युधिष्ठिर उवाच:
इदं देय़मिदं देय़मितीय़ं श्रुतिचोदना |
१ क
युधिष्ठिर उवाच:
वहुदेय़ाश्च राजानः किं स्विद्देय़मनुत्तमम् ||
१ ख
भीष्म उवाच:
अति दानानि सर्वाणि पृथिवीदानमुच्यते |
२ क
भीष्म उवाच:
अचला ह्यक्षय़ा भूमिर्दोग्ध्री कामाननुत्तमान् ||
२ ख
भीष्म उवाच:
दोग्ध्री वासांसि रत्नानि पशून्व्रीहिय़वांस्तथा |
३ क
भीष्म उवाच:
भूमिदः सर्वभूतेषु शाश्वतीरेधते समाः ||
३ ख
भीष्म उवाच:
यावद्भूमेराय़ुरिह तावद्भूमिद एधते |
४ क
भीष्म उवाच:
न भूमिदानादस्तीह परं किञ्चिद्युधिष्ठिर ||
४ ख
भीष्म उवाच:
अप्यल्पं प्रददुः पूर्वे पृथिव्या इति नः श्रुतम् |
५ क
भीष्म उवाच:
भूमिमेते ददुः सर्वे ये भूमिं भुञ्जते जनाः ||
५ ख
भीष्म उवाच:
स्वकर्मैवोपजीवन्ति नरा इह परत्र च |
६ क
भीष्म उवाच:
भूमिर्भूतिर्महादेवी दातारं कुरुते प्रिय़म् ||
६ ख
भीष्म उवाच:
य एतां दक्षिणां दद्यादक्षय़ां पृथिवीपतिः |
७ क
भीष्म उवाच:
पुनर्नरत्वं सम्प्राप्य भवेत्स पृथिवीपतिः ||
७ ख
भीष्म उवाच:
यथा दानं तथा भोग इति धर्मेषु निश्चय़ः |
८ क
भीष्म उवाच:
सङ्ग्रामे वा तनुं जह्याद्दद्याद्वा पृथिवीमिमाम् ||
८ ख
भीष्म उवाच:
इत्येतां क्षत्रवन्धूनां वदन्ति परमाशिषम् |
९ क
भीष्म उवाच:
पुनाति दत्ता पृथिवी दातारमिति शुश्रुम ||
९ ख
भीष्म उवाच:
अपि पापसमाचारं व्रह्मघ्नमपि वानृतम् |
१० क
भीष्म उवाच:
सैव पापं पावय़ति सैव पापात्प्रमोचय़ेत् ||
१० ख
भीष्म उवाच:
अपि पापकृतां राज्ञां प्रतिगृह्णन्ति साधवः |
११ क
भीष्म उवाच:
पृथिवीं नान्यदिच्छन्ति पावनं जननी यथा ||
११ ख
भीष्म उवाच:
नामास्याः प्रिय़दत्तेति गुह्यं देव्याः सनातनम् |
१२ क
भीष्म उवाच:
दानं वाप्यथ वा ज्ञानं नाम्नोऽस्याः परमं प्रिय़म् |
१२ ख
भीष्म उवाच:
तस्मात्प्राप्यैव पृथिवीं दद्याद्विप्राय़ पार्थिवः ||
१२ ग
भीष्म उवाच:
नाभूमिपतिना भूमिरधिष्ठेय़ा कथञ्चन |
१३ क
भीष्म उवाच:
न वा पात्रेण वा गूहेदन्तर्धानेन वा चरेत् |
१३ ख
भीष्म उवाच:
ये चान्ये भूमिमिच्छेय़ुः कुर्युरेवमसंशय़म् ||
१३ ग
भीष्म उवाच:
यः साधोर्भूमिमादत्ते न भूमिं विन्दते तु सः |
१४ क
भीष्म उवाच:
भूमिं तु दत्त्वा साधुभ्यो विन्दते भूमिमेव हि |
१४ ख
भीष्म उवाच:
प्रेत्येह च स धर्मात्मा सम्प्राप्नोति महद्यशः ||
१४ ग
भीष्म उवाच:
यस्य विप्रानुशासन्ति साधोर्भूमिं सदैव हि |
१५ क
भीष्म उवाच:
न तस्य शत्रवो राजन्प्रशासन्ति वसुन्धराम् ||
१५ ख
भीष्म उवाच:
