chevron_left उद्योग पर्व अध्याय ६२
दुर्योधन उवाच:
सदृशानां मनुष्येषु सर्वेषां तुल्यजन्मनाम् |
१ क
दुर्योधन उवाच:
कथमेकान्ततस्तेषां पार्थानां मन्यसे जय़म् ||
१ ख
दुर्योधन उवाच:
सर्वे स्म समजातीय़ाः सर्वे मानुषय़ोनय़ः |
२ क
दुर्योधन उवाच:
पितामह विजानीषे पार्थेषु विजय़ं कथम् ||
२ ख
दुर्योधन उवाच:
नाहं भवति न द्रोणे न कृपे न च वाह्लिके |
३ क
दुर्योधन उवाच:
अन्येषु च नरेन्द्रेषु पराक्रम्य समारभे ||
३ ख
दुर्योधन उवाच:
अहं वैकर्तनः कर्णो भ्राता दुःशासनश्च मे |
४ क
दुर्योधन उवाच:
पाण्डवान्समरे पञ्च हनिष्यामः शितैः शरैः ||
४ ख
दुर्योधन उवाच:
ततो राजन्महाय़ज्ञैर्विविधैर्भूरिदक्षिणैः |
५ क
दुर्योधन उवाच:
व्राह्मणांस्तर्पय़िष्यामि गोभिरश्वैर्धनेन च ||
५ ख
विदुर उवाच:
शकुनीनामिहार्थाय़ पाशं भूमावय़ोजय़त् |
६ क
विदुर उवाच:
कश्चिच्छाकुनिकस्तात पूर्वेषामिति शुश्रुम ||
६ ख
विदुर उवाच:
तस्मिन्द्वौ शकुनौ वद्धौ युगपत्समपौरुषौ |
७ क
विदुर उवाच:
तावुपादाय़ तं पाशं जग्मतुः खचरावुभौ ||
७ ख
विदुर उवाच:
तौ विहाय़समाक्रान्तौ दृष्ट्वा शाकुनिकस्तदा |
८ क
विदुर उवाच:
अन्वधावदनिर्विण्णो येन येन स्म गच्छतः ||
८ ख
विदुर उवाच:
तथा तमनुधावन्तं मृगय़ुं शकुनार्थिनम् |
९ क
विदुर उवाच:
आश्रमस्थो मुनिः कश्चिद्ददर्शाथ कृताह्निकः ||
९ ख
विदुर उवाच:
तावन्तरिक्षगौ शीघ्रमनुय़ान्तं महीचरम् |
१० क
विदुर उवाच:
श्लोकेनानेन कौरव्य पप्रच्छ स मुनिस्तदा ||
१० ख
विदुर उवाच:
विचित्रमिदमाश्चर्यं मृगहन्प्रतिभाति मे |
११ क
विदुर उवाच:
प्लवमानौ हि खचरौ पदातिरनुधावसि ||
११ ख
शाकुनिक उवाच:
पाशमेकमुभावेतौ सहितौ हरतो मम |
१२ क
शाकुनिक उवाच:
यत्र वै विवदिष्येते तत्र मे वशमेष्यतः ||
१२ ख
विदुर उवाच:
तौ विवादमनुप्राप्तौ शकुनौ मृत्युसन्धितौ |
१३ क
विदुर उवाच:
विगृह्य च सुदुर्वुद्धी पृथिव्यां संनिपेततुः ||
१३ ख
विदुर उवाच:
तौ युध्यमानौ संरव्धौ मृत्युपाशवशानुगौ |
१४ क
विदुर उवाच:
उपसृत्यापरिज्ञातो जग्राह मृगय़ुस्तदा ||
१४ ख
विदुर उवाच:
एवं ये ज्ञातय़ोऽर्थेषु मिथो गच्छन्ति विग्रहम् |
१५ क
विदुर उवाच:
तेऽमित्रवशमाय़ान्ति शकुनाविव विग्रहात् ||
१५ ख
विदुर उवाच:
सम्भोजनं सङ्कथनं सम्प्रश्नोऽथ समागमः |
