख
सूत उवाच:
तथा सम्पूजय़ित्वा तं यत्नेन प्रपितामहम् |
१५ क
सूत उवाच:
उपोपविश्य प्रीतात्मा पर्यपृच्छदनामय़म् ||
१५ ख
सूत उवाच:
भगवानपि तं दृष्ट्वा कुशलं प्रतिवेद्य च |
१६ क
सूत उवाच:
सदस्यैः पूजितः सर्वैः सदस्यानभ्यपूजय़त् ||
१६ ख
सूत उवाच:
ततस्तं सत्कृतं सर्वैः सदस्यैर्जनमेजय़ः |
१७ क
सूत उवाच:
इदं पश्चाद्द्विजश्रेष्ठं पर्यपृच्छत्कृताञ्जलिः ||
१७ ख
सूत उवाच:
कुरूणां पाण्डवानां च भवान्प्रत्यक्षदर्शिवान् |
१८ क
सूत उवाच:
तेषां चरितमिच्छामि कथ्यमानं त्वय़ा द्विज ||
१८ ख
सूत उवाच:
कथं समभवद्भेदस्तेषामक्लिष्टकर्मणाम् |
१९ क
सूत उवाच:
तच्च युद्धं कथं वृत्तं भूतान्तकरणं महत् ||
१९ ख
सूत उवाच:
पितामहानां सर्वेषां दैवेनाविष्टचेतसाम् |
२० क
सूत उवाच:
कार्त्स्न्येनैतत्समाचक्ष्व भगवन्कुशलो ह्यसि ||
२० ख
सूत उवाच:
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा कृष्णद्वैपाय़नस्तदा |
२१ क
सूत उवाच:
शशास शिष्यमासीनं वैशम्पाय़नमन्तिके ||
२१ ख
सूत उवाच:
कुरूणां पाण्डवानां च यथा भेदोऽभवत्पुरा |
२२ क
सूत उवाच:
तदस्मै सर्वमाचक्ष्व यन्मत्तः श्रुतवानसि ||
२२ ख
सूत उवाच:
गुरोर्वचनमाज्ञाय़ स तु विप्रर्षभस्तदा |
२३ क
सूत उवाच:
आचचक्षे ततः सर्वमितिहासं पुरातनम् ||
२३ ख
सूत उवाच:
तस्मै राज्ञे सदस्येभ्यः क्षत्रिय़ेभ्यश्च सर्वशः |
२४ क
सूत उवाच:
भेदं राज्यविनाशं च कुरुपाण्डवय़ोस्तदा ||
२४ ख