दमय़न्त्यु उवाच:
उपगम्य तरुश्रेष्ठमशोकं पुष्पितं तदा |
९७ क
दमय़न्त्यु उवाच:
पल्लवापीडितं हृद्यं विहङ्गैरनुनादितम् ||
९७ ख
दमय़न्त्यु उवाच:
अहो वताय़मगमः श्रीमानस्मिन्वनान्तरे |
९८ क
दमय़न्त्यु उवाच:
आपीडैर्वहुभिर्भाति श्रीमान्द्रमिडराडिव ||
९८ ख
दमय़न्त्यु उवाच:
विशोकां कुरु मां क्षिप्रमशोक प्रिय़दर्शन |
९९ क
दमय़न्त्यु उवाच:
वीतशोकभय़ावाधं कच्चित्त्वं दृष्टवान्नृपम् ||
९९ ख
दमय़न्त्यु उवाच:
नलं नामारिदमनं दमय़न्त्याः प्रिय़ं पतिम् |
१०० क
दमय़न्त्यु उवाच:
निषधानामधिपतिं दृष्टवानसि मे प्रिय़म् ||
१०० ख
दमय़न्त्यु उवाच:
एकवस्त्रार्धसंवीतं सुकुमारतनुत्वचम् |
१०१ क
दमय़न्त्यु उवाच:
व्यसनेनार्दितं वीरमरण्यमिदमागतम् ||
१०१ ख
दमय़न्त्यु उवाच:
यथा विशोका गच्छेय़मशोकनग तत्कुरु |
१०२ क
दमय़न्त्यु उवाच:
सत्यनामा भवाशोक मम शोकविनाशनात् ||
१०२ ख
दमय़न्त्यु उवाच:
एवं साशोकवृक्षं तमार्ता त्रिः परिगम्य ह |
१०३ क
दमय़न्त्यु उवाच:
जगाम दारुणतरं देशं भैमी वराङ्गना ||
१०३ ख
दमय़न्त्यु उवाच:
सा ददर्श नगान्नैकान्नैकाश्च सरितस्तथा |
१०४ क
दमय़न्त्यु उवाच:
नैकांश्च पर्वतान्रम्यान्नैकांश्च मृगपक्षिणः ||
१०४ ख
दमय़न्त्यु उवाच:
कन्दरांश्च नितम्वांश्च नदांश्चाद्भुतदर्शनान् |
१०५ क
दमय़न्त्यु उवाच:
ददर्श सा भीमसुता पतिमन्वेषती तदा ||
१०५ ख
दमय़न्त्यु उवाच:
गत्वा प्रकृष्टमध्वानं दमय़न्ती शुचिस्मिता |
१०६ क
दमय़न्त्यु उवाच:
ददर्शाथ महासार्थं हस्त्यश्वरथसङ्कुलम् ||
१०६ ख
दमय़न्त्यु उवाच:
उत्तरन्तं नदीं रम्यां प्रसन्नसलिलां शुभाम् |
१०७ क
दमय़न्त्यु उवाच:
सुशीततोय़ां विस्तीर्णां ह्रदिनीं वेतसैर्वृताम् ||
१०७ ख
दमय़न्त्यु उवाच:
प्रोद्घुष्टां क्रौञ्चकुररैश्चक्रवाकोपकूजिताम् |
१०८ क
दमय़न्त्यु उवाच:
कूर्मग्राहझषाकीर्णां पुलिनद्वीपशोभिताम् ||
१०८ ख
दमय़न्त्यु उवाच:
सा दृष्ट्वैव महासार्थं नलपत्नी यशस्विनी |
१०९ क
दमय़न्त्यु उवाच:
उपसर्प्य वरारोहा जनमध्यं विवेश ह ||
१०९ ख
दमय़न्त्यु उवाच:
उन्मत्तरूपा शोकार्ता तथा वस्त्रार्धसंवृता |
११० क
दमय़न्त्यु उवाच:
कृशा विवर्णा मलिना पांसुध्वस्तशिरोरुहा ||
११० ख
दमय़न्त्यु उवाच:
तां दृष्ट्वा तत्र मनुजाः केचिद्भीताः प्रदुद्रुवुः |
१११ क
दमय़न्त्यु उवाच:
केचिच्चिन्तापरास्तस्थुः केचित्तत्र विचुक्रुशुः ||
१११ ख
दमय़न्त्यु उवाच:
प्रहसन्ति स्म तां केचिदभ्यसूय़न्त चापरे |