यत्किञ्चित्पुरुषः पापं कुरुते वृत्तिकर्शितः |
१६ क
भीष्म उवाच:
अपि गोचर्ममात्रेण भूमिदानेन पूय़ते ||
१६ ख
भीष्म उवाच:
येऽपि सङ्कीर्णकर्माणो राजानो रौद्रकर्मिणः |
१७ क
भीष्म उवाच:
तेभ्यः पवित्रमाख्येय़ं भूमिदानमनुत्तमम् ||
१७ ख
भीष्म उवाच:
अल्पान्तरमिदं शश्वत्पुराणा मेनिरे जनाः |
१८ क
भीष्म उवाच:
यो यजेदश्वमेधेन दद्याद्वा साधवे महीम् ||
१८ ख
भीष्म उवाच:
अपि चेत्सुकृतं कृत्वा शङ्केरन्नपि पण्डिताः |
१९ क
भीष्म उवाच:
अशक्यमेकमेवैतद्भूमिदानमनुत्तमम् ||
१९ ख
भीष्म उवाच:
सुवर्णं रजतं वस्त्रं मणिमुक्तावसूनि च |
२० क
भीष्म उवाच:
सर्वमेतन्महाप्राज्ञ ददाति वसुधां ददत् ||
२० ख
भीष्म उवाच:
तपो यज्ञः श्रुतं शीलमलोभः सत्यसन्धता |
२१ क
भीष्म उवाच:
गुरुदैवतपूजा च नातिवर्तन्ति भूमिदम् ||
२१ ख
भीष्म उवाच:
भर्तुर्निःश्रेय़से युक्तास्त्यक्तात्मानो रणे हताः |
२२ क
भीष्म उवाच:
व्रह्मलोकगताः सिद्धा नातिक्रामन्ति भूमिदम् ||
२२ ख
भीष्म उवाच:
यथा जनित्री क्षीरेण स्वपुत्रं भरते सदा |
२३ क
भीष्म उवाच:
अनुगृह्णाति दातारं तथा सर्वरसैर्मही ||
२३ ख
भीष्म उवाच:
मृत्योर्वै किङ्करो दण्डस्तापो वह्नेः सुदारुणः |
२४ क
भीष्म उवाच:
घोराश्च वारुणाः पाशा नोपसर्पन्ति भूमिदम् ||
२४ ख
भीष्म उवाच:
पितॄंश्च पितृलोकस्थान्देवलोके च देवताः |
२५ क
भीष्म उवाच:
सन्तर्पय़ति शान्तात्मा यो ददाति वसुन्धराम् ||
२५ ख
भीष्म उवाच:
कृशाय़ म्रिय़माणाय़ वृत्तिम्लानाय़ सीदते |
२६ क
भीष्म उवाच:
भूमिं वृत्तिकरीं दत्त्वा सत्री भवति मानवः ||
२६ ख
भीष्म उवाच:
यथा धावति गौर्वत्सं क्षीरमभ्युत्सृजन्त्युत |
२७ क
भीष्म उवाच:
एवमेव महाभाग भूमिर्भवति भूमिदम् ||
२७ ख
भीष्म उवाच:
हलकृष्टां महीं दत्त्वा सवीजां सफलामपि |
२८ क
भीष्म उवाच:
उदीर्णं वापि शरणं तथा भवति कामदः ||
२८ ख
भीष्म उवाच:
व्राह्मणं वृत्तसम्पन्नमाहिताग्निं शुचिव्रतम् |
२९ क
भीष्म उवाच:
नरः प्रतिग्राह्य महीं न याति यमसादनम् ||
२९ ख
भीष्म उवाच:
यथा चन्द्रमसो वृद्धिरहन्यहनि जाय़ते |
३० क
भीष्म उवाच:
तथा भूमिकृतं दानं सस्ये सस्ये विवर्धते ||
३० ख
भीष्म उवाच:
अत्र गाथा भूमिगीताः कीर्तय़न्ति पुराविदः |
३१ क
भीष्म उवाच:
याः श्रुत्वा जामदग्न्येन दत्ता भूः काश्यपाय़ वै ||
३१ ख
भीष्म उवाच:
मामेवादत्त मां दत्त मां दत्त्वा मामवाप्स्यथ |
३२ क
भीष्म उवाच:
अस्मिँल्लोके परे चैव ततश्चाजनने पुनः ||
३२ ख
