chevron_left अनुशासन पर्व अध्याय ६१
भीष्म उवाच:
मघवा वाग्विदां श्रेष्ठं पप्रच्छेदं वृहस्पतिम् ||
४९ ख
भीष्म उवाच:
भगवन्केन दानेन स्वर्गतः सुखमेधते |
५० क
भीष्म उवाच:
यदक्षय़ं महार्घं च तद्व्रूहि वदतां वर ||
५० ख
भीष्म उवाच:
इत्युक्तः स सुरेन्द्रेण ततो देवपुरोहितः |
५१ क
भीष्म उवाच:
वृहस्पतिर्महातेजाः प्रत्युवाच शतक्रतुम् ||
५१ ख
भीष्म उवाच:
सुवर्णदानं गोदानं भूमिदानं च वृत्रहन् |
५२ क
भीष्म उवाच:
दददेतान्महाप्राज्ञः सर्वपापैः प्रमुच्यते ||
५२ ख
भीष्म उवाच:
न भूमिदानाद्देवेन्द्र परं किञ्चिदिति प्रभो |
५३ क
भीष्म उवाच:
विशिष्टमिति मन्यामि यथा प्राहुर्मनीषिणः ||
५३ ख
भीष्म उवाच:
ये शूरा निहता युद्धे स्वर्याता दानगृद्धिनः |
५४ क
भीष्म उवाच:
सर्वे ते विवुधश्रेष्ठ नातिक्रामन्ति भूमिदम् ||
५४ ख
भीष्म उवाच:
भर्तुर्निःश्रेय़से युक्तास्त्यक्तात्मानो रणे हताः |
५५ क
भीष्म उवाच:
व्रह्मलोकगताः शूरा नातिक्रामन्ति भूमिदम् ||
५५ ख
भीष्म उवाच:
पञ्च पूर्वादिपुरुषाः षट्च ये वसुधां गताः |
५६ क
भीष्म उवाच:
एकादश ददद्भूमिं परित्रातीह मानवः ||
५६ ख
भीष्म उवाच:
रत्नोपकीर्णां वसुधां यो ददाति पुरन्दर |
५७ क
भीष्म उवाच:
स मुक्तः सर्वकलुषैः स्वर्गलोके महीय़ते ||
५७ ख
भीष्म उवाच:
महीं स्फीतां ददद्राजा सर्वकामगुणान्विताम् |
५८ क
भीष्म उवाच:
राजाधिराजो भवति तद्धि दानमनुत्तमम् ||
५८ ख
भीष्म उवाच:
सर्वकामसमाय़ुक्तां काश्यपीं यः प्रय़च्छति |
५९ क
भीष्म उवाच:
सर्वभूतानि मन्यन्ते मां ददातीति वासव ||
५९ ख
भीष्म उवाच:
सर्वकामदुघां धेनुं सर्वकामपुरोगमाम् |
६० क
भीष्म उवाच:
ददाति यः सहस्राक्ष स स्वर्गं याति मानवः ||
६० ख
भीष्म उवाच:
मधुसर्पिःप्रवाहिन्यः पय़ोदधिवहास्तथा |
६१ क
भीष्म उवाच:
सरितस्तर्पय़न्तीह सुरेन्द्र वसुधाप्रदम् ||
६१ ख
भीष्म उवाच:
भूमिप्रदानान्नृपतिर्मुच्यते राजकिल्विषात् |
६२ क
भीष्म उवाच:
न हि भूमिप्रदानेन दानमन्यद्विशिष्यते ||
६२ ख
भीष्म उवाच:
ददाति यः समुद्रान्तां पृथिवीं शस्त्रनिर्जिताम् |
६३ क
भीष्म उवाच:
तं जनाः कथय़न्तीह यावद्धरति गौरिय़म् ||
६३ ख
भीष्म उवाच:
पुण्यामृद्धरसां भूमिं यो ददाति पुरन्दर |
६४ क
भीष्म उवाच:
न तस्य लोकाः क्षीय़न्ते भूमिदानगुणार्जिताः ||
६४ ख
भीष्म उवाच:
सर्वथा पार्थिवेनेह सततं भूतिमिच्छता |
६५ क
भीष्म उवाच:
भूर्देय़ा विधिवच्छक्र पात्रे सुखमभीप्सता ||
६५ ख
भीष्म उवाच:
अपि कृत्वा नरः पापं भूमिं दत्त्वा द्विजातय़े |
६६ क
भीष्म उवाच:
समुत्सृजति तत्पापं जीर्णां त्वचमिवोरगः ||
६६ ख
भीष्म उवाच:
सागरान्सरितः शैलान्काननानि च सर्वशः |
६७ क
भीष्म उवाच:
सर्वमेतन्नरः शक्र ददाति वसुधां ददत् ||
६७ ख
भीष्म उवाच:
तडागान्युदपानानि स्रोतांसि च सरांसि च |
६८ क
भीष्म उवाच:
स्नेहान्सर्वरसांश्चैव ददाति वसुधां ददत् ||
६८ ख
भीष्म उवाच:
ओषधीः क्षीरसम्पन्ना नगान्पुष्पफलान्वितान् |
६९ क
भीष्म उवाच:
काननोपलशैलांश्च ददाति वसुधां ददत् ||
६९ ख
भीष्म उवाच:
अग्निष्टोमप्रभृतिभिरिष्ट्वा च स्वाप्तदक्षिणैः |
७० क
भीष्म उवाच:
न तत्फलमवाप्नोति भूमिदानाद्यदश्नुते ||
७० ख
भीष्म उवाच:
दाता दशानुगृह्णाति दश हन्ति तथा क्षिपन् |
७१ क
भीष्म उवाच:
पूर्वदत्तां हरन्भूमिं नरकाय़ोपगच्छति ||
७१ ख
भीष्म उवाच:
न ददाति प्रतिश्रुत्य दत्त्वा वा हरते तु यः |
७२ क
भीष्म उवाच:
स वद्धो वारुणैः पाशैस्तप्यते मृत्युशासनात् ||
७२ ख
भीष्म उवाच:
आहिताग्निं सदाय़ज्ञं कृशभृत्यं प्रिय़ातिथिम् |
७३ क
भीष्म उवाच:
ये भरन्ति द्विजश्रेष्ठं नोपसर्पन्ति ते यमम् ||
७३ ख
भीष्म उवाच:
व्राह्मणेष्वृणभूतं स्यात्पार्थिवस्य पुरन्दर |
७४ क
भीष्म उवाच:
इतरेषां तु वर्णानां तारय़ेत्कृशदुर्वलान् ||
७४ ख
भीष्म उवाच:
नाच्छिन्द्यात्स्पर्शितां भूमिं परेण त्रिदशाधिप |
७५ क
भीष्म उवाच:
व्राह्मणाय़ सुरश्रेष्ठ कृशभृत्याय़ कश्चन ||
७५ ख
भीष्म उवाच:
अथाश्रु पतितं तेषां दीनानामवसीदताम् |
७६ क
भीष्म उवाच:
व्राह्मणानां हृते क्षेत्रे हन्यात्त्रिपुरुषं कुलम् ||
७६ ख
भीष्म उवाच:
भूमिपालं च्युतं राष्ट्राद्यस्तु संस्थापय़ेत्पुनः |
७७ क
भीष्म उवाच:
तस्य वासः सहस्राक्ष नाकपृष्ठे महीय़ते ||
७७ ख
भीष्म उवाच:
इक्षुभिः सन्ततां भूमिं यवगोधूमसङ्कुलाम् |
७८ क
भीष्म उवाच:
गोश्ववाहनसम्पूर्णां वाहुवीर्यसमार्जिताम् ||
७८ ख
