chevron_left भीष्म पर्व अध्याय ६१
भीष्म उवाच:
सर्वगुह्यगुणोपेत विश्वमूर्ते निरामय़ |
४६ क
भीष्म उवाच:
विश्वेश्वर महावाहो जय़ लोकार्थतत्पर ||
४६ ख
भीष्म उवाच:
महोरग वराहाद्य हरिकेश विभो जय़ |
४७ क
भीष्म उवाच:
हरिवास विशामीश विश्वावासामिताव्यय ||
४७ ख
भीष्म उवाच:
व्यक्ताव्यक्तामितस्थान निय़तेन्द्रिय़ सेन्द्रिय़ |
४८ क
भीष्म उवाच:
असङ्ख्येय़ात्मभावज्ञ जय़ गम्भीर कामद ||
४८ ख
भीष्म उवाच:
अनन्त विदितप्रज्ञ नित्यं भूतविभावन |
४९ क
भीष्म उवाच:
कृतकार्य कृतप्रज्ञ धर्मज्ञ विजय़ाजय़ ||
४९ ख
भीष्म उवाच:
गुह्यात्मन्सर्वभूतात्मन्स्फुटसम्भूतसम्भव |
५० क
भीष्म उवाच:
भूतार्थतत्त्व लोकेश जय़ भूतविभावन ||
५० ख
भीष्म उवाच:
आत्मय़ोने महाभाग कल्पसङ्क्षेपतत्पर |
५१ क
भीष्म उवाच:
उद्भावन मनोद्भाव जय़ व्रह्मजनप्रिय़ ||
५१ ख
भीष्म उवाच:
निसर्गसर्गाभिरत कामेश परमेश्वर |
५२ क
भीष्म उवाच:
अमृतोद्भव सद्भाव युगाग्ने विजय़प्रद ||
५२ ख
भीष्म उवाच:
प्रजापतिपते देव पद्मनाभ महावल |
५३ क
भीष्म उवाच:
आत्मभूत महाभूत कर्मात्मञ्जय़ कर्मद ||
५३ ख
भीष्म उवाच:
पादौ तव धरा देवी दिशो वाहुर्दिवं शिरः |
५४ क
भीष्म उवाच:
मूर्तिस्तेऽहं सुराः काय़श्चन्द्रादित्यौ च चक्षुषी ||
५४ ख
भीष्म उवाच:
वलं तपश्च सत्यं च धर्मः कामात्मजः प्रभो |
५५ क
भीष्म उवाच:
तेजोऽग्निः पवनः श्वास आपस्ते स्वेदसम्भवाः ||
५५ ख
भीष्म उवाच:
अश्विनौ श्रवणौ नित्यं देवी जिह्वा सरस्वती |
५६ क
भीष्म उवाच:
वेदाः संस्कारनिष्ठा हि त्वय़ीदं जगदाश्रितम् ||
५६ ख
भीष्म उवाच:
न सङ्ख्यां न परीमाणं न तेजो न पराक्रमम् |
५७ क
भीष्म उवाच:
न वलं योगय़ोगीश जानीमस्ते न सम्भवम् ||
५७ ख
भीष्म उवाच:
त्वद्भक्तिनिरता देव निय़मैस्त्वा समाहिताः |
५८ क
भीष्म उवाच:
अर्चय़ामः सदा विष्णो परमेशं महेश्वरम् ||
५८ ख
भीष्म उवाच:
ऋषय़ो देवगन्धर्वा यक्षराक्षसपन्नगाः |
५९ क
भीष्म उवाच:
पिशाचा मानुषाश्चैव मृगपक्षिसरीसृपाः ||
५९ ख
भीष्म उवाच:
एवमादि मय़ा सृष्टं पृथिव्यां त्वत्प्रसादजम् |
६० क
भीष्म उवाच:
पद्मनाभ विशालाक्ष कृष्ण दुःस्वप्ननाशन ||
६० ख
भीष्म उवाच:
त्वं गतिः सर्वभूतानां त्वं नेता त्वं जगन्मुखम् |
६१ क
भीष्म उवाच:
त्वत्प्रसादेन देवेश सुखिनो विवुधाः सदा ||
६१ ख
भीष्म उवाच:
पृथिवी निर्भय़ा देव त्वत्प्रसादात्सदाभवत् |
६२ क
भीष्म उवाच:
तस्माद्भव विशालाक्ष यदुवंशविवर्धनः ||
६२ ख
भीष्म उवाच:
धर्मसंस्थापनार्थाय़ दैतेय़ानां वधाय़ च |
६३ क
भीष्म उवाच:
जगतो धारणार्थाय़ विज्ञाप्यं कुरु मे प्रभो ||
६३ ख
भीष्म उवाच:
यदेतत्परमं गुह्यं त्वत्प्रसादमय़ं विभो |
६४ क
भीष्म उवाच:
वासुदेव तदेतत्ते मय़ोद्गीतं यथातथम् ||
६४ ख
भीष्म उवाच:
सृष्ट्वा सङ्कर्षणं देवं स्वय़मात्मानमात्मना |
६५ क
भीष्म उवाच:
कृष्ण त्वमात्मनास्राक्षीः प्रद्युम्नं चात्मसम्भवम् ||
६५ ख
भीष्म उवाच:
प्रद्युम्नाच्चानिरुद्धं त्वं यं विदुर्विष्णुमव्ययम् |
६६ क
भीष्म उवाच:
अनिरुद्धोऽसृजन्मां वै व्रह्माणं लोकधारिणम् ||
६६ ख
भीष्म उवाच:
वासुदेवमय़ः सोऽहं त्वय़ैवास्मि विनिर्मितः |
६७ क
भीष्म उवाच:
विभज्य भागशोऽऽत्मानं व्रज मानुषतां विभो ||
६७ ख
भीष्म उवाच:
तत्रासुरवधं कृत्वा सर्वलोकसुखाय़ वै |
६८ क
भीष्म उवाच:
धर्मं स्थाप्य यशः प्राप्य योगं प्राप्स्यसि तत्त्वतः ||
६८ ख
भीष्म उवाच:
त्वां हि व्रह्मर्षय़ो लोके देवाश्चामितविक्रम |
६९ क
भीष्म उवाच:
तैस्तैश्च नामभिर्भक्ता गाय़न्ति परमात्मकम् ||
६९ ख
भीष्म उवाच:
स्थिताश्च सर्वे त्वय़ि भूतसङ्घाः; कृत्वाश्रय़ं त्वां वरदं सुवाहो |
७० क
भीष्म उवाच:
अनादिमध्यान्तमपारय़ोगं; लोकस्य सेतुं प्रवदन्ति विप्राः ||
७० ख