भीष्म उवाच:
य इमां व्याहृतिं वेद व्राह्मणो व्रह्मसंश्रितः |
३३ क
भीष्म उवाच:
श्राद्धस्य हूय़मानस्य व्रह्मभूय़ं स गच्छति ||
३३ ख
भीष्म उवाच:
कृत्यानामभिशस्तानां दुरिष्टशमनं महत् |
३४ क
भीष्म उवाच:
प्राय़श्चित्तमहं कृत्वा पुनात्युभय़तो दश ||
३४ ख
भीष्म उवाच:
पुनाति य इदं वेद वेद चाहं तथैव च |
३५ क
भीष्म उवाच:
प्रकृतिः सर्वभूतानां भूमिर्वै शाश्वती मता ||
३५ ख
भीष्म उवाच:
अभिषिच्यैव नृपतिं श्रावय़ेदिममागमम् |
३६ क
भीष्म उवाच:
यथा श्रुत्वा महीं दद्यान्नादद्यात्साधुतश्च ताम् ||
३६ ख
भीष्म उवाच:
सोऽय़ं कृत्स्नो व्राह्मणार्थो राजार्थश्चाप्यसंशय़म् |
३७ क
भीष्म उवाच:
राजा हि धर्मकुशलः प्रथमं भूतिलक्षणम् ||
३७ ख
भीष्म उवाच:
अथ येषामधर्मज्ञो राजा भवति नास्तिकः |
३८ क
भीष्म उवाच:
न ते सुखं प्रवुध्यन्ते न सुखं प्रस्वपन्ति च ||
३८ ख
भीष्म उवाच:
सदा भवन्ति चोद्विग्नास्तस्य दुश्चरितैर्नराः |
३९ क
भीष्म उवाच:
योगक्षेमा हि वहवो राष्ट्रं नास्याविशन्ति तत् ||
३९ ख
भीष्म उवाच:
अथ येषां पुनः प्राज्ञो राजा भवति धार्मिकः |
४० क
भीष्म उवाच:
सुखं ते प्रतिवुध्यन्ते सुसुखं प्रस्वपन्ति च ||
४० ख
भीष्म उवाच:
तस्य राज्ञः शुभैरार्यैः कर्मभिर्निर्वृताः प्रजाः |
४१ क
भीष्म उवाच:
योगक्षेमेण वृष्ट्या च विवर्धन्ते स्वकर्मभिः ||
४१ ख
भीष्म उवाच:
स कुलीनः स पुरुषः स वन्धुः स च पुण्यकृत् |
४२ क
भीष्म उवाच:
स दाता स च विक्रान्तो यो ददाति वसुन्धराम् ||
४२ ख
भीष्म उवाच:
आदित्या इव दीप्यन्ते तेजसा भुवि मानवाः |
४३ क
भीष्म उवाच:
ददन्ति वसुधां स्फीतां ये वेदविदुषि द्विजे ||
४३ ख
भीष्म उवाच:
यथा वीजानि रोहन्ति प्रकीर्णानि महीतले |
४४ क
भीष्म उवाच:
तथा कामाः प्ररोहन्ति भूमिदानसमार्जिताः ||
४४ ख
भीष्म उवाच:
आदित्यो वरुणो विष्णुर्व्रह्मा सोमो हुताशनः |
४५ क
भीष्म उवाच:
शूलपाणिश्च भगवान्प्रतिनन्दन्ति भूमिदम् ||
४५ ख
भीष्म उवाच:
भूमौ जाय़न्ति पुरुषा भूमौ निष्ठां व्रजन्ति च |
४६ क
भीष्म उवाच:
चतुर्विधो हि लोकोऽय़ं योऽय़ं भूमिगुणात्मकः ||
४६ ख
भीष्म उवाच:
एषा माता पिता चैव जगतः पृथिवीपते |
४७ क
भीष्म उवाच:
नानय़ा सदृशं भूतं किञ्चिदस्ति जनाधिप ||
४७ ख
भीष्म उवाच:
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् |
४८ क
भीष्म उवाच:
वृहस्पतेश्च संवादमिन्द्रस्य च युधिष्ठिर ||
४८ ख
भीष्म उवाच:
इष्ट्वा क्रतुशतेनाथ महता दक्षिणावता |
४९ क