chevron_left वन पर्व अध्याय ६१
दमय़न्त्यु उवाच:
तस्य मामचलश्रेष्ठ विद्धि भार्यामिहागताम् ||
४८ ख
दमय़न्त्यु उवाच:
त्यक्तश्रिय़ं भर्तृहीनामनाथां व्यसनान्विताम् |
४९ क
दमय़न्त्यु उवाच:
अन्वेषमाणां भर्तारं तं वै नरवरोत्तमम् ||
४९ ख
दमय़न्त्यु उवाच:
खमुल्लिखद्भिरेतैर्हि त्वय़ा शृङ्गशतैर्नृपः |
५० क
दमय़न्त्यु उवाच:
कच्चिद्दृष्टोऽचलश्रेष्ठ वनेऽस्मिन्दारुणे नलः ||
५० ख
दमय़न्त्यु उवाच:
गजेन्द्रविक्रमो धीमान्दीर्घवाहुरमर्षणः |
५१ क
दमय़न्त्यु उवाच:
विक्रान्तः सत्यवाग्धीरो भर्ता मम महाय़शाः |
५१ ख
दमय़न्त्यु उवाच:
निषधानामधिपतिः कच्चिद्दृष्टस्त्वय़ा नलः ||
५१ ग
दमय़न्त्यु उवाच:
किं मां विलपतीमेकां पर्वतश्रेष्ठ दुःखिताम् |
५२ क
दमय़न्त्यु उवाच:
गिरा नाश्वासय़स्यद्य स्वां सुतामिव दुःखिताम् ||
५२ ख
दमय़न्त्यु उवाच:
वीर विक्रान्त धर्मज्ञ सत्यसन्ध महीपते |
५३ क
दमय़न्त्यु उवाच:
यद्यस्यस्मिन्वने राजन्दर्शय़ात्मानमात्मना ||
५३ ख
दमय़न्त्यु उवाच:
कदा नु स्निग्धगम्भीरां जीमूतस्वनसंनिभाम् |
५४ क
दमय़न्त्यु उवाच:
श्रोष्यामि नैषधस्याहं वाचं ताममृतोपमाम् ||
५४ ख
दमय़न्त्यु उवाच:
वैदर्भीत्येव कथितां शुभां राज्ञो महात्मनः |
५५ क
दमय़न्त्यु उवाच:
आम्नाय़सारिणीमृद्धां मम शोकनिवर्हिणीम् ||
५५ ख
दमय़न्त्यु उवाच:
इति सा तं गिरिश्रेष्ठमुक्त्वा पार्थिवनन्दिनी |
५६ क
दमय़न्त्यु उवाच:
दमय़न्ती ततो भूय़ो जगाम दिशमुत्तराम् ||
५६ ख
दमय़न्त्यु उवाच:
सा गत्वा त्रीनहोरात्रान्ददर्श परमाङ्गना |
५७ क
दमय़न्त्यु उवाच:
तापसारण्यमतुलं दिव्यकाननदर्शनम् ||
५७ ख
दमय़न्त्यु उवाच:
वसिष्ठभृग्वत्रिसमैस्तापसैरुपशोभितम् |
५८ क
दमय़न्त्यु उवाच:
निय़तैः संय़ताहारैर्दमशौचसमन्वितैः ||
५८ ख
दमय़न्त्यु उवाच:
अव्भक्षैर्वाय़ुभक्षैश्च पत्राहारैस्तथैव च |
५९ क
दमय़न्त्यु उवाच:
जितेन्द्रिय़ैर्महाभागैः स्वर्गमार्गदिदृक्षुभिः ||
५९ ख
दमय़न्त्यु उवाच:
वल्कलाजिनसंवीतैर्मुनिभिः संय़तेन्द्रिय़ैः |
६० क
दमय़न्त्यु उवाच:
तापसाध्युषितं रम्यं ददर्शाश्रममण्डलम् ||
६० ख
दमय़न्त्यु उवाच:
सा दृष्ट्वैवाश्रमपदं नानामृगनिषेवितम् |
६१ क
दमय़न्त्यु उवाच:
शाखामृगगणैश्चैव तापसैश्च समन्वितम् ||
६१ ख
दमय़न्त्यु उवाच:
सुभ्रूः सुकेशी सुश्रोणी सुकुचा सुद्विजानना |
६२ क
दमय़न्त्यु उवाच:
वर्चस्विनी सुप्रतिष्ठा स्वञ्चितोद्यतगामिनी ||
६२ ख
दमय़न्त्यु उवाच:
सा विवेशाश्रमपदं वीरसेनसुतप्रिय़ा |
६३ क
दमय़न्त्यु उवाच:
योषिद्रत्नं महाभागा दमय़न्ती मनस्विनी ||
६३ ख
दमय़न्त्यु उवाच:
साभिवाद्य तपोवृद्धान्विनय़ावनता स्थिता |