भीष्म उवाच:
निधिगर्भां ददद्भूमिं सर्वरत्नपरिच्छदाम् |
७९ क
भीष्म उवाच:
अक्षय़ाँल्लभते लोकान्भूमिसत्रं हि तस्य तत् ||
७९ ख
भीष्म उवाच:
विधूय़ कलुषं सर्वं विरजाः संमतः सताम् |
८० क
भीष्म उवाच:
लोके महीय़ते सद्भिर्यो ददाति वसुन्धराम् ||
८० ख
भीष्म उवाच:
यथाप्सु पतितः शक्र तैलविन्दुर्विसर्पति |
८१ क
भीष्म उवाच:
तथा भूमिकृतं दानं सस्ये सस्ये विसर्पति ||
८१ ख
भीष्म उवाच:
ये रणाग्रे महीपालाः शूराः समितिशोभनाः |
८२ क
भीष्म उवाच:
वध्यन्तेऽभिमुखाः शक्र व्रह्मलोकं व्रजन्ति ते ||
८२ ख
भीष्म उवाच:
नृत्यगीतपरा नार्यो दिव्यमाल्यविभूषिताः |
८३ क
भीष्म उवाच:
उपतिष्ठन्ति देवेन्द्र सदा भूमिप्रदं दिवि ||
८३ ख
भीष्म उवाच:
मोदते च सुखं स्वर्गे देवगन्धर्वपूजितः |
८४ क
भीष्म उवाच:
यो ददाति महीं सम्यग्विधिनेह द्विजातय़े ||
८४ ख
भीष्म उवाच:
शतमप्सरसश्चैव दिव्यमाल्यविभूषिताः |
८५ क
भीष्म उवाच:
उपतिष्ठन्ति देवेन्द्र सदा भूमिप्रदं नरम् ||
८५ ख
भीष्म उवाच:
शङ्खं भद्रासनं छत्रं वराश्वा वरवारणाः |
८६ क
भीष्म उवाच:
भूमिप्रदानात्पुष्पाणि हिरण्यनिचय़ास्तथा ||
८६ ख
भीष्म उवाच:
आज्ञा सदाप्रतिहता जय़शव्दो भवत्यथ |
८७ क
भीष्म उवाच:
भूमिदानस्य पुष्पाणि फलं स्वर्गः पुरन्दर ||
८७ ख
भीष्म उवाच:
हिरण्यपुष्पाश्चौषध्यः कुशकाञ्चनशाड्वलाः |
८८ क
भीष्म उवाच:
अमृतप्रसवां भूमिं प्राप्नोति पुरुषो ददत् ||
८८ ख
भीष्म उवाच:
नास्ति भूमिसमं दानं नास्ति मातृसमो गुरुः |
८९ क
भीष्म उवाच:
नास्ति सत्यसमो धर्मो नास्ति दानसमो निधिः ||
८९ ख
भीष्म उवाच:
एतदाङ्गिरसाच्छ्रुत्वा वासवो वसुधामिमाम् |
९० क
भीष्म उवाच:
वसुरत्नसमाकीर्णां ददावाङ्गिरसे तदा ||
९० ख
भीष्म उवाच:
य इमं श्रावय़ेच्छ्राद्धे भूमिदानस्य संस्तवम् |
९१ क
भीष्म उवाच:
न तस्य रक्षसां भागो नासुराणां भवत्युत ||
९१ ख
भीष्म उवाच:
अक्षय़ं च भवेद्दत्तं पितृभ्यस्तन्न संशय़ः |
९२ क
भीष्म उवाच:
तस्माच्छ्राद्धेष्विदं विप्रो भुञ्जतः श्रावय़ेद्द्विजान् ||
९२ ख
भीष्म उवाच:
इत्येतत्सर्वदानानां श्रेष्ठमुक्तं तवानघ |
९३ क
भीष्म उवाच:
मय़ा भरतशार्दूल किं भूय़ः श्रोतुमिच्छसि ||
९३ ख