धृतराष्ट्र उवाच:
दुर्योधन विजानीहि यत्त्वां वक्ष्यामि पुत्रक |
१ क
धृतराष्ट्र उवाच:
उत्पथं मन्यसे मार्गमनभिज्ञ इवाध्वगः ||
१ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
पञ्चानां पाण्डुपुत्राणां यत्तेजः प्रमिमीषसि |
२ क
धृतराष्ट्र उवाच:
पञ्चानामिव भूतानां महतां सुमहात्मनाम् ||
२ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
युधिष्ठिरं हि कौन्तेय़ं परं धर्ममिहास्थितम् |
३ क
धृतराष्ट्र उवाच:
परां गतिमसम्प्रेक्ष्य न त्वं वेत्तुमिहार्हसि ||
३ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
भीमसेनं च कौन्तेय़ं यस्य नास्ति समो वले |
४ क
धृतराष्ट्र उवाच:
रणान्तकं तर्कय़से महावातमिव द्रुमः ||
४ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
सर्वशस्त्रभृतां श्रेष्ठं मेरुं शिखरिणामिव |
५ क
धृतराष्ट्र उवाच:
युधि गाण्डीवधन्वानं को नु युध्येत वुद्धिमान् ||
५ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
धृष्टद्युम्नश्च पाञ्चाल्यः कमिवाद्य न शातय़ेत् |
६ क
धृतराष्ट्र उवाच:
शत्रुमध्ये शरान्मुञ्चन्देवराडशनीमिव ||
६ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
सात्यकिश्चापि दुर्धर्षः संमतोऽन्धकवृष्णिषु |
७ क
धृतराष्ट्र उवाच:
ध्वंसय़िष्यति ते सेनां पाण्डवेय़हिते रतः ||
७ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
यः पुनः प्रतिमानेन त्रीँल्लोकानतिरिच्यते |
८ क
धृतराष्ट्र उवाच:
तं कृष्णं पुण्डरीकाक्षं को नु युध्येत वुद्धिमान् ||
८ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
एकतो ह्यस्य दाराश्च ज्ञातय़श्च सवान्धवाः |
९ क
धृतराष्ट्र उवाच:
आत्मा च पृथिवी चेय़मेकतश्च धनञ्जय़ः ||
९ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
वासुदेवोऽपि दुर्धर्षो यतात्मा यत्र पाण्डवः |
१० क
धृतराष्ट्र उवाच:
अविषह्यं पृथिव्यापि तद्वलं यत्र केशवः ||
१० ख
धृतराष्ट्र उवाच:
तिष्ठ तात सतां वाक्ये सुहृदामर्थवादिनाम् |
११ क
धृतराष्ट्र उवाच:
वृद्धं शान्तनवं भीष्मं तितिक्षस्व पितामहम् ||
११ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
मां च व्रुवाणं शुश्रूष कुरूणामर्थवादिनम् |
१२ क
धृतराष्ट्र उवाच:
द्रोणं कृपं विकर्णं च महाराजं च वाह्लिकम् ||
१२ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
एते ह्यपि यथैवाहं मन्तुमर्हसि तांस्तथा |
१३ क
धृतराष्ट्र उवाच:
सर्वे धर्मविदो ह्येते तुल्यस्नेहाश्च भारत ||
१३ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
यत्तद्विराटनगरे सह भ्रातृभिरग्रतः |
१४ क
धृतराष्ट्र उवाच:
उत्सृज्य गाः सुसन्त्रस्तं वलं ते समशीर्यत ||
१४ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
यच्चैव तस्मिन्नगरे श्रूय़ते महदद्भुतम् |
१५ क
धृतराष्ट्र उवाच:
एकस्य च वहूनां च पर्याप्तं तन्निदर्शनम् ||
१५ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
अर्जुनस्तत्तथाकार्षीत्किं पुनः सर्व एव ते |
१६ क
धृतराष्ट्र उवाच:
सभ्रातॄनभिजानीहि वृत्त्या च प्रतिपादय़ ||
१६ ख