chevron_left विराट पर्व अध्याय १८
द्रौपद्यु उवाच:
इदं तु मे महद्दुःखं यत्प्रवक्ष्यामि भारत |
१ क
द्रौपद्यु उवाच:
न मेऽभ्यसूय़ा कर्तव्या दुःखादेतद्व्रवीम्यहम् ||
१ ख
द्रौपद्यु उवाच:
शार्दूलैर्महिषैः सिंहैरागारे युध्यसे यदा |
२ क
द्रौपद्यु उवाच:
कैकेय़्याः प्रेक्षमाणाय़ास्तदा मे कश्मलो भवेत् ||
२ ख
द्रौपद्यु उवाच:
प्रेक्षासमुत्थिता चापि कैकेय़ी ताः स्त्रिय़ो वदेत् |
३ क
द्रौपद्यु उवाच:
प्रेक्ष्य मामनवद्याङ्गी कश्मलोपहतामिव ||
३ ख
द्रौपद्यु उवाच:
स्नेहात्संवासजान्मन्ये सूदमेषा शुचिस्मिता |
४ क
द्रौपद्यु उवाच:
योध्यमानं महावीर्यैरिमं समनुशोचति ||
४ ख
द्रौपद्यु उवाच:
कल्याणरूपा सैरन्ध्री वल्लवश्चातिसुन्दरः |
५ क
द्रौपद्यु उवाच:
स्त्रीणां च चित्तं दुर्ज्ञेय़ं युक्तरूपौ च मे मतौ ||
५ ख
द्रौपद्यु उवाच:
सैरन्ध्री प्रिय़संवासान्नित्यं करुणवेदिनी |
६ क
द्रौपद्यु उवाच:
अस्मिन्राजकुले चेमौ तुल्यकालनिवासिनौ ||
६ ख
द्रौपद्यु उवाच:
इति व्रुवाणा वाक्यानि सा मां नित्यमवेदय़त् |
७ क
द्रौपद्यु उवाच:
क्रुध्यन्तीं मां च सम्प्रेक्ष्य समशङ्कत मां त्वय़ि ||
७ ख
द्रौपद्यु उवाच:
तस्यां तथा व्रुवत्यां तु दुःखं मां महदाविशत् |
८ क
द्रौपद्यु उवाच:
शोके यौधिष्ठिरे मग्ना नाहं जीवितुमुत्सहे ||
८ ख
द्रौपद्यु उवाच:
यः सदेवान्मनुष्यांश्च सर्पांश्चैकरथोऽजय़त् |
९ क
द्रौपद्यु उवाच:
सोऽय़ं राज्ञो विराटस्य कन्यानां नर्तको युवा ||
९ ख
द्रौपद्यु उवाच:
योऽतर्पय़दमेय़ात्मा खाण्डवे जातवेदसम् |
१० क
द्रौपद्यु उवाच:
सोऽन्तःपुरगतः पार्थः कूपेऽग्निरिव संवृतः ||
१० ख
द्रौपद्यु उवाच:
यस्माद्भय़ममित्राणां सदैव पुरुषर्षभात् |
११ क
द्रौपद्यु उवाच:
स लोकपरिभूतेन वेषेणास्ते धनञ्जय़ः ||
११ ख
द्रौपद्यु उवाच:
यस्य ज्यातलनिर्घोषात्समकम्पन्त शत्रवः |
१२ क
द्रौपद्यु उवाच:
स्त्रिय़ो गीतस्वनं तस्य मुदिताः पर्युपासते ||
१२ ख
द्रौपद्यु उवाच:
किरीटं सूर्यसङ्काशं यस्य मूर्धनि शोभते |
१३ क
द्रौपद्यु उवाच:
वेणीविकृतकेशान्तः सोऽय़मद्य धनञ्जय़ः ||
१३ ख
द्रौपद्यु उवाच:
यस्मिन्नस्त्राणि दिव्यानि समस्तानि महात्मनि |
१४ क
द्रौपद्यु उवाच:
आधारः सर्वविद्यानां स धारय़ति कुण्डले ||
१४ ख
द्रौपद्यु उवाच:
यं स्म राजसहस्राणि तेजसाप्रतिमानि वै |
१५ क
द्रौपद्यु उवाच:
समरे नातिवर्तन्ते वेलामिव महार्णवः ||
१५ ख
द्रौपद्यु उवाच:
सोऽय़ं राज्ञो विराटस्य कन्यानां नर्तको युवा |
१६ क
द्रौपद्यु उवाच:
आस्ते वेषप्रतिच्छन्नः कन्यानां परिचारकः ||
१६ ख
द्रौपद्यु उवाच:
यस्य स्म रथघोषेण समकम्पत मेदिनी |
१७ क
द्रौपद्यु उवाच:
सपर्वतवना भीम सहस्थावरजङ्गमा ||
१७ ख
द्रौपद्यु उवाच:
यस्मिञ्जाते महाभागे कुन्त्याः शोको व्यनश्यत |
१८ क
द्रौपद्यु उवाच:
स शोचय़ति मामद्य भीमसेन तवानुजः ||
१८ ख
द्रौपद्यु उवाच:
भूषितं तमलङ्कारैः कुण्डलैः परिहाटकैः |
१९ क
द्रौपद्यु उवाच:
कम्वुपाणिनमाय़ान्तं दृष्ट्वा सीदति मे मनः ||
१९ ख
द्रौपद्यु उवाच:
तं वेणीकृतकेशान्तं भीमधन्वानमर्जुनम् |
२० क
द्रौपद्यु उवाच:
कन्यापरिवृतं दृष्ट्वा भीम सीदति मे मनः ||
२० ख
द्रौपद्यु उवाच:
यदा ह्येनं परिवृतं कन्याभिर्देवरूपिणम् |
२१ क
द्रौपद्यु उवाच:
प्रभिन्नमिव मातङ्गं परिकीर्णं करेणुभिः ||
२१ ख
द्रौपद्यु उवाच:
मत्स्यमर्थपतिं पार्थं विराटं समुपस्थितम् |
२२ क
द्रौपद्यु उवाच:
पश्यामि तूर्यमध्यस्थं दिशो नश्यन्ति मे तदा ||
२२ ख
द्रौपद्यु उवाच:
नूनमार्या न जानाति कृच्छ्रं प्राप्तं धनञ्जय़म् |
२३ क
द्रौपद्यु उवाच:
अजातशत्रुं कौरव्यं मग्नं दुर्द्यूतदेविनम् ||
२३ ख
द्रौपद्यु उवाच:
तथा दृष्ट्वा यवीय़ांसं सहदेवं युधां पतिम् |
२४ क
द्रौपद्यु उवाच:
गोषु गोवेषमाय़ान्तं पाण्डुभूतास्मि भारत ||
२४ ख
द्रौपद्यु उवाच:
सहदेवस्य वृत्तानि चिन्तय़न्ती पुनः पुनः |
२५ क
द्रौपद्यु उवाच:
न विन्दामि महावाहो सहदेवस्य दुष्कृतम् |
२५ ख
द्रौपद्यु उवाच:
यस्मिन्नेवंविधं दुःखं प्राप्नुय़ात्सत्यविक्रमः ||
२५ ग
द्रौपद्यु उवाच:
दूय़ामि भरतश्रेष्ठ दृष्ट्वा ते भ्रातरं प्रिय़म् |
२६ क
द्रौपद्यु उवाच:
गोषु गोवृषसङ्काशं मत्स्येनाभिनिवेशितम् ||
२६ ख
द्रौपद्यु उवाच:
संरव्धं रक्तनेपथ्यं गोपालानां पुरोगमम् |
२७ क
द्रौपद्यु उवाच:
विराटमभिनन्दन्तमथ मे भवति ज्वरः ||
२७ ख
द्रौपद्यु उवाच:
सहदेवं हि मे वीरं नित्यमार्या प्रशंसति |
२८ क
द्रौपद्यु उवाच:
महाभिजनसम्पन्नो वृत्तवाञ्शीलवानिति ||
२८ ख
द्रौपद्यु उवाच:
ह्रीनिषेधो मधुरवाग्धार्मिकश्च प्रिय़श्च मे |
२९ क
द्रौपद्यु उवाच:
स तेऽरण्येषु वोद्धव्यो याज्ञसेनि क्षपास्वपि ||
२९ ख
द्रौपद्यु उवाच:
तं दृष्ट्वा व्यापृतं गोषु वत्सचर्मक्षपाशय़म् |
३० क
द्रौपद्यु उवाच:
सहदेवं युधां श्रेष्ठं किं नु जीवामि पाण्डव ||
३० ख
द्रौपद्यु उवाच:
यस्त्रिभिर्नित्यसम्पन्नो रूपेणास्त्रेण मेधय़ा |
३१ क
द्रौपद्यु उवाच:
सोऽश्ववन्धो विराटस्य पश्य कालस्य पर्ययम् ||
३१ ख
द्रौपद्यु उवाच:
अभ्यकीर्यन्त वृन्दानि दामग्रन्थिमुदीक्षताम् |
३२ क
द्रौपद्यु उवाच:
विनय़न्तं जवेनाश्वान्महाराजस्य पश्यतः ||
३२ ख
द्रौपद्यु उवाच:
अपश्यमेनं श्रीमन्तं मत्स्यं भ्राजिष्णुमुत्तमम् |
३३ क
द्रौपद्यु उवाच:
विराटमुपतिष्ठन्तं दर्शय़न्तं च वाजिनः ||
३३ ख
द्रौपद्यु उवाच:
किं नु मां मन्यसे पार्थ सुखितेति परन्तप |
३४ क
द्रौपद्यु उवाच:
एवं दुःखशताविष्टा युधिष्ठिरनिमित्ततः ||
३४ ख
द्रौपद्यु उवाच:
अतः प्रतिविशिष्टानि दुःखान्यन्यानि भारत |
३५ क
द्रौपद्यु उवाच:
वर्तन्ते मय़ि कौन्तेय़ वक्ष्यामि शृणु तान्यपि ||
३५ ख
द्रौपद्यु उवाच:
युष्मासु ध्रिय़माणेषु दुःखानि विविधान्युत |
३६ क
द्रौपद्यु उवाच:
शोषय़न्ति शरीरं मे किं नु दुःखमतः परम् ||
३६ ख