भीष्म उवाच:
आश्रमाणां महावाहो शृणु सत्यपराक्रम |
१ क
भीष्म उवाच:
चतुर्णामिह वर्णानां कर्माणि च युधिष्ठिर ||
१ ख
भीष्म उवाच:
वानप्रस्थं भैक्षचर्यां गार्हस्थ्यं च महाश्रमम् |
२ क
भीष्म उवाच:
व्रह्मचर्याश्रमं प्राहुश्चतुर्थं व्राह्मणैर्वृतम् ||
२ ख
भीष्म उवाच:
जटाकरणसंस्कारं द्विजातित्वमवाप्य च |
३ क
भीष्म उवाच:
आधानादीनि कर्माणि प्राप्य वेदमधीत्य च ||
३ ख
भीष्म उवाच:
सदारो वाप्यदारो वा आत्मवान्संय़तेन्द्रिय़ः |
४ क
भीष्म उवाच:
वानप्रस्थाश्रमं गच्छेत्कृतकृत्यो गृहाश्रमात् ||
४ ख
भीष्म उवाच:
तत्रारण्यकशास्त्राणि समधीत्य स धर्मवित् |
५ क
भीष्म उवाच:
ऊर्ध्वरेताः प्रजाय़ित्वा गच्छत्यक्षरसात्मताम् ||
५ ख
भीष्म उवाच:
एतान्येव निमित्तानि मुनीनामूर्ध्वरेतसाम् |
६ क
भीष्म उवाच:
कर्तव्यानीह विप्रेण राजन्नादौ विपश्चिता ||
६ ख
भीष्म उवाच:
चरितव्रह्मचर्यस्य व्राह्मणस्य विशां पते |
७ क
भीष्म उवाच:
भैक्षचर्यास्वधीकारः प्रशस्त इह मोक्षिणः ||
७ ख
भीष्म उवाच:
यत्रास्तमितशाय़ी स्यान्निरग्निरनिकेतनः |
८ क
भीष्म उवाच:
यथोपलव्धजीवी स्यान्मुनिर्दान्तो जितेन्द्रिय़ः ||
८ ख
भीष्म उवाच:
निराशीः स्यात्सर्वसमो निर्भोगो निर्विकारवान् |
९ क
भीष्म उवाच:
विप्रः क्षेमाश्रमं प्राप्तो गच्छत्यक्षरसात्मताम् ||
९ ख
भीष्म उवाच:
अधीत्य वेदान्कृतसर्वकृत्यः; सन्तानमुत्पाद्य सुखानि भुक्त्वा |
१० क
भीष्म उवाच:
समाहितः प्रचरेद्दुश्चरं तं; गार्हस्थ्यधर्मं मुनिधर्मदृष्टम् ||
१० ख
भीष्म उवाच:
स्वदारतुष्ट ऋतुकालगामी; निय़ोगसेवी नशठो नजिह्मः |
११ क
भीष्म उवाच:
मिताशनो देवपरः कृतज्ञः; सत्यो मृदुश्चानृशंसः क्षमावान् ||
११ ख
भीष्म उवाच:
दान्तो विधेय़ो हव्यकव्येऽप्रमत्तो; अन्नस्य दाता सततं द्विजेभ्यः |
१२ क
भीष्म उवाच:
अमत्सरी सर्वलिङ्गिप्रदाता; वैताननित्यश्च गृहाश्रमी स्यात् ||
१२ ख
भीष्म उवाच:
अथात्र नाराय़णगीतमाहु; र्महर्षय़स्तात महानुभावाः |
१३ क
भीष्म उवाच:
महार्थमत्यर्थतपःप्रय़ुक्तं; तदुच्यमानं हि मय़ा निवोध ||
१३ ख
भीष्म उवाच:
सत्यार्जवं चातिथिपूजनं च; धर्मस्तथार्थश्च रतिश्च दारे |
१४ क
भीष्म उवाच:
निषेवितव्यानि सुखानि लोके; ह्यस्मिन्परे चैव मतं ममैतत् ||
१४ ख
भीष्म उवाच:
भरणं पुत्रदाराणां वेदानां पारणं तथा |
१५ क
भीष्म उवाच:
सतां तमाश्रमं श्रेष्ठं वदन्ति परमर्षय़ः ||
१५ ख
भीष्म उवाच:
एवं हि यो व्राह्मणो यज्ञशीलो; गार्हस्थ्यमध्यावसते यथावत् |
१६ क
भीष्म उवाच:
गृहस्थवृत्तिं प्रविशोध्य सम्य; क्स्वर्गे विषुद्धं फलमाप्नुते सः ||
१६ ख
भीष्म उवाच:
तस्य देहपरित्यागादिष्टाः कामाक्षय़ा मताः |
१७ क
भीष्म उवाच:
आनन्त्याय़ोपतिष्ठन्ति सर्वतोक्षिशिरोमुखाः ||
१७ ख
भीष्म उवाच:
खादन्नेको जपन्नेकः सर्पन्नेको युधिष्ठिर |
१८ क
भीष्म उवाच:
एकस्मिन्नेव आचार्ये शुश्रूषुर्मलपङ्कवान् ||
१८ ख
भीष्म उवाच:
व्रह्मचारी व्रती नित्यं नित्यं दीक्षापरो वशी |
१९ क
भीष्म उवाच:
अविचार्य तथा वेदं कृत्यं कुर्वन्वसेत्सदा ||
१९ ख
भीष्म उवाच:
शुश्रूषां सततं कुर्वन्गुरोः सम्प्रणमेत च |
२० क
भीष्म उवाच:
षट्कर्मस्वनिवृत्तश्च नप्रवृत्तश्च सर्वशः ||
२० ख
भीष्म उवाच:
न चरत्यधिकारेण सेवितं द्विषतो न च |
२१ क
भीष्म उवाच:
एषोऽऽश्रमपदस्तात व्रह्मचारिण इष्यते ||
२१ ख