११२ क
दमय़न्त्यु उवाच:
चक्रुस्तस्यां दय़ां केचित्पप्रच्छुश्चापि भारत ||
११२ ख
दमय़न्त्यु उवाच:
कासि कस्यासि कल्याणि किं वा मृगय़से वने |
११३ क
दमय़न्त्यु उवाच:
त्वां दृष्ट्वा व्यथिताः स्मेह कच्चित्त्वमसि मानुषी ||
११३ ख
दमय़न्त्यु उवाच:
वद सत्यं वनस्यास्य पर्वतस्याथ वा दिशः |
११४ क
दमय़न्त्यु उवाच:
देवता त्वं हि कल्याणि त्वां वय़ं शरणं गताः ||
११४ ख
दमय़न्त्यु उवाच:
यक्षी वा राक्षसी वा त्वमुताहोऽसि वराङ्गना |
११५ क
दमय़न्त्यु उवाच:
सर्वथा कुरु नः स्वस्ति रक्षस्वास्माननिन्दिते ||
११५ ख
दमय़न्त्यु उवाच:
यथाय़ं सर्वथा सार्थः क्षेमी शीघ्रमितो व्रजेत् |
११६ क
दमय़न्त्यु उवाच:
तथा विधत्स्व कल्याणि त्वां वय़ं शरणं गताः ||
११६ ख
दमय़न्त्यु उवाच:
तथोक्ता तेन सार्थेन दमय़न्ती नृपात्मजा |
११७ क
दमय़न्त्यु उवाच:
प्रत्युवाच ततः साध्वी भर्तृव्यसनदुःखिता |
११७ ख
दमय़न्त्यु उवाच:
सार्थवाहं च सार्थं च जना ये चात्र केचन ||
११७ ग
दमय़न्त्यु उवाच:
यूनः स्थविरवालाश्च सार्थस्य च पुरोगमाः |
११८ क
दमय़न्त्यु उवाच:
मानुषीं मां विजानीत मनुजाधिपतेः सुताम् |
११८ ख
दमय़न्त्यु उवाच:
नृपस्नुषां राजभार्यां भर्तृदर्शनलालसाम् ||
११८ ग
दमय़न्त्यु उवाच:
विदर्भराण्मम पिता भर्ता राजा च नैषधः |
११९ क
दमय़न्त्यु उवाच:
नलो नाम महाभागस्तं मार्गाम्यपराजितम् ||
११९ ख
दमय़न्त्यु उवाच:
यदि जानीत नृपतिं क्षिप्रं शंसत मे प्रिय़म् |
१२० क
दमय़न्त्यु उवाच:
नलं पार्थिवशार्दूलममित्रगणसूदनम् ||
१२० ख
दमय़न्त्यु उवाच:
तामुवाचानवद्याङ्गीं सार्थस्य महतः प्रभुः |
१२१ क
दमय़न्त्यु उवाच:
सार्थवाहः शुचिर्नाम शृणु कल्याणि मद्वचः ||
१२१ ख
दमय़न्त्यु उवाच:
अहं सार्थस्य नेता वै सार्थवाहः शुचिस्मिते |
१२२ क
दमय़न्त्यु उवाच:
मनुष्यं नलनामानं न पश्यामि यशस्विनि ||
१२२ ख
दमय़न्त्यु उवाच:
कुञ्जरद्वीपिमहिषशार्दूलर्क्षमृगानपि |
१२३ क
दमय़न्त्यु उवाच:
पश्याम्यस्मिन्वने कष्टे अमनुष्यनिषेविते |
१२३ ख
दमय़न्त्यु उवाच:
तथा नो यक्षराडद्य मणिभद्रः प्रसीदतु ||
१२३ ग
दमय़न्त्यु उवाच:
साव्रवीद्वणिजः सर्वान्सार्थवाहं च तं ततः |
१२४ क
दमय़न्त्यु उवाच:
क्व नु यास्यसि सार्थोऽय़मेतदाख्यातुमर्हथ ||
१२४ ख
सार्थवाह उवाच:
सार्थोऽय़ं चेदिराजस्य सुवाहोः सत्यवादिनः |
१२५ क
सार्थवाह उवाच:
क्षिप्रं जनपदं गन्ता लाभाय़ मनुजात्मजे ||
१२५ ख