chevron_left शान्ति पर्व अध्याय ५९
भीष्म उवाच:
सप्ताङ्गस्य च राज्यस्य ह्रासवृद्धिसमञ्जसम् |
५१ क
भीष्म उवाच:
दूतसामर्थ्ययोगश्च राष्ट्रस्य च विवर्धनम् ||
५१ ख
भीष्म उवाच:
अरिमध्यस्थमित्राणां सम्यक्चोक्तं प्रपञ्चनम् |
५२ क
भीष्म उवाच:
अवमर्दः प्रतीघातस्तथैव च वलीय़साम् ||
५२ ख
भीष्म उवाच:
व्यवहारः सुसूक्ष्मश्च तथा कण्टकशोधनम् |
५३ क
भीष्म उवाच:
शमो व्याय़ामय़ोगश्च योगो द्रव्यस्य सञ्चय़ः ||
५३ ख
भीष्म उवाच:
अभृतानां च भरणं भृतानां चान्ववेक्षणम् |
५४ क
भीष्म उवाच:
अर्थकाले प्रदानं च व्यसनेष्वप्रसङ्गिता ||
५४ ख
भीष्म उवाच:
तथा राजगुणाश्चैव सेनापतिगुणाश्च ये |
५५ क
भीष्म उवाच:
कारणस्य च कर्तुश्च गुणदोषास्तथैव च ||
५५ ख
भीष्म उवाच:
दुष्टेङ्गितं च विविधं वृत्तिश्चैवानुजीविनाम् |
५६ क
भीष्म उवाच:
शङ्कितत्वं च सर्वस्य प्रमादस्य च वर्जनम् ||
५६ ख
भीष्म उवाच:
अलव्धलिप्सा लव्धस्य तथैव च विवर्धनम् |
५७ क
भीष्म उवाच:
प्रदानं च विवृद्धस्य पात्रेभ्यो विधिवत्तथा ||
५७ ख
भीष्म उवाच:
विसर्गोऽर्थस्य धर्मार्थमर्थार्थं कामहेतुना |
५८ क
भीष्म उवाच:
चतुर्थो व्यसनाघाते तथैवात्रानुवर्णितः ||
५८ ख
भीष्म उवाच:
क्रोधजानि तथोग्राणि कामजानि तथैव च |
५९ क
भीष्म उवाच:
दशोक्तानि कुरुश्रेष्ठ व्यसनान्यत्र चैव ह ||
५९ ख
भीष्म उवाच:
मृगय़ाक्षास्तथा पानं स्त्रिय़श्च भरतर्षभ |
६० क
भीष्म उवाच:
कामजान्याहुराचार्याः प्रोक्तानीह स्वय़म्भुवा ||
६० ख
भीष्म उवाच:
वाक्पारुष्यं तथोग्रत्वं दण्डपारुष्यमेव च |
६१ क
भीष्म उवाच:
आत्मनो निग्रहस्त्यागोऽथार्थदूषणमेव च ||
६१ ख
भीष्म उवाच:
यन्त्राणि विविधान्येव क्रिय़ास्तेषां च वर्णिताः |
६२ क
भीष्म उवाच:
अवमर्दः प्रतीघातः केतनानां च भञ्जनम् ||
६२ ख
भीष्म उवाच:
चैत्यद्रुमाणामामर्दो रोधःकर्मान्तनाशनम् |
६३ क
भीष्म उवाच:
अपस्करोऽथ गमनं तथोपास्या च वर्णिता ||
६३ ख
भीष्म उवाच:
पणवानकशङ्खानां भेरीणां च युधां वर |
६४ क
भीष्म उवाच:
उपार्जनं च द्रव्याणां परमर्म च तानि षट् ||
६४ ख
भीष्म उवाच:
लव्धस्य च प्रशमनं सतां चैव हि पूजनम् |
६५ क
भीष्म उवाच:
विद्वद्भिरेकीभावश्च प्रातर्होमविधिज्ञता ||
६५ ख
भीष्म उवाच:
मङ्गलालम्भनं चैव शरीरस्य प्रतिक्रिय़ा |
६६ क
भीष्म उवाच:
आहारय़ोजनं चैव नित्यमास्तिक्यमेव च ||
६६ ख
भीष्म उवाच:
एकेन च यथोत्थेय़ं सत्यत्वं मधुरा गिरः |
६७ क
भीष्म उवाच:
उत्सवानां समाजानां क्रिय़ाः केतनजास्तथा ||
६७ ख
भीष्म उवाच:
प्रत्यक्षा च परोक्षा च सर्वाधिकरणेषु च |
६८ क
भीष्म उवाच:
वृत्तिर्भरतशार्दूल नित्यं चैवान्ववेक्षणम् ||
६८ ख
भीष्म उवाच:
अदण्ड्यत्वं च विप्राणां युक्त्या दण्डनिपातनम् |
६९ क
भीष्म उवाच:
अनुजीविस्वजातिभ्यो गुणेषु परिरक्षणम् ||
६९ ख
भीष्म उवाच:
रक्षणं चैव पौराणां स्वराष्ट्रस्य विवर्धनम् |
७० क
भीष्म उवाच:
मण्डलस्था च या चिन्ता राजन्द्वादशराजिका ||
७० ख
भीष्म उवाच:
द्वासप्ततिमतिश्चैव प्रोक्ता या च स्वय़म्भुवा |
७१ क
भीष्म उवाच:
देशजातिकुलानां च धर्माः समनुवर्णिताः ||
७१ ख
भीष्म उवाच:
धर्मश्चार्थश्च कामश्च मोक्षश्चात्रानुवर्णितः |
७२ क
भीष्म उवाच:
उपाय़श्चार्थलिप्सा च विविधा भूरिदक्षिणाः ||
७२ ख
भीष्म उवाच:
मूलकर्मक्रिय़ा चात्र माय़ा योगश्च वर्णितः |
७३ क
भीष्म उवाच:
दूषणं स्रोतसामत्र वर्णितं च स्थिराम्भसाम् ||
७३ ख
भीष्म उवाच:
यैर्यैरुपाय़ैर्लोकश्च न चलेदार्यवर्त्मनः |
७४ क
भीष्म उवाच:
तत्सर्वं राजशार्दूल नीतिशास्त्रेऽनुवर्णितम् ||
७४ ख
भीष्म उवाच:
एतत्कृत्वा शुभं शास्त्रं ततः स भगवान्प्रभुः |
७५ क
भीष्म उवाच:
देवानुवाच संहृष्टः सर्वाञ्शक्रपुरोगमान् ||
७५ ख
भीष्म उवाच:
उपकाराय़ लोकस्य त्रिवर्गस्थापनाय़ च |
७६ क
भीष्म उवाच:
नवनीतं सरस्वत्या वुद्धिरेषा प्रभाविता ||
७६ ख
भीष्म उवाच:
दण्डेन सहिता ह्येषा लोकरक्षणकारिका |
७७ क
भीष्म उवाच:
निग्रहानुग्रहरता लोकाननु चरिष्यति ||
७७ ख
भीष्म उवाच:
दण्डेन नीय़ते चेय़ं दण्डं नय़ति चाप्युत |
७८ क
भीष्म उवाच:
दण्डनीतिरिति प्रोक्ता त्रीँल्लोकाननुवर्तते ||
७८ ख
भीष्म उवाच:
षाड्गुण्यगुणसारैषा स्थास्यत्यग्रे महात्मसु |
७९ क
भीष्म उवाच:
महत्त्वात्तस्य दण्डस्य नीतिर्विस्पष्टलक्षणा ||
७९ ख
भीष्म उवाच:
नय़चारश्च विपुलो येन सर्वमिदं ततम् |
८० क
भीष्म उवाच:
आगमश्च पुराणानां महर्षीणां च सम्भवः ||
८० ख
भीष्म उवाच:
तीर्थवंशश्च वंशश्च नक्षत्राणां युधिष्ठिर |
८१ क
भीष्म उवाच:
सकलं चातुराश्रम्यं चातुर्होत्रं तथैव च ||
८१ ख
भीष्म उवाच:
चातुर्वर्ण्यं तथैवात्र चातुर्वेद्यं च वर्णितम् |
८२ क
भीष्म उवाच:
इतिहासोपवेदाश्च न्याय़ः कृत्स्नश्च वर्णितः ||
८२ ख
भीष्म उवाच:
तपो ज्ञानमहिंसा च सत्यासत्ये नय़ः परः |
८३ क
भीष्म उवाच:
वृद्धोपसेवा दानं च शौचमुत्थानमेव च ||
८३ ख
भीष्म उवाच:
सर्वभूतानुकम्पा च सर्वमत्रोपवर्णितम् |
८४ क