६४ क
दमय़न्त्यु उवाच:
स्वागतं त इति प्रोक्ता तैः सर्वैस्तापसैश्च सा ||
६४ ख
दमय़न्त्यु उवाच:
पूजां चास्या यथान्याय़ं कृत्वा तत्र तपोधनाः |
६५ क
दमय़न्त्यु उवाच:
आस्यतामित्यथोचुस्ते व्रूहि किं करवामहे ||
६५ ख
दमय़न्त्यु उवाच:
तानुवाच वरारोहा कच्चिद्भगवतामिह |
६६ क
दमय़न्त्यु उवाच:
तपस्यग्निषु धर्मेषु मृगपक्षिषु चानघाः |
६६ ख
दमय़न्त्यु उवाच:
कुशलं वो महाभागाः स्वधर्मचरणेषु च ||
६६ ग
दमय़न्त्यु उवाच:
तैरुक्ता कुशलं भद्रे सर्वत्रेति यशस्विनी |
६७ क
दमय़न्त्यु उवाच:
व्रूहि सर्वानवद्याङ्गि का त्वं किं च चिकीर्षसि ||
६७ ख
दमय़न्त्यु उवाच:
दृष्ट्वैव ते परं रूपं द्युतिं च परमामिह |
६८ क
दमय़न्त्यु उवाच:
विस्मय़ो नः समुत्पन्नः समाश्वसिहि मा शुचः ||
६८ ख
दमय़न्त्यु उवाच:
अस्यारण्यस्य महती देवता वा महीभृतः |
६९ क
दमय़न्त्यु उवाच:
अस्या नु नद्याः कल्याणि वद सत्यमनिन्दिते ||
६९ ख
दमय़न्त्यु उवाच:
साव्रवीत्तानृषीन्नाहमरण्यस्यास्य देवता |
७० क
दमय़न्त्यु उवाच:
न चाप्यस्य गिरेर्विप्रा न नद्या देवताप्यहम् ||
७० ख
दमय़न्त्यु उवाच:
मानुषीं मां विजानीत यूय़ं सर्वे तपोधनाः |
७१ क
दमय़न्त्यु उवाच:
विस्तरेणाभिधास्यामि तन्मे शृणुत सर्वशः ||
७१ ख
दमय़न्त्यु उवाच:
विदर्भेषु महीपालो भीमो नाम महाद्युतिः |
७२ क
दमय़न्त्यु उवाच:
तस्य मां तनय़ां सर्वे जानीत द्विजसत्तमाः ||
७२ ख
दमय़न्त्यु उवाच:
निषधाधिपतिर्धीमान्नलो नाम महाय़शाः |
७३ क
दमय़न्त्यु उवाच:
वीरः सङ्ग्रामजिद्विद्वान्मम भर्ता विशां पतिः ||
७३ ख
दमय़न्त्यु उवाच:
देवताभ्यर्चनपरो द्विजातिजनवत्सलः |
७४ क
दमय़न्त्यु उवाच:
गोप्ता निषधवंशस्य महाभागो महाद्युतिः ||
७४ ख
दमय़न्त्यु उवाच:
सत्यवाग्धर्मवित्प्राज्ञः सत्यसन्धोऽरिमर्दनः |
७५ क
दमय़न्त्यु उवाच:
व्रह्मण्यो दैवतपरः श्रीमान्परपुरञ्जय़ः ||
७५ ख
दमय़न्त्यु उवाच:
नलो नाम नृपश्रेष्ठो देवराजसमद्युतिः |
७६ क
दमय़न्त्यु उवाच:
मम भर्ता विशालाक्षः पूर्णेन्दुवदनोऽरिहा ||
७६ ख
दमय़न्त्यु उवाच:
आहर्ता क्रतुमुख्यानां वेदवेदाङ्गपारगः |
७७ क
दमय़न्त्यु उवाच:
सपत्नानां मृधे हन्ता रविसोमसमप्रभः ||
७७ ख
दमय़न्त्यु उवाच:
स कैश्चिन्निकृतिप्रज्ञैरकल्याणैर्नराधमैः |
७८ क
दमय़न्त्यु उवाच:
आहूय़ पृथिवीपालः सत्यधर्मपराय़णः |
७८ ख
दमय़न्त्यु उवाच:
देवने कुशलैर्जिह्मैर्जितो राज्यं वसूनि च ||
७८ ग
दमय़न्त्यु उवाच:
तस्य मामवगच्छध्वं भार्यां राजर्षभस्य वै |
७९ क
दमय़न्त्यु उवाच:
दमय़न्तीति विख्यातां भर्तृदर्शनलालसाम् ||
७९ ख
दमय़न्त्यु उवाच:
