धृतराष्ट्र उवाच:
अहो खलु महद्दुःखं कृच्छ्रवासं वसत्यसौ |
१ क
धृतराष्ट्र उवाच:
कथं तस्य रतिस्तत्र तुष्टिर्वा वदतां वर ||
१ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
स देशः क्व नु यत्रासौ वसते धर्मसङ्कटे |
२ क
धृतराष्ट्र उवाच:
कथं वा स विमुच्येत नरस्तस्मान्महाभय़ात् ||
२ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
एतन्मे सर्वमाचक्ष्व साधु चेष्टामहे तथा |
३ क
धृतराष्ट्र उवाच:
कृपा मे महती जाता तस्याभ्युद्धरणेन हि ||
३ ख
विदुर उवाच:
उपमानमिदं राजन्मोक्षविद्भिरुदाहृतम् |
४ क
विदुर उवाच:
सुगतिं विन्दते येन परलोकेषु मानवः ||
४ ख
विदुर उवाच:
यत्तदुच्यति कान्तारं महत्संसार एव सः |
५ क
विदुर उवाच:
वनं दुर्गं हि यत्त्वेतत्संसारगहनं हि तत् ||
५ ख
विदुर उवाच:
ये च ते कथिता व्याला व्याधय़स्ते प्रकीर्तिताः |
६ क
विदुर उवाच:
या सा नारी वृहत्काय़ा अधितिष्ठति तत्र वै |
६ ख
विदुर उवाच:
तामाहुस्तु जरां प्राज्ञा वर्णरूपविनाशिनीम् ||
६ ग
विदुर उवाच:
यस्तत्र कूपो नृपते स तु देहः शरीरिणाम् |
७ क
विदुर उवाच:
यस्तत्र वसतेऽधस्तान्महाहिः काल एव सः |
७ ख
विदुर उवाच:
अन्तकः सर्वभूतानां देहिनां सर्वहार्यसौ ||
७ ग
विदुर उवाच:
कूपमध्ये च या जाता वल्ली यत्र स मानवः |
८ क
विदुर उवाच:
प्रताने लम्वते सा तु जीविताशा शरीरिणाम् ||
८ ख
विदुर उवाच:
स यस्तु कूपवीनाहे तं वृक्षं परिसर्पति |
९ क
विदुर उवाच:
षड्वक्त्रः कुञ्जरो राजन्स तु संवत्सरः स्मृतः |
९ ख
विदुर उवाच:
मुखानि ऋतवो मासाः पादा द्वादश कीर्तिताः ||
९ ग
विदुर उवाच:
ये तु वृक्षं निकृन्तन्ति मूषकाः सततोत्थिताः |
१० क
विदुर उवाच:
रात्र्यहानि तु तान्याहुर्भूतानां परिचिन्तकाः |
१० ख
विदुर उवाच:
ये ते मधुकरास्तत्र कामास्ते परिकीर्तिताः ||
१० ग
विदुर उवाच:
यास्तु ता वहुशो धाराः स्रवन्ति मधुनिस्रवम् |
११ क
विदुर उवाच:
तांस्तु कामरसान्विद्याद्यत्र मज्जन्ति मानवाः ||
११ ख
विदुर उवाच:
एवं संसारचक्रस्य परिवृत्तिं स्म ये विदुः |
१२ क
विदुर उवाच:
ते वै संसारचक्रस्य पाशांश्छिन्दन्ति वै वुधाः ||
१२ ख