१६ क
विदुर उवाच:
एतानि ज्ञातिकार्याणि न विरोधः कदाचन ||
१६ ख
विदुर उवाच:
यस्मिन्काले सुमनसः सर्वे वृद्धानुपासते |
१७ क
विदुर उवाच:
सिंहगुप्तमिवारण्यमप्रधृष्या भवन्ति ते ||
१७ ख
विदुर उवाच:
येऽर्थं सन्ततमासाद्य दीना इव समासते |
१८ क
विदुर उवाच:
श्रिय़ं ते सम्प्रय़च्छन्ति द्विषद्भ्यो भरतर्षभ ||
१८ ख
विदुर उवाच:
धूमाय़न्ते व्यपेतानि ज्वलन्ति सहितानि च |
१९ क
विदुर उवाच:
धृतराष्ट्रोल्मुकानीव ज्ञातय़ो भरतर्षभ ||
१९ ख
विदुर उवाच:
इदमन्यत्प्रवक्ष्यामि यथा दृष्टं गिरौ मय़ा |
२० क
विदुर उवाच:
श्रुत्वा तदपि कौरव्य यथा श्रेय़स्तथा कुरु ||
२० ख
विदुर उवाच:
वय़ं किरातैः सहिता गच्छामो गिरिमुत्तरम् |
२१ क
विदुर उवाच:
व्राह्मणैर्देवकल्पैश्च विद्याजम्भकवातिकैः ||
२१ ख
विदुर उवाच:
कुञ्जभूतं गिरिं सर्वमभितो गन्धमादनम् |
२२ क
विदुर उवाच:
दीप्यमानौषधिगणं सिद्धगन्धर्वसेवितम् ||
२२ ख
विदुर उवाच:
तत्र पश्यामहे सर्वे मधु पीतममाक्षिकम् |
२३ क
विदुर उवाच:
मरुप्रपाते विषमे निविष्टं कुम्भसंमितम् ||
२३ ख
विदुर उवाच:
आशीविषै रक्ष्यमाणं कुवेरदय़ितं भृशम् |
२४ क
विदुर उवाच:
यत्प्राश्य पुरुषो मर्त्यो अमरत्वं निगच्छति ||
२४ ख
विदुर उवाच:
अचक्षुर्लभते चक्षुर्वृद्धो भवति वै युवा |
२५ क
विदुर उवाच:
इति ते कथय़न्ति स्म व्राह्मणा जम्भसाधकाः ||
२५ ख
विदुर उवाच:
ततः किरातास्तद्दृष्ट्वा प्रार्थय़न्तो महीपते |
२६ क
विदुर उवाच:
विनेशुर्विषमे तस्मिन्ससर्पे गिरिगह्वरे ||
२६ ख
विदुर उवाच:
तथैव तव पुत्रोऽय़ं पृथिवीमेक इच्छति |
२७ क
विदुर उवाच:
मधु पश्यति संमोहात्प्रपातं नानुपश्यति ||
२७ ख
विदुर उवाच:
दुर्योधनो योद्धुमनाः समरे सव्यसाचिना |
२८ क
विदुर उवाच:
न च पश्यामि तेजोऽस्य विक्रमं वा तथाविधम् ||
२८ ख
विदुर उवाच:
एकेन रथमास्थाय़ पृथिवी येन निर्जिता |
२९ क
विदुर उवाच:
प्रतीक्षमाणो यो वीरः क्षमते वीक्षितं तव ||
२९ ख
विदुर उवाच:
द्रुपदो मत्स्यराजश्च सङ्क्रुद्धश्च धनञ्जय़ः |
३० क
विदुर उवाच:
न शेषय़ेय़ुः समरे वाय़ुय़ुक्ता इवाग्नय़ः ||
३० ख
विदुर उवाच:
अङ्के कुरुष्व राजानं धृतराष्ट्र युधिष्ठिरम् |
३१ क
विदुर उवाच:
युध्यतोर्हि द्वय़ोर्युद्धे नैकान्तेन भवेज्जय़ः ||
३१ ख