भीष्म उवाच:
ममन्थुर्दक्षिणं चोरुमृषय़स्तस्य मन्त्रतः |
१०१ क
भीष्म उवाच:
ततोऽस्य विकृतो जज्ञे ह्रस्वाङ्गः पुरुषो भुवि ||
१०१ ख
भीष्म उवाच:
दग्धस्थाणुप्रतीकाशो रक्ताक्षः कृष्णमूर्धजः |
१०२ क
भीष्म उवाच:
निषीदेत्येवमूचुस्तमृषय़ो व्रह्मवादिनः ||
१०२ ख
भीष्म उवाच:
तस्मान्निषादाः सम्भूताः क्रूराः शैलवनाश्रय़ाः |
१०३ क
भीष्म उवाच:
ये चान्ये विन्ध्यनिलय़ा म्लेच्छाः शतसहस्रशः ||
१०३ ख
भीष्म उवाच:
भूय़ोऽस्य दक्षिणं पाणिं ममन्थुस्ते महर्षय़ः |
१०४ क
भीष्म उवाच:
ततः पुरुष उत्पन्नो रूपेणेन्द्र इवापरः ||
१०४ ख
भीष्म उवाच:
कवची वद्धनिस्त्रिंशः सशरः सशरासनः |
१०५ क
भीष्म उवाच:
वेदवेदाङ्गविच्चैव धनुर्वेदे च पारगः ||
१०५ ख
भीष्म उवाच:
तं दण्डनीतिः सकला श्रिता राजन्नरोत्तमम् |
१०६ क
भीष्म उवाच:
ततः स प्राञ्जलिर्वैन्यो महर्षींस्तानुवाच ह ||
१०६ ख
भीष्म उवाच:
सुसूक्ष्मा मे समुत्पन्ना वुद्धिर्धर्मार्थदर्शिनी |
१०७ क
भीष्म उवाच:
अनय़ा किं मय़ा कार्यं तन्मे तत्त्वेन शंसत ||
१०७ ख
भीष्म उवाच:
यन्मां भवन्तो वक्ष्यन्ति कार्यमर्थसमन्वितम् |
१०८ क
भीष्म उवाच:
तदहं वै करिष्यामि नात्र कार्या विचारणा ||
१०८ ख
भीष्म उवाच:
तमूचुरथ देवास्ते ते चैव परमर्षय़ः |
१०९ क
भीष्म उवाच:
निय़तो यत्र धर्मो वै तमशङ्कः समाचर ||
१०९ ख
भीष्म उवाच:
प्रिय़ाप्रिय़े परित्यज्य समः सर्वेषु जन्तुषु |
११० क
भीष्म उवाच:
कामक्रोधौ च लोभं च मानं चोत्सृज्य दूरतः ||
११० ख
भीष्म उवाच:
यश्च धर्मात्प्रविचलेल्लोके कश्चन मानवः |
१११ क
भीष्म उवाच:
निग्राह्यस्ते स वाहुभ्यां शश्वद्धर्ममवेक्षतः ||
१११ ख
भीष्म उवाच:
प्रतिज्ञां चाधिरोहस्व मनसा कर्मणा गिरा |
११२ क
भीष्म उवाच:
पालय़िष्याम्यहं भौमं व्रह्म इत्येव चासकृत् ||
११२ ख
भीष्म उवाच:
यश्चात्र धर्मनीत्युक्तो दण्डनीतिव्यपाश्रय़ः |
११३ क
भीष्म उवाच:
तमशङ्कः करिष्यामि स्ववशो न कदाचन ||
११३ ख
भीष्म उवाच:
अदण्ड्या मे द्विजाश्चेति प्रतिजानीष्व चाभिभो |
११४ क
भीष्म उवाच:
लोकं च सङ्करात्कृत्स्नात्त्रातास्मीति परन्तप ||
११४ ख
भीष्म उवाच:
वैन्यस्ततस्तानुवाच देवानृषिपुरोगमान् |
११५ क
भीष्म उवाच:
व्राह्मणा मे सहाय़ाश्चेदेवमस्तु सुरर्षभाः ||
११५ ख
भीष्म उवाच:
एवमस्त्विति वैन्यस्तु तैरुक्तो व्रह्मवादिभिः |
११६ क
भीष्म उवाच:
पुरोधाश्चाभवत्तस्य शुक्रो व्रह्ममय़ो निधिः ||
११६ ख
भीष्म उवाच:
मन्त्रिणो वालखिल्यास्तु सारस्वत्यो गणो ह्यभूत् |
११७ क
भीष्म उवाच:
महर्षिर्भगवान्गर्गस्तस्य सांवत्सरोऽभवत् ||
११७ ख
भीष्म उवाच:
आत्मनाष्टम इत्येव श्रुतिरेषा परा नृषु |
११८ क
भीष्म उवाच:
उत्पन्नौ वन्दिनौ चास्य तत्पूर्वौ सूतमागधौ ||
११८ ख
भीष्म उवाच:
समतां वसुधाय़ाश्च स सम्यगुपपादय़त् |
११९ क
भीष्म उवाच:
वैषम्यं हि परं भूमेरासीदिति ह नः श्रुतम् ||
११९ ख
भीष्म उवाच:
स विष्णुना च देवेन शक्रेण विवुधैः सह |
१२० क
भीष्म उवाच:
ऋषिभिश्च प्रजापाल्ये व्रह्मणा चाभिषेचितः ||
१२० ख
भीष्म उवाच:
तं साक्षात्पृथिवी भेजे रत्नान्यादाय़ पाण्डव |
१२१ क
भीष्म उवाच:
सागरः सरितां भर्ता हिमवांश्चाचलोत्तमः ||
१२१ ख
भीष्म उवाच:
शक्रश्च धनमक्षय़्यं प्रादात्तस्य युधिष्ठिर |
१२२ क
भीष्म उवाच:
रुक्मं चापि महामेरुः स्वय़ं कनकपर्वतः ||
१२२ ख
भीष्म उवाच:
यक्षराक्षसभर्ता च भगवान्नरवाहनः |
१२३ क
भीष्म उवाच:
धर्मे चार्थे च कामे च समर्थं प्रददौ धनम् ||
१२३ ख
भीष्म उवाच:
हय़ा रथाश्च नागाश्च कोटिशः पुरुषास्तथा |
१२४ क
भीष्म उवाच:
प्रादुर्वभूवुर्वैन्यस्य चिन्तनादेव पाण्डव |
१२४ ख
भीष्म उवाच:
न जरा न च दुर्भिक्षं नाधय़ो व्याधय़स्तथा ||
१२४ ग
भीष्म उवाच:
सरीसृपेभ्यः स्तेनेभ्यो न चान्योन्यात्कदाचन |
१२५ क
भीष्म उवाच:
भय़मुत्पद्यते तत्र तस्य राज्ञोऽभिरक्षणात् ||
१२५ ख
भीष्म उवाच:
तेनेय़ं पृथिवी दुग्धा सस्यानि दश सप्त च |
१२६ क
भीष्म उवाच:
यक्षराक्षसनागैश्चापीप्सितं यस्य यस्य यत् ||
१२६ ख
भीष्म उवाच:
तेन धर्मोत्तरश्चाय़ं कृतो लोको महात्मना |
१२७ क
भीष्म उवाच:
रञ्जिताश्च प्रजाः सर्वास्तेन राजेति शव्द्यते ||
१२७ ख
भीष्म उवाच:
व्राह्मणानां क्षतत्राणात्ततः क्षत्रिय़ उच्यते |
१२८ क
भीष्म उवाच:
प्रथिता धनतश्चेय़ं पृथिवी साधुभिः स्मृता ||
१२८ ख
भीष्म उवाच:
स्थापनं चाकरोद्विष्णुः स्वय़मेव सनातनः |
१२९ क
भीष्म उवाच:
नातिवर्तिष्यते कश्चिद्राजंस्त्वामिति पार्थिव ||
१२९ ख
भीष्म उवाच:
तपसा भगवान्विष्णुराविवेश च भूमिपम् |
१३० क
भीष्म उवाच:
देववन्नरदेवानां नमते यज्जगन्नृप ||
१३० ख
भीष्म उवाच:
दण्डनीत्या च सततं रक्षितं तं नरेश्वर |
१३१ क
भीष्म उवाच:
नाधर्षय़त्ततः कश्चिच्चारनित्याच्च दर्शनात् ||
१३१ ख
भीष्म उवाच:
आत्मना करणैश्चैव समस्येह महीक्षितः |
१३२ क
भीष्म उवाच:
को हेतुर्यद्वशे तिष्ठेल्लोको दैवादृते गुणात् ||
१३२ ख
भीष्म उवाच:
विष्णोर्ललाटात्कमलं सौवर्णमभवत्तदा |
१३३ क
भीष्म उवाच:
श्रीः सम्भूता यतो देवी पत्नी धर्मस्य धीमतः ||
१३३ ख
भीष्म उवाच:
श्रिय़ः सकाशादर्थश्च जातो धर्मेण पाण्डव |
१३४ क
भीष्म उवाच:
अथ धर्मस्तथैवार्थः श्रीश्च राज्ये प्रतिष्ठिता ||
१३४ ख
भीष्म उवाच:
सुकृतस्य क्षय़ाच्चैव स्वर्लोकादेत्य मेदिनीम् |
१३५ क
भीष्म उवाच:
पार्थिवो जाय़ते तात दण्डनीतिवशानुगः ||
१३५ ख
भीष्म उवाच:
महत्त्वेन च संय़ुक्तो वैष्णवेन नरो भुवि |
१३६ क
भीष्म उवाच:
वुद्ध्या भवति संय़ुक्तो माहात्म्यं चाधिगच्छति ||
१३६ ख
भीष्म उवाच:
स्थापनामथ देवानां न कश्चिदतिवर्तते |
१३७ क
भीष्म उवाच:
तिष्ठत्येकस्य च वशे तं चेदनुविधीय़ते ||
१३७ ख
भीष्म उवाच:
शुभं हि कर्म राजेन्द्र शुभत्वाय़ोपकल्पते |
१३८ क
भीष्म उवाच:
तुल्यस्यैकस्य यस्याय़ं लोको वचसि तिष्ठति ||
१३८ ख
भीष्म उवाच:
यो ह्यस्य मुखमद्राक्षीत्सोम्य सोऽस्य वशानुगः |
१३९ क
भीष्म उवाच:
सुभगं चार्थवन्तं च रूपवन्तं च पश्यति ||
१३९ ख
भीष्म उवाच:
ततो जगति राजेन्द्र सततं शव्दितं वुधैः |
१४० क
भीष्म उवाच:
देवाश्च नरदेवाश्च तुल्या इति विशां पते ||
१४० ख
भीष्म उवाच:
एतत्ते सर्वमाख्यातं महत्त्वं प्रति राजसु |
१४१ क
भीष्म उवाच:
कार्त्स्न्येन भरतश्रेष्ठ किमन्यदिह वर्तताम् ||
१४१ ख