सा वनानि गिरींश्चैव सरांसि सरितस्तथा |
८० क
दमय़न्त्यु उवाच:
पल्वलानि च रम्याणि तथारण्यानि सर्वशः ||
८० ख
दमय़न्त्यु उवाच:
अन्वेषमाणा भर्तारं नलं रणविशारदम् |
८१ क
दमय़न्त्यु उवाच:
महात्मानं कृतास्त्रं च विचरामीह दुःखिता ||
८१ ख
दमय़न्त्यु उवाच:
कच्चिद्भगवतां पुण्यं तपोवनमिदं नृपः |
८२ क
दमय़न्त्यु उवाच:
भवेत्प्राप्तो नलो नाम निषधानां जनाधिपः ||
८२ ख
दमय़न्त्यु उवाच:
यत्कृतेऽहमिदं विप्राः प्रपन्ना भृशदारुणम् |
८३ क
दमय़न्त्यु उवाच:
वनं प्रतिभय़ं घोरं शार्दूलमृगसेवितम् ||
८३ ख
दमय़न्त्यु उवाच:
यदि कैश्चिदहोरात्रैर्न द्रक्ष्यामि नलं नृपम् |
८४ क
दमय़न्त्यु उवाच:
आत्मानं श्रेय़सा योक्ष्ये देहस्यास्य विमोचनात् ||
८४ ख
दमय़न्त्यु उवाच:
को नु मे जीवितेनार्थस्तमृते पुरुषर्षभम् |
८५ क
दमय़न्त्यु उवाच:
कथं भविष्याम्यद्याहं भर्तृशोकाभिपीडिता ||
८५ ख
दमय़न्त्यु उवाच:
एवं विलपतीमेकामरण्ये भीमनन्दिनीम् |
८६ क
दमय़न्त्यु उवाच:
दमय़न्तीमथोचुस्ते तापसाः सत्यवादिनः ||
८६ ख
दमय़न्त्यु उवाच:
उदर्कस्तव कल्याणि कल्याणो भविता शुभे |
८७ क
दमय़न्त्यु उवाच:
वय़ं पश्याम तपसा क्षिप्रं द्रक्ष्यसि नैषधम् ||
८७ ख
दमय़न्त्यु उवाच:
निषधानामधिपतिं नलं रिपुनिघातिनम् |
८८ क
दमय़न्त्यु उवाच:
भैमि धर्मभृतां श्रेष्ठं द्रक्ष्यसे विगतज्वरम् ||
८८ ख
दमय़न्त्यु उवाच:
विमुक्तं सर्वपापेभ्यः सर्वरत्नसमन्वितम् |
८९ क
दमय़न्त्यु उवाच:
तदेव नगरश्रेष्ठं प्रशासन्तमरिन्दमम् ||
८९ ख
दमय़न्त्यु उवाच:
द्विषतां भय़कर्तारं सुहृदां शोकनाशनम् |
९० क
दमय़न्त्यु उवाच:
पतिं द्रक्ष्यसि कल्याणि कल्याणाभिजनं नृपम् ||
९० ख
दमय़न्त्यु उवाच:
एवमुक्त्वा नलस्येष्टां महिषीं पार्थिवात्मजाम् |
९१ क
दमय़न्त्यु उवाच:
अन्तर्हितास्तापसास्ते साग्निहोत्राश्रमास्तदा ||
९१ ख
दमय़न्त्यु उवाच:
सा दृष्ट्वा महदाश्चर्यं विस्मिता अभवत्तदा |
९२ क
दमय़न्त्यु उवाच:
दमय़न्त्यनवद्याङ्गी वीरसेननृपस्नुषा ||
९२ ख
दमय़न्त्यु उवाच:
किं नु स्वप्नो मय़ा दृष्टः कोऽय़ं विधिरिहाभवत् |
९३ क
दमय़न्त्यु उवाच:
क्व नु ते तापसाः सर्वे क्व तदाश्रममण्डलम् ||
९३ ख
दमय़न्त्यु उवाच:
क्व सा पुण्यजला रम्या नानाद्विजनिषेविता |
९४ क
दमय़न्त्यु उवाच:
नदी ते च नगा हृद्याः फलपुष्पोपशोभिताः ||
९४ ख
दमय़न्त्यु उवाच:
ध्यात्वा चिरं भीमसुता दमय़न्ती शुचिस्मिता |
९५ क
दमय़न्त्यु उवाच:
भर्तृशोकपरा दीना विवर्णवदनाभवत् ||
९५ ख
दमय़न्त्यु उवाच:
सा गत्वाथापरां भूमिं वाष्पसन्दिग्धय़ा गिरा |
९६ क
दमय़न्त्यु उवाच:
विललापाश्रुपूर्णाक्षी दृष्ट्वाशोकतरुं ततः ||
९६ ख