भीष्म उवाच:
भुवि वाचोगतं यच्च तच्च सर्वं समर्पितम् ||
८४ ख
भीष्म उवाच:
तस्मिन्पैतामहे शास्त्रे पाण्डवैतदसंशय़म् |
८५ क
भीष्म उवाच:
धर्मार्थकाममोक्षाश्च सकला ह्यत्र शव्दिताः ||
८५ ख
भीष्म उवाच:
ततस्तां भगवान्नीतिं पूर्वं जग्राह शङ्करः |
८६ क
भीष्म उवाच:
वहुरूपो विशालाक्षः शिवः स्थाणुरुमापतिः ||
८६ ख
भीष्म उवाच:
युगानामाय़ुषो ह्रासं विज्ञाय़ भगवाञ्शिवः |
८७ क
भीष्म उवाच:
सञ्चिक्षेप ततः शास्त्रं महार्थं व्रह्मणा कृतम् ||
८७ ख
भीष्म उवाच:
वैशालाक्षमिति प्रोक्तं तदिन्द्रः प्रत्यपद्यत |
८८ क
भीष्म उवाच:
दशाध्याय़सहस्राणि सुव्रह्मण्यो महातपाः ||
८८ ख
भीष्म उवाच:
भगवानपि तच्छास्त्रं सञ्चिक्षेप पुरन्दरः |
८९ क
भीष्म उवाच:
सहस्रैः पञ्चभिस्तात यदुक्तं वाहुदन्तकम् ||
८९ ख
भीष्म उवाच:
अध्याय़ानां सहस्रैस्तु त्रिभिरेव वृहस्पतिः |
९० क
भीष्म उवाच:
सञ्चिक्षेपेश्वरो वुद्ध्या वार्हस्पत्यं तदुच्यते ||
९० ख
भीष्म उवाच:
अध्याय़ानां सहस्रेण काव्यः सङ्क्षेपमव्रवीत् |
९१ क
भीष्म उवाच:
तच्छास्त्रममितप्रज्ञो योगाचार्यो महातपाः ||
९१ ख
भीष्म उवाच:
एवं लोकानुरोधेन शास्त्रमेतन्महर्षिभिः |
९२ क
भीष्म उवाच:
सङ्क्षिप्तमाय़ुर्विज्ञाय़ मर्त्यानां ह्रासि पाण्डव ||
९२ ख
भीष्म उवाच:
अथ देवाः समागम्य विष्णुमूचुः प्रजापतिम् |
९३ क
भीष्म उवाच:
एको योऽर्हति मर्त्येभ्यः श्रैष्ठ्यं तं वै समादिश ||
९३ ख
भीष्म उवाच:
ततः सञ्चिन्त्य भगवान्देवो नाराय़णः प्रभुः |
९४ क
भीष्म उवाच:
तैजसं वै विरजसं सोऽसृजन्मानसं सुतम् ||
९४ ख
भीष्म उवाच:
विरजास्तु महाभाग विभुत्वं भुवि नैच्छत |
९५ क
भीष्म उवाच:
न्यासाय़ैवाभवद्वुद्धिः प्रणीता तस्य पाण्डव ||
९५ ख
भीष्म उवाच:
कीर्तिमांस्तस्य पुत्रोऽभूत्सोऽपि पञ्चातिगोऽभवत् |
९६ क
भीष्म उवाच:
कर्दमस्तस्य च सुतः सोऽप्यतप्यन्महत्तपः ||
९६ ख
भीष्म उवाच:
प्रजापतेः कर्दमस्य अनङ्गो नाम वै सुतः |
९७ क
भीष्म उवाच:
प्रजानां रक्षिता साधुर्दण्डनीतिविशारदः ||
९७ ख
भीष्म उवाच:
अनङ्गपुत्रोऽतिवलो नीतिमानधिगम्य वै |
९८ क
भीष्म उवाच:
अभिपेदे महीराज्यमथेन्द्रिय़वशोऽभवत् ||
९८ ख
भीष्म उवाच:
मृत्योस्तु दुहिता राजन्सुनीथा नाम मानसी |
९९ क
भीष्म उवाच:
प्रख्याता त्रिषु लोकेषु या सा वेनमजीजनत् ||
९९ ख
भीष्म उवाच:
तं प्रजासु विधर्माणं रागद्वेषवशानुगम् |
१०० क
भीष्म उवाच:
मन्त्रपूतैः कुशैर्जघ्नुरृषय़ो व्रह्मवादिनः ||
१०० ख