chevron_left शान्ति पर्व अध्याय ५७
भीष्म उवाच:
नित्योद्युक्तेन वै राज्ञा भवितव्यं युधिष्ठिर |
१ क
भीष्म उवाच:
प्रशाम्यते च राजा हि नारीवोद्यमवर्जितः ||
१ ख
भीष्म उवाच:
भगवानुशना चाह श्लोकमत्र विशां पते |
२ क
भीष्म उवाच:
तमिहैकमना राजन्गदतस्त्वं निवोध मे ||
२ ख
भीष्म उवाच:
द्वावेतौ ग्रसते भूमिः सर्पो विलशय़ानिव |
३ क
भीष्म उवाच:
राजानं चाविरोद्धारं व्राह्मणं चाप्रवासिनम् ||
३ ख
भीष्म उवाच:
तदेतन्नरशार्दूल हृदि त्वं कर्तुमर्हसि |
४ क
भीष्म उवाच:
सन्धेय़ानपि सन्धत्स्व विरोध्यांश्च विरोधय़ ||
४ ख
भीष्म उवाच:
सप्ताङ्गे यश्च ते राज्ये वैपरीत्यं समाचरेत् |
५ क
भीष्म उवाच:
गुरुर्वा यदि वा मित्रं प्रतिहन्तव्य एव सः ||
५ ख
भीष्म उवाच:
मरुत्तेन हि राज्ञाय़ं गीतः श्लोकः पुरातनः |
६ क
भीष्म उवाच:
राज्याधिकारे राजेन्द्र वृहस्पतिमतः पुरा ||
६ ख
भीष्म उवाच:
गुरोरप्यवलिप्तस्य कार्याकार्यमजानतः |
७ क
भीष्म उवाच:
उत्पथप्रतिपन्नस्य परित्यागो विधीय़ते ||
७ ख
भीष्म उवाच:
वाहोः पुत्रेण राज्ञा च सगरेणेह धीमता |
८ क
भीष्म उवाच:
असमञ्जाः सुतो ज्येष्ठस्त्यक्तः पौरहितैषिणा ||
८ ख
भीष्म उवाच:
असमञ्जाः सरय़्वां प्राक्पौराणां वालकान्नृप |
९ क
भीष्म उवाच:
न्यमज्जय़दतः पित्रा निर्भर्त्स्य स विवासितः ||
९ ख
भीष्म उवाच:
ऋषिणोद्दालकेनापि श्वेतकेतुर्महातपाः |
१० क
भीष्म उवाच:
मिथ्या विप्रानुपचरन्सन्त्यक्तो दय़ितः सुतः ||
१० ख
भीष्म उवाच:
लोकरञ्जनमेवात्र राज्ञां धर्मः सनातनः |
११ क
भीष्म उवाच:
सत्यस्य रक्षणं चैव व्यवहारस्य चार्जवम् ||
११ ख
भीष्म उवाच:
न हिंस्यात्परवित्तानि देय़ं काले च दापय़ेत् |
१२ क
भीष्म उवाच:
विक्रान्तः सत्यवाक्क्षान्तो नृपो न चलते पथः ||
१२ ख
भीष्म उवाच:
गुप्तमन्त्रो जितक्रोधो शास्त्रार्थगतनिश्चय़ः |
१३ क
भीष्म उवाच:
धर्मे चार्थे च कामे च मोक्षे च सततं रतः ||
१३ ख
भीष्म उवाच:
त्रय़्या संवृतरन्ध्रश्च राजा भवितुमर्हति |
१४ क
भीष्म उवाच:
वृजिनस्य नरेन्द्राणां नान्यत्संवरणात्परम् ||
१४ ख
भीष्म उवाच:
चातुर्वर्ण्यस्य धर्माश्च रक्षितव्या महीक्षिता |
१५ क
भीष्म उवाच:
धर्मसङ्कररक्षा हि राज्ञां धर्मः सनातनः ||
१५ ख
भीष्म उवाच:
न विश्वसेच्च नृपतिर्न चात्यर्थं न विश्वसेत् |
१६ क
भीष्म उवाच:
षाड्गुण्यगुणदोषांश्च नित्यं वुद्ध्यावलोकय़ेत् ||
१६ ख
भीष्म उवाच:
द्विट्छिद्रदर्शी नृपतिर्नित्यमेव प्रशस्यते |
१७ क
भीष्म उवाच:
त्रिवर्गविदितार्थश्च युक्तचारोपधिश्च यः ||
१७ ख
भीष्म उवाच:
कोशस्योपार्जनरतिर्यमवैश्रवणोपमः |
१८ क
भीष्म उवाच:
वेत्ता च दशवर्गस्य स्थानवृद्धिक्षय़ात्मनः ||
१८ ख
भीष्म उवाच:
अभृतानां भवेद्भर्ता भृतानां चान्ववेक्षकः |
१९ क
भीष्म उवाच:
नृपतिः सुमुखश्च स्यात्स्मितपूर्वाभिभाषिता ||
१९ ख
भीष्म उवाच:
उपासिता च वृद्धानां जिततन्द्रीरलोलुपः |
२० क
भीष्म उवाच:
सतां वृत्ते स्थितमतिः सन्तो ह्याचारदर्शिनः ||
२० ख
भीष्म उवाच:
न चाददीत वित्तानि सतां हस्तात्कदाचन |
२१ क
भीष्म उवाच:
असद्भ्यस्तु समादद्यात्सद्भ्यः सम्प्रतिपादय़ेत् ||
२१ ख
भीष्म उवाच:
स्वय़ं प्रहर्तादाता च वश्यात्मा वश्यसाधनः |
२२ क
भीष्म उवाच:
काले दाता च भोक्ता च शुद्धाचारस्तथैव च ||
२२ ख
भीष्म उवाच:
शूरान्भक्तानसंहार्यान्कुले जातानरोगिणः |
२३ क
भीष्म उवाच:
शिष्टाञ्शिष्टाभिसम्वन्धान्मानिनो नावमानिनः ||
२३ ख
भीष्म उवाच:
विद्याविदो लोकविदः परलोकान्ववेक्षकान् |
२४ क
भीष्म उवाच:
धर्मेषु निरतान्साधूनचलानचलानिव ||
२४ ख
भीष्म उवाच:
सहाय़ान्सततं कुर्याद्राजा भूतिपुरस्कृतः |
२५ क
भीष्म उवाच:
तैस्तुल्यश्च भवेद्भोगैश्छत्रमात्राज्ञय़ाधिकः ||
२५ ख
भीष्म उवाच:
प्रत्यक्षा च परोक्षा च वृत्तिश्चास्य भवेत्सदा |
२६ क
भीष्म उवाच:
एवं कृत्वा नरेन्द्रो हि न खेदमिह विन्दति ||
२६ ख
भीष्म उवाच:
सर्वातिशङ्की नृपतिर्यश्च सर्वहरो भवेत् |
२७ क
भीष्म उवाच:
स क्षिप्रमनृजुर्लुव्धः स्वजनेनैव वाध्यते ||
२७ ख
भीष्म उवाच:
शुचिस्तु पृथिवीपालो लोकचित्तग्रहे रतः |
२८ क
भीष्म उवाच:
न पतत्यरिभिर्ग्रस्तः पतितश्चावतिष्ठते ||
२८ ख
भीष्म उवाच:
अक्रोधनोऽथाव्यसनी मृदुदण्डो जितेन्द्रिय़ः |
२९ क
भीष्म उवाच:
राजा भवति भूतानां विश्वास्यो हिमवानिव ||
२९ ख
भीष्म उवाच:
प्राज्ञो न्याय़गुणोपेतः पररन्ध्रेषु तत्परः |
३० क
भीष्म उवाच:
सुदर्शः सर्ववर्णानां नय़ापनय़वित्तथा ||
३० ख
भीष्म उवाच:
क्षिप्रकारी जितक्रोधः सुप्रसादो महामनाः |
३१ क
भीष्म उवाच:
अरोगप्रकृतिर्युक्तः क्रिय़ावानविकत्थनः ||
३१ ख
भीष्म उवाच:
आरव्धान्येव कार्याणि न पर्यवसितानि च |
३२ क
भीष्म उवाच:
यस्य राज्ञः प्रदृश्यन्ते स राजा राजसत्तमः ||
३२ ख
भीष्म उवाच:
पुत्रा इव पितुर्गेहे विषय़े यस्य मानवाः |
३३ क
भीष्म उवाच:
निर्भय़ा विचरिष्यन्ति स राजा राजसत्तमः ||
३३ ख
भीष्म उवाच:
अगूढविभवा यस्य पौरा राष्ट्रनिवासिनः |
३४ क
भीष्म उवाच:
नय़ापनय़वेत्तारः स राजा राजसत्तमः ||
३४ ख
भीष्म उवाच:
स्वकर्मनिरता यस्य जना विषय़वासिनः |
३५ क
भीष्म उवाच:
असङ्घातरता दान्ताः पाल्यमाना यथाविधि ||
३५ ख
भीष्म उवाच:
वश्या नेय़ा विनीताश्च न च सङ्घर्षशीलिनः |
३६ क
भीष्म उवाच:
विषय़े दानरुचय़ो नरा यस्य स पार्थिवः ||
३६ ख
भीष्म उवाच:
न यस्य कूटकपटं न माय़ा न च मत्सरः |
३७ क
भीष्म उवाच:
विषय़े भूमिपालस्य तस्य धर्मः सनातनः ||
३७ ख
भीष्म उवाच:
यः सत्करोति ज्ञानानि नेय़ः पौरहिते रतः |
३८ क
भीष्म उवाच:
सतां धर्मानुगस्त्यागी स राजा राज्यमर्हति ||
३८ ख
भीष्म उवाच:
यस्य चारश्च मन्त्रश्च नित्यं चैव कृताकृते |
३९ क
भीष्म उवाच:
न ज्ञाय़ते हि रिपुभिः स राजा राज्यमर्हति ||
३९ ख
भीष्म उवाच:
श्लोकश्चाय़ं पुरा गीतो भार्गवेण महात्मना |
४० क
भीष्म उवाच:
आख्याते रामचरिते नृपतिं प्रति भारत ||
४० ख
भीष्म उवाच:
राजानं प्रथमं विन्देत्ततो भार्यां ततो धनम् |
४१ क
भीष्म उवाच:
राजन्यसति लोकस्य कुतो भार्या कुतो धनम् ||
४१ ख
भीष्म उवाच:
तद्राजन्राजसिंहानां नान्यो धर्मः सनातनः |
४२ क
भीष्म उवाच:
ऋते रक्षां सुविस्पष्टां रक्षा लोकस्य धारणम् ||
४२ ख
भीष्म उवाच:
प्राचेतसेन मनुना श्लोकौ चेमावुदाहृतौ |
४३ क
भीष्म उवाच:
राजधर्मेषु राजेन्द्र ताविहैकमनाः शृणु ||
४३ ख
भीष्म उवाच:
षडेतान्पुरुषो जह्याद्भिन्नां नावमिवार्णवे |
४४ क
भीष्म उवाच:
अप्रवक्तारमाचार्यमनधीय़ानमृत्विजम् ||
४४ ख
भीष्म उवाच:
अरक्षितारं राजानं भार्यां चाप्रिय़वादिनीम् |
४५ क
भीष्म उवाच:
ग्रामकामं च गोपालं वनकामं च नापितम् ||
४५ ख