वृहदश्व उवाच:
सा निहत्य मृगव्याधं प्रतस्थे कमलेक्षणा |
१ क
वृहदश्व उवाच:
वनं प्रतिभय़ं शून्यं झिल्लिकागणनादितम् ||
१ ख
वृहदश्व उवाच:
सिंहव्याघ्रवराहर्क्षरुरुद्वीपिनिषेवितम् |
२ क
वृहदश्व उवाच:
नानापक्षिगणाकीर्णं म्लेच्छतस्करसेवितम् ||
२ ख
वृहदश्व उवाच:
शालवेणुधवाश्वत्थतिन्दुकेङ्गुदकिंशुकैः |
३ क
वृहदश्व उवाच:
अर्जुनारिष्टसञ्छन्नं चन्दनैश्च सशाल्मलैः ||
३ ख
वृहदश्व उवाच:
जम्व्वाम्रलोध्रखदिरशाकवेत्रसमाकुलम् |
४ क
वृहदश्व उवाच:
काश्मर्यामलकप्लक्षकदम्वोदुम्वरावृतम् ||
४ ख
वृहदश्व उवाच:
वदरीविल्वसञ्छन्नं न्यग्रोधैश्च समाकुलम् |
५ क
वृहदश्व उवाच:
प्रिय़ालतालखर्जूरहरीतकविभीतकैः ||
५ ख
वृहदश्व उवाच:
नानाधातुशतैर्नद्धान्विविधानपि चाचलान् |
६ क
वृहदश्व उवाच:
निकुञ्जान्पक्षिसङ्घुष्टान्दरीश्चाद्भुतदर्शनाः |
६ ख
वृहदश्व उवाच:
नदीः सरांसि वापीश्च विविधांश्च मृगद्विजान् ||
६ ग
वृहदश्व उवाच:
सा वहून्भीमरूपांश्च पिशाचोरगराक्षसान् |
७ क
वृहदश्व उवाच:
पल्वलानि तडागानि गिरिकूटानि सर्वशः |
७ ख
वृहदश्व उवाच:
सरितः सागरांश्चैव ददर्शाद्भुतदर्शनान् ||
७ ग
वृहदश्व उवाच:
यूथशो ददृशे चात्र विदर्भाधिपनन्दिनी |
८ क
वृहदश्व उवाच:
महिषान्वराहान्गोमाय़ूनृक्षवानरपन्नगान् ||
८ ख
वृहदश्व उवाच:
तेजसा यशसा स्थित्या श्रिय़ा च परय़ा युता |
९ क
वृहदश्व उवाच:
वैदर्भी विचरत्येका नलमन्वेषती तदा ||
९ ख
वृहदश्व उवाच:
नाविभ्यत्सा नृपसुता भैमी तत्राथ कस्यचित् |
१० क
वृहदश्व उवाच:
दारुणामटवीं प्राप्य भर्तृव्यसनकर्शिता ||
१० ख
वृहदश्व उवाच:
विदर्भतनय़ा राजन्विललाप सुदुःखिता |
११ क
वृहदश्व उवाच:
भर्तृशोकपरीताङ्गी शिलातलसमाश्रिता ||
११ ख
दमय़न्त्यु उवाच:
सिंहोरस्क महावाहो निषधानां जनाधिप |
१२ क
दमय़न्त्यु उवाच:
क्व नु राजन्गतोऽसीह त्यक्त्वा मां निर्जने वने ||
१२ ख
दमय़न्त्यु उवाच:
अश्वमेधादिभिर्वीर क्रतुभिः स्वाप्तदक्षिणैः |
१३ क
दमय़न्त्यु उवाच:
कथमिष्ट्वा नरव्याघ्र मय़ि मिथ्या प्रवर्तसे ||
१३ ख
दमय़न्त्यु उवाच:
यत्त्वय़ोक्तं नरव्याघ्र मत्समक्षं महाद्युते |
१४ क
दमय़न्त्यु उवाच:
कर्तुमर्हसि कल्याण तदृतं पार्थिवर्षभ ||
१४ ख
दमय़न्त्यु उवाच:
यथोक्तं विहगैर्हंसैः समीपे तव भूमिप |
१५ क
दमय़न्त्यु उवाच:
मत्सकाशे च तैरुक्तं तदवेक्षितुमर्हसि ||
१५ ख
दमय़न्त्यु उवाच:
चत्वार एकतो वेदाः साङ्गोपाङ्गाः सविस्तराः |
१६ क
दमय़न्त्यु उवाच:
स्वधीता मानवश्रेष्ठ सत्यमेकं किलैकतः ||
१६ ख
दमय़न्त्यु उवाच:
तस्मादर्हसि शत्रुघ्न सत्यं कर्तुं नरेश्वर |
