chevron_left शल्य पर्व अध्याय ५४
वैशम्पाय़न उवाच:
एवं तदभवद्युद्धं तुमुलं जनमेजय़ |
१ क
वैशम्पाय़न उवाच:
यत्र दुःखान्वितो राजा धृतराष्ट्रोऽव्रवीदिदम् ||
१ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
रामं संनिहितं दृष्ट्वा गदाय़ुद्ध उपस्थिते |
२ क
वैशम्पाय़न उवाच:
मम पुत्रः कथं भीमं प्रत्ययुध्यत सञ्जय़ ||
२ ख
सञ्जय़ उवाच:
रामसांनिध्यमासाद्य पुत्रो दुर्योधनस्तव |
३ क
सञ्जय़ उवाच:
युद्धकामो महावाहुः समहृष्यत वीर्यवान् ||
३ ख
सञ्जय़ उवाच:
दृष्ट्वा लाङ्गलिनं राजा प्रत्युत्थाय़ च भारत |
४ क
सञ्जय़ उवाच:
प्रीत्या परमय़ा युक्तो युधिष्ठिरमथाव्रवीत् ||
४ ख
सञ्जय़ उवाच:
समन्तपञ्चकं क्षिप्रमितो याम विशां पते |
५ क
सञ्जय़ उवाच:
प्रथितोत्तरवेदी सा देवलोके प्रजापतेः ||
५ ख
सञ्जय़ उवाच:
तस्मिन्महापुण्यतमे त्रैलोक्यस्य सनातने |
६ क
सञ्जय़ उवाच:
सङ्ग्रामे निधनं प्राप्य ध्रुवं स्वर्गो भविष्यति ||
६ ख
सञ्जय़ उवाच:
तथेत्युक्त्वा महाराज कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः |
७ क
सञ्जय़ उवाच:
समन्तपञ्चकं वीरः प्राय़ादभिमुखः प्रभुः ||
७ ख
सञ्जय़ उवाच:
ततो दुर्योधनो राजा प्रगृह्य महतीं गदाम् |
८ क
सञ्जय़ उवाच:
पद्भ्याममर्षाद्द्युतिमानगच्छत्पाण्डवैः सह ||
८ ख
सञ्जय़ उवाच:
तथा यान्तं गदाहस्तं वर्मणा चापि दंशितम् |
९ क
सञ्जय़ उवाच:
अन्तरिक्षगता देवाः साधु साध्वित्यपूजय़न् |
९ ख
सञ्जय़ उवाच:
वातिकाश्च नरा येऽत्र दृष्ट्वा ते हर्षमागताः ||
९ ग
सञ्जय़ उवाच:
स पाण्डवैः परिवृतः कुरुराजस्तवात्मजः |
१० क
सञ्जय़ उवाच:
मत्तस्येव गजेन्द्रस्य गतिमास्थाय़ सोऽव्रजत् ||
१० ख
सञ्जय़ उवाच:
ततः शङ्खनिनादेन भेरीणां च महास्वनैः |
११ क
सञ्जय़ उवाच:
सिंहनादैश्च शूराणां दिशः सर्वाः प्रपूरिताः ||
११ ख
सञ्जय़ उवाच:
प्रतीच्यभिमुखं देशं यथोद्दिष्टं सुतेन ते |
१२ क
सञ्जय़ उवाच:
गत्वा च तैः परिक्षिप्तं समन्तात्सर्वतोदिशम् ||
१२ ख
सञ्जय़ उवाच:
दक्षिणेन सरस्वत्याः स्वय़नं तीर्थमुत्तमम् |
१३ क
सञ्जय़ उवाच:
तस्मिन्देशे त्वनिरिणे तत्र युद्धमरोचय़न् ||
१३ ख
सञ्जय़ उवाच:
ततो भीमो महाकोटिं गदां गृह्याथ वर्मभृत् |
१४ क
सञ्जय़ उवाच:
विभ्रद्रूपं महाराज सदृशं हि गरुत्मतः ||
१४ ख
सञ्जय़ उवाच:
अववद्धशिरस्त्राणः सङ्ख्ये काञ्चनवर्मभृत् |
१५ क
सञ्जय़ उवाच:
रराज राजन्पुत्रस्ते काञ्चनः शैलराडिव ||
१५ ख
सञ्जय़ उवाच:
वर्मभ्यां संवृतौ वीरौ भीमदुर्योधनावुभौ |
१६ क
सञ्जय़ उवाच:
संय़ुगे च प्रकाशेते संरव्धाविव कुञ्जरौ ||
१६ ख
सञ्जय़ उवाच:
रणमण्डलमध्यस्थौ भ्रातरौ तौ नरर्षभौ |
१७ क
सञ्जय़ उवाच:
अशोभेतां महाराज चन्द्रसूर्याविवोदितौ ||
१७ ख
सञ्जय़ उवाच:
तावन्योन्यं निरीक्षेतां क्रुद्धाविव महाद्विपौ |
१८ क
सञ्जय़ उवाच:
दहन्तौ लोचनै राजन्परस्परवधैषिणौ ||
१८ ख
सञ्जय़ उवाच:
सम्प्रहृष्टमना राजन्गदामादाय़ कौरवः |
१९ क
सञ्जय़ उवाच:
सृक्किणी संलिहन्राजन्क्रोधरक्तेक्षणः श्वसन् ||
१९ ख
सञ्जय़ उवाच:
ततो दुर्योधनो राजा गदामादाय़ वीर्यवान् |
२० क
सञ्जय़ उवाच:
भीमसेनमभिप्रेक्ष्य गजो गजमिवाह्वय़त् ||
२० ख
सञ्जय़ उवाच:
अद्रिसारमय़ीं भीमस्तथैवादाय़ वीर्यवान् |
२१ क
सञ्जय़ उवाच:
आह्वय़ामास नृपतिं सिंहः सिंहं यथा वने ||
२१ ख
सञ्जय़ उवाच:
तावुद्यतगदापाणी दुर्योधनवृकोदरौ |
२२ क
सञ्जय़ उवाच:
संय़ुगे स्म प्रकाशेते गिरी सशिखराविव ||
२२ ख
सञ्जय़ उवाच:
तावुभावभिसङ्क्रुद्धावुभौ भीमपराक्रमौ |
२३ क
सञ्जय़ उवाच:
उभौ शिष्यौ गदाय़ुद्धे रौहिणेय़स्य धीमतः ||
२३ ख
सञ्जय़ उवाच:
उभौ सदृशकर्माणौ यमवासवय़ोरिव |
२४ क
सञ्जय़ उवाच:
तथा सदृशकर्माणौ वरुणस्य महावलौ ||
२४ ख
सञ्जय़ उवाच:
वासुदेवस्य रामस्य तथा वैश्रवणस्य च |
२५ क
सञ्जय़ उवाच:
सदृशौ तौ महाराज मधुकैटभय़ोर्युधि ||
२५ ख
सञ्जय़ उवाच:
उभौ सदृशकर्माणौ रणे सुन्दोपसुन्दय़ोः |
२६ क
सञ्जय़ उवाच:
तथैव कालस्य समौ मृत्योश्चैव परन्तपौ ||
२६ ख
सञ्जय़ उवाच:
अन्योन्यमभिधावन्तौ मत्ताविव महाद्विपौ |
२७ क
सञ्जय़ उवाच:
वाशितासङ्गमे दृप्तौ शरदीव मदोत्कटौ ||
२७ ख
सञ्जय़ उवाच:
मत्ताविव जिगीषन्तौ मातङ्गौ भरतर्षभौ |
२८ क
सञ्जय़ उवाच:
उभौ क्रोधविषं दीप्तं वमन्तावुरगाविव ||
२८ ख
सञ्जय़ उवाच:
अन्योन्यमभिसंरव्धौ प्रेक्षमाणावरिन्दमौ |
२९ क
सञ्जय़ उवाच:
उभौ भरतशार्दूलौ विक्रमेण समन्वितौ ||