१७ क
दमय़न्त्यु उवाच:
उक्तवानसि यद्वीर मत्सकाशे पुरा वचः ||
१७ ख
दमय़न्त्यु उवाच:
हा वीर ननु नामाहमिष्टा किल तवानघ |
१८ क
दमय़न्त्यु उवाच:
अस्यामटव्यां घोराय़ां किं मां न प्रतिभाषसे ||
१८ ख
दमय़न्त्यु उवाच:
भर्त्सय़त्येष मां रौद्रो व्यात्तास्यो दारुणाकृतिः |
१९ क
दमय़न्त्यु उवाच:
अरण्यराट्क्षुधाविष्टः किं मां न त्रातुमर्हसि ||
१९ ख
दमय़न्त्यु उवाच:
न मे त्वदन्या सुभगे प्रिय़ा इत्यव्रवीस्तदा |
२० क
दमय़न्त्यु उवाच:
तामृतां कुरु कल्याण पुरोक्तां भारतीं नृप ||
२० ख
दमय़न्त्यु उवाच:
उन्मत्तां विलपन्तीं मां भार्यामिष्टां नराधिप |
२१ क
दमय़न्त्यु उवाच:
ईप्सितामीप्सितो नाथ किं मां न प्रतिभाषसे ||
२१ ख
दमय़न्त्यु उवाच:
कृशां दीनां विवर्णां च मलिनां वसुधाधिप |
२२ क
दमय़न्त्यु उवाच:
वस्त्रार्धप्रावृतामेकां विलपन्तीमनाथवत् ||
२२ ख
दमय़न्त्यु उवाच:
यूथभ्रष्टामिवैकां मां हरिणीं पृथुलोचन |
२३ क
दमय़न्त्यु उवाच:
न मानय़सि मानार्ह रुदतीमरिकर्शन ||
२३ ख
दमय़न्त्यु उवाच:
महाराज महारण्ये मामिहैकाकिनीं सतीम् |
२४ क
दमय़न्त्यु उवाच:
आभाषमाणां स्वां पत्नीं किं मां न प्रतिभाषसे ||
२४ ख
दमय़न्त्यु उवाच:
कुलशीलोपसम्पन्नं चारुसर्वाङ्गशोभनम् |
२५ क
दमय़न्त्यु उवाच:
नाद्य त्वामनुपश्यामि गिरावस्मिन्नरोत्तम |
२५ ख
दमय़न्त्यु उवाच:
वने चास्मिन्महाघोरे सिंहव्याघ्रनिषेविते ||
२५ ग
दमय़न्त्यु उवाच:
शय़ानमुपविष्टं वा स्थितं वा निषधाधिप |
२६ क
दमय़न्त्यु उवाच:
प्रस्थितं वा नरश्रेष्ठ मम शोकविवर्धन ||
२६ ख
दमय़न्त्यु उवाच:
कं नु पृच्छामि दुःखार्ता त्वदर्थे शोककर्शिता |
२७ क
दमय़न्त्यु उवाच:
कच्चिद्दृष्टस्त्वय़ारण्ये सङ्गत्येह नलो नृपः ||
२७ ख
दमय़न्त्यु उवाच:
को नु मे कथय़ेदद्य वनेऽस्मिन्विष्ठितं नलम् |
२८ क
दमय़न्त्यु उवाच:
अभिरूपं महात्मानं परव्यूहविनाशनम् ||
२८ ख
दमय़न्त्यु उवाच:
यमन्वेषसि राजानं नलं पद्मनिभेक्षणम् |
२९ क
दमय़न्त्यु उवाच:
अय़ं स इति कस्याद्य श्रोष्यामि मधुरां गिरम् ||
२९ ख
दमय़न्त्यु उवाच:
अरण्यराडय़ं श्रीमांश्चतुर्दंष्ट्रो महाहनुः |
३० क
दमय़न्त्यु उवाच:
शार्दूलोऽभिमुखः प्रैति पृच्छाम्येनमशङ्किता ||
३० ख
दमय़न्त्यु उवाच:
भवान्मृगाणामधिपस्त्वमस्मिन्कानने प्रभुः |
३१ क
दमय़न्त्यु उवाच:
विदर्भराजतनय़ां दमय़न्तीति विद्धि माम् ||
३१ ख
दमय़न्त्यु उवाच:
निषधाधिपतेर्भार्यां नलस्यामित्रघातिनः |
३२ क
दमय़न्त्यु उवाच:
पतिमन्वेषतीमेकां कृपणां शोककर्शिताम् |
३२ ख
दमय़न्त्यु उवाच:
आश्वासय़ मृगेन्द्रेह यदि दृष्टस्त्वय़ा नलः ||
३२ ग
दमय़न्त्यु उवाच:
अथ वारण्यनृपते नलं यदि न शंससि |
३३ क
दमय़न्त्यु उवाच:
मामदस्व मृगश्रेष्ठ विशोकां कुरु दुःखिताम् ||
३३ ख
दमय़न्त्यु उवाच:
श्रुत्वारण्ये विलपितं ममैष मृगराट्स्वय़म् |
३४ क
दमय़न्त्यु उवाच:
यात्येतां मृष्टसलिलामापगां सागरङ्गमाम् ||
३४ ख
दमय़न्त्यु उवाच:
इमं शिलोच्चय़ं पुण्यं शृङ्गैर्वहुभिरुच्छ्रितैः |
३५ क
दमय़न्त्यु उवाच:
विराजद्भिर्दिवस्पृग्भिर्नैकवर्णैर्मनोरमैः ||
३५ ख
दमय़न्त्यु उवाच:
नानाधातुसमाकीर्णं विविधोपलभूषितम् |
३६ क
दमय़न्त्यु उवाच:
अस्यारण्यस्य महतः केतुभूतमिवोच्छ्रितम् ||
३६ ख
दमय़न्त्यु उवाच:
सिंहशार्दूलमातङ्गवराहर्क्षमृगाय़ुतम् |
३७ क
दमय़न्त्यु उवाच:
पतत्रिभिर्वहुविधैः समन्तादनुनादितम् ||
३७ ख
दमय़न्त्यु उवाच:
किंशुकाशोकवकुलपुंनागैरुपशोभितम् |
३८ क
दमय़न्त्यु उवाच:
सरिद्भिः सविहङ्गाभिः शिखरैश्चोपशोभितम् |
३८ ख
दमय़न्त्यु उवाच:
गिरिराजमिमं तावत्पृच्छामि नृपतिं प्रति ||
३८ ग
दमय़न्त्यु उवाच:
भगवन्नचलश्रेष्ठ दिव्यदर्शन विश्रुत |
३९ क
दमय़न्त्यु उवाच:
शरण्य वहुकल्याण नमस्तेऽस्तु महीधर ||
३९ ख
दमय़न्त्यु उवाच:
प्रणमे त्वाभिगम्याहं राजपुत्रीं निवोध माम् |
४० क
दमय़न्त्यु उवाच:
राज्ञः स्नुषां राजभार्यां दमय़न्तीति विश्रुताम् ||
४० ख
दमय़न्त्यु उवाच:
राजा विदर्भाधिपतिः पिता मम महारथः |
४१ क
दमय़न्त्यु उवाच:
भीमो नाम क्षितिपतिश्चातुर्वर्ण्यस्य रक्षिता ||
४१ ख
दमय़न्त्यु उवाच:
राजसूय़ाश्वमेधानां क्रतूनां दक्षिणावताम् |
४२ क
दमय़न्त्यु उवाच:
आहर्ता पार्थिवश्रेष्ठः पृथुचार्वञ्चितेक्षणः ||
४२ ख
दमय़न्त्यु उवाच:
व्रह्मण्यः साधुवृत्तश्च सत्यवागनसूय़कः |
४३ क
दमय़न्त्यु उवाच:
शीलवान्सुसमाचारः पृथुश्रीर्धर्मविच्छुचिः ||
४३ ख
दमय़न्त्यु उवाच:
सम्यग्गोप्ता विदर्भाणां निर्जितारिगणः प्रभुः |
४४ क
दमय़न्त्यु उवाच:
तस्य मां विद्धि तनय़ां भगवंस्त्वामुपस्थिताम् ||
४४ ख
दमय़न्त्यु उवाच:
निषधेषु महाशैल श्वशुरो मे नृपोत्तमः |
४५ क
दमय़न्त्यु उवाच:
सुगृहीतनामा विख्यातो वीरसेन इति स्म ह ||
४५ ख
दमय़न्त्यु उवाच:
तस्य राज्ञः सुतो वीरः श्रीमान्सत्यपराक्रमः |
४६ क
दमय़न्त्यु उवाच:
क्रमप्राप्तं पितुः स्वं यो राज्यं समनुशास्ति ह ||
४६ ख
दमय़न्त्यु उवाच:
नलो नामारिदमनः पुण्यश्लोक इति श्रुतः |
४७ क
दमय़न्त्यु उवाच:
व्रह्मण्यो वेदविद्वाग्मी पुण्यकृत्सोमपोऽग्निचित् ||
४७ ख
दमय़न्त्यु उवाच:
यष्टा दाता च योद्धा च सम्यक्चैव प्रशासिता |
४८ क