२९ ख
सञ्जय़ उवाच:
सिंहाविव दुराधर्षौ गदाय़ुद्धे परन्तपौ |
३० क
सञ्जय़ उवाच:
नखदंष्ट्राय़ुधौ वीरौ व्याघ्राविव दुरुत्सहौ ||
३० ख
सञ्जय़ उवाच:
प्रजासंहरणे क्षुव्धौ समुद्राविव दुस्तरौ |
३१ क
सञ्जय़ उवाच:
लोहिताङ्गाविव क्रुद्धौ प्रतपन्तौ महारथौ ||
३१ ख
सञ्जय़ उवाच:
रश्मिमन्तौ महात्मानौ दीप्तिमन्तौ महावलौ |
३२ क
सञ्जय़ उवाच:
ददृशाते कुरुश्रेष्ठौ कालसूर्याविवोदितौ ||
३२ ख
सञ्जय़ उवाच:
व्याघ्राविव सुसंरव्धौ गर्जन्ताविव तोय़दौ |
३३ क
सञ्जय़ उवाच:
जहृषाते महावाहू सिंहौ केसरिणाविव ||
३३ ख
सञ्जय़ उवाच:
गजाविव सुसंरव्धौ ज्वलिताविव पावकौ |
३४ क
सञ्जय़ उवाच:
ददृशुस्तौ महात्मानौ सशृङ्गाविव पर्वतौ ||
३४ ख
सञ्जय़ उवाच:
रोषात्प्रस्फुरमाणोष्ठौ निरीक्षन्तौ परस्परम् |
३५ क
सञ्जय़ उवाच:
तौ समेतौ महात्मानौ गदाहस्तौ नरोत्तमौ ||
३५ ख
सञ्जय़ उवाच:
उभौ परमसंहृष्टावुभौ परमसंमतौ |
३६ क
सञ्जय़ उवाच:
सदश्वाविव हेषन्तौ वृंहन्ताविव कुञ्जरौ ||
३६ ख
सञ्जय़ उवाच:
वृषभाविव गर्जन्तौ दुर्योधनवृकोदरौ |
३७ क
सञ्जय़ उवाच:
दैत्याविव वलोन्मत्तौ रेजतुस्तौ नरोत्तमौ ||
३७ ख
सञ्जय़ उवाच:
ततो दुर्योधनो राजन्निदमाह युधिष्ठिरम् |
३८ क
सञ्जय़ उवाच:
सृञ्जय़ैः सह तिष्ठन्तं तपन्तमिव भास्करम् ||
३८ ख
सञ्जय़ उवाच:
इदं व्यवसितं युद्धं मम भीमस्य चोभय़ोः |
३९ क
सञ्जय़ उवाच:
उपोपविष्टाः पश्यध्वं विमर्दं नृपसत्तमाः ||
३९ ख
सञ्जय़ उवाच:
ततः समुपविष्टं तत्सुमहद्राजमण्डलम् |
४० क
सञ्जय़ उवाच:
विराजमानं ददृशे दिवीवादित्यमण्डलम् ||
४० ख
सञ्जय़ उवाच:
तेषां मध्ये महावाहुः श्रीमान्केशवपूर्वजः |
४१ क
सञ्जय़ उवाच:
उपविष्टो महाराज पूज्यमानः समन्ततः ||
४१ ख
सञ्जय़ उवाच:
शुशुभे राजमध्यस्थो नीलवासाः सितप्रभः |
४२ क
सञ्जय़ उवाच:
नक्षत्रैरिव सम्पूर्णो वृतो निशि निशाकरः ||
४२ ख
सञ्जय़ उवाच:
तौ तथा तु महाराज गदाहस्तौ दुरासदौ |
४३ क
सञ्जय़ उवाच:
अन्योन्यं वाग्भिरुग्राभिस्तक्षमाणौ व्यवस्थितौ ||
४३ ख
सञ्जय़ उवाच:
अप्रिय़ाणि ततोऽन्योन्यमुक्त्वा तौ कुरुपुङ्गवौ |
४४ क
सञ्जय़ उवाच:
उदीक्षन्तौ स्थितौ वीरौ वृत्रशक्राविवाहवे ||